सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राज्याभिषेक के पश्चात श्रीराम अयोध्या में विशाल दान-यज्ञ का आयोजन करते हैं। वे ब्राह्मणों, गरीबों, याचकों और सभी नगरवासियों को अन्न, वस्त्र, धन, रत्न, भूमि आदि का अपार दान देते हैं। कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०४
(राम का दान-धर्म)
🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक के पश्चात श्रीराम ने अनुभव किया कि राज्य की समृद्धि का वास्तविक अर्थ प्रजा के सुख में निहित है। अतः उन्होंने अपने कोष से सभी जरूरतमंदों को उदारतापूर्वक दान देने का निश्चय किया। यह सर्ग उस दान-महिमा का वर्णन करता है।
📢 दान-यज्ञ की घोषणा एवं भव्य आयोजन (श्लोक १-५)
दानयज्ञं महान् आसीत् कर्तुं समुद्यतः ॥
आहूय ब्राह्मणान् सर्वान् वेदवेदाङ्गपारगान् ।
याचकांश्च दरिद्रांश्च वृद्धान् स्त्रीबालकानपि ॥
कारयामास विधिवत् यज्ञशालां मनोरमाम् ।
रत्नैर्वस्त्रैः सुवर्णैश्च परिपूर्णां समन्ततः ॥
💰 अपार दान-सामग्री का वितरण (श्लोक ६-१०)
अन्नपानानि विविधा गावो वाजिगजास्तथा ॥
भूमिं ग्रामांश्च नगरान् दासीदासान् सुसङ्ग्रहान् ।
ददौ रामः स्वयं हस्तैः ब्राह्मणेभ्यः प्रहर्षितः ॥
न कश्चिद् याचकः तत्र निराशः प्रत्यपद्यत ।
सर्वे कामैः समृद्धाश्च ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥
🙏 ब्राह्मणों का आशीर्वाद एवं स्तुति (श्लोक ११-१५)
ऊचुः रामं महात्मानं सीतां चापि यशस्विनीम् ॥
धन्योऽसि राघवो राजन् यशस्वी च जगत्त्रये ।
त्वया दत्तेन दानेन तृप्ताः स्म इति सादरम् ॥
तव राज्ये न दुर्भिक्षं नाकालमरणं क्वचित् ।
भविष्यति न च व्याधिः सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥
😊 प्रजा का सुख और समृद्धि (श्लोक १६-२८)
न्यवर्तन्त गृहेष्वेव धर्मकामार्थसंयुताः ॥
न चौरभयं नो राजभयं न दैवतं भयम् ।
सर्वत्र सुखिता लोकाः पूर्णाः सस्यैर्नदीघनैः ॥
एवं रामः प्रजाः पाल्य धर्मेण सुसमाहितः ।
रेमे सीतासमायुक्तो राज्ये वर्षगणान् बहून् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🤲 दान का महत्त्व
यह सर्ग दान के महत्त्व को स्थापित करता है। राम ने अपने राज्याभिषेक के अवसर पर दान देकर यह सन्देश दिया कि राजा का धन वास्तव में प्रजा का ही होता है।
🌾 रामराज्य की अवधारणा
रामराज्य वह आदर्श राज्य है, जहाँ प्रजा निर्भय, सुखी और समृद्ध होती है। इस सर्ग में उसी का सुन्दर चित्रण है।
🙏 ब्राह्मणों का सम्मान
राम ने ब्राह्मणों को विशेष रूप से दान देकर उनके ज्ञान और तपस्या का सम्मान किया। यह राजा के कर्तव्य का अंग है।
📈 समाज का कल्याण
दान से केवल व्यक्ति ही नहीं, सम्पूर्ण समाज का कल्याण होता है। राम के दान से प्रजा में संतोष और समृद्धि आई।
🎯 शिक्षा : हमें राम के समान उदार बनना चाहिए और अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए। दान से न केवल दूसरों का भला होता है, वरन् दाता को भी अपार आत्मिक सुख मिलता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।