सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम गज और गवाक्ष नामक दो वानर योद्धाओं को सम्मानित करते हैं, जिन्होंने युद्ध में अद्वितीय साहस दिखाया और अनेक राक्षसों का वध किया।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२५
(राम का गज और गवाक्ष को सम्मानित करना)
🔆 प्रस्तावना : अन्त में राम ने दो और वीर वानरों – गज और गवाक्ष – को सम्मानित किया, जिन्होंने युद्ध में राक्षसों के विरुद्ध अदम्य साहस दिखाया था।
🐒 राम का गज और गवाक्ष को सम्बोधन (श्लोक १-५)
उवाच परमप्रीतो वानरौ युद्धदुर्मदौ ॥१॥
युवां रणे महावीर्यौ राक्षसानां भयंकरौ ।
निहताश्च महावीर्याः प्रमाथिनो रणाजिरे ॥२॥
गजेन निहतः कुम्भः कुम्भकर्णसुतो बली ।
गवाक्षेण च निहतो महोदरमहापरौ ॥३॥
तौ दृष्ट्वा विस्मितो रामः प्रशशंस पुनः पुनः ।
धन्योऽस्मि यस्य मे युद्धे युवां सहायकौ स्थितौ ॥४॥
गृह्णीतं वरमीशाभ्यां युवां मत्तो यदिच्छथः ॥५॥
⚔️ युद्ध में गज-गवाक्ष के अन्य पराक्रम (श्लोक ६-१०)
यथा तौ युधि विक्रान्तौ राक्षसानां क्षयंकरौ ॥६॥
गजस्तु रथिनां श्रेष्ठः शरवर्षैरवाकिरत् ।
राक्षसान् सगणान् सर्वान् निजघान च संयुगे ॥७॥
गवाक्षश्च महावीर्यः शूलपट्टिशपाणिना ।
चकार रुधिरोद्गारी राक्षसानां महद्बलम् ॥८॥
न तयोः सदृशो वीर्ये कश्चिदासीत् प्लवंगमः ।
तदा रामो महातेजा बहु मेने तयोर्बलम् ॥९॥
श्रुत्वा रामः प्रशंसन् वै उवाच वचनं शुभम् ॥१०॥
🎁 राम द्वारा उपहार और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)
आभरणानि मुख्यानि मणिहेम सुशोभनम् ॥११॥
ग्रामान् बहून् प्रदत्त्वा च गजानश्वान् धनानि च ।
उवाच परमप्रीतो गच्छतं वानरोत्तमौ ॥१२॥
स्वराज्यं प्राप्नुतं वीरौ सुखं वसत सर्वदा ।
मम स्नेहश्च वो नित्यं वर्धतां वानरेश्वरौ ॥१३॥
एवं संपूज्य भगवान् विससर्ज महामतीन् ।
तौ चापि पूजां संप्राप्य जग्मतुः स्वालयं प्रति ॥१४॥
इति श्रीमद्रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥१५॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🗡️ वीरों का सम्मान
राम ने प्रत्येक वीर का नाम लेकर उनके द्वारा किए गए विशिष्ट कार्यों का स्मरण किया – यह सच्चे नेतृत्व का लक्षण है।
👑 कृतज्ञता
गज और गवाक्ष जैसे योद्धा, जिनका नाम अन्यत्र कम सुनने को मिलता, राम ने उन्हें भी उतना ही महत्त्व दिया जितना सुग्रीव या हनुमान को।
📜 युद्धकाण्ड की समाप्ति
यह युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है। इसके बाद उत्तरकाण्ड या फिर अयोध्या प्रत्यागमन का वर्णन होता है।
🌺 सामूहिक विजय
विजय केवल राम की नहीं, बल्कि उन सभी की थी जिन्होंने उनका साथ दिया। यह भाव सर्ग में स्पष्ट है।
🎯 शिक्षा : बड़े से बड़े कार्य में छोटे से छोटे सहयोगी का भी योगदान होता है, उसे भी सम्मान मिलना चाहिए।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।