सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम के आदेशानुसार वानर और राक्षस सेनाएँ लंका से प्रस्थान करती हैं। राम सभी को आशीर्वाद देते हैं और मैत्री का संदेश देते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११६
(वानरों और राक्षसों का प्रस्थान)
🔆 प्रस्तावना : रावण के वध और राम का राज्याभिषेक हो चुका है। अब वानर एवं राक्षस सेनाएँ वापस लौटने की तैयारी कर रही हैं। राम सभी का आदरपूर्वक अभिनंदन करते हैं और उन्हें विदा करते हैं। यह सर्ग कृतज्ञता और मैत्री का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है।
🦍 राम का वानर सेना को संबोधन (श्लोक १-५)
वानरेन्द्र महावीर्य त्वया साह्यं कृतं महत् ॥
अद्य प्रभृति ते मित्रं मां विद्धि वचनात्मकम् ।
यथेष्टं गम्यतां राजन् स्वपुरं वानरैः सह ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् सर्वान् वानरपुङ्गवान् ।
पूजयामास धर्मात्मा माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषणैः ॥
👹 राक्षस सेना को विदाई (श्लोक ६-१०)
त्वया धर्मेण रक्ष्यं वै लङ्काराज्यमकण्टकम् ॥
ये त्वां सेवन्ति रक्षांसि तेषां कार्या परिग्रहः ।
धर्मेण पालयैनांस्त्वं मा प्रमादं गमः क्वचित् ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् राक्षसान् सर्व एव हि ।
आपृच्छय विधिवत् सर्वान् यथार्हं समपूजयत् ॥
🚩 सेनाओं का प्रस्थान (श्लोक ११-१५)
रामस्यानुमते सर्वे हर्षयुक्ता ययुस्तदा ॥
राक्षसाश्च विभीषणेन सह धर्मपरायणाः ।
प्रणम्य रामं विधिवत् स्वं स्वं देशमुपागमन् ॥
एवं ते समनुज्ञाता रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
जग्मुः प्रीतमनसः सर्वे यत्र स्वं निकेतनम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राम का नेतृत्व
राम ने न केवल युद्ध में विजय प्राप्त की, बल्कि सभी सहयोगियों का आदरपूर्वक विदा करके एक आदर्श शासक का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी कृतज्ञता और उदारता सभी के लिए अनुकरणीय है।
🤝 मैत्री और कर्तव्य
सुग्रीव और विभीषण के साथ राम के व्यवहार से पता चलता है कि सच्ची मैत्री स्वार्थ से परे होती है। राम ने उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराया और उन्हें सम्मानित किया।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता के बाद भी हमें अपने सहयोगियों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें उनके योगदान के लिए धन्यवाद देना चाहिए। राम का यह व्यवहार हमें कृतज्ञता और विनम्रता का पाठ पढ़ाता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।