🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 30

कुंभकर्ण का वध

राम इंद्र के दिए हुए ब्रह्मास्त्र से कुंभकर्ण का वध करते हैं। कुंभकर्ण का विशाल शरीर समुद्र में गिरता है।

0 सम्पूर्ण श्लोक
30 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

राम इंद्र के दिए हुए ब्रह्मास्त्र से कुंभकर्ण का वध करते हैं। कुंभकर्ण का विशाल शरीर समुद्र में गिरता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

घोर युद्ध के पश्चात राम कुंभकर्ण के पराक्रम से चिंतित हो जाते हैं। वे इंद्र द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र का स्मरण करते हैं और उससे कुंभकर्ण पर प्रहार करते हैं। ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से कुंभकर्ण के मस्तक और शरीर के टुकड़े हो जाते हैं। उसका विशाल शरीर गिरकर समुद्र में ज्वार उत्पन्न करता है। राक्षसों में हाहाकार मच जाता है। यह सर्ग राम की विजय और कुंभकर्ण के अंत का वर्णन करता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

(कुंभकर्ण का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और कुंभकर्ण के बीच भीषण युद्ध चल रहा है। अब राम इंद्र के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर कुंभकर्ण का वध करते हैं।

💥 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १-२०)

॥ श्लोक १-१० ॥
ततो रामो महातेजाः कुम्भकर्णं महाबलम् ।
निहन्तुं क्रोधताम्राक्षः सन्दधे परमास्त्रवित् ॥
ब्रह्मास्त्रं परमं दिव्यं सन्दधे रघुनन्दनः ।
तस्य मन्त्रपुटे ध्यात्वा मुमोच परमात्मने ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; कुम्भकर्णम् = कुंभकर्ण को; महाबलम् = महाबली; निहन्तुम् = मारने के लिए; क्रोधताम्राक्षः = क्रोध से लाल आँखों वाले; सन्दधे = धारण किया; परमास्त्रवित् = परम अस्त्रों के ज्ञाता; ब्रह्मास्त्रम् = ब्रह्मास्त्र; परमम् = परम; दिव्यम् = दिव्य; सन्दधे = धारण किया; रघुनन्दनः = रघुनंदन; तस्य = उसके; मन्त्रपुटे = मंत्रों के पुट में; ध्यात्वा = ध्यान कर; मुमोच = छोड़ा; परमात्मने = परमात्मा को समर्पित।
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने क्रोध से लाल-लाल आँखें करके महाबली कुंभकर्ण को मारने के लिए परम अस्त्रों के ज्ञाता होने के नाते दिव्य ब्रह्मास्त्र का स्मरण किया। रघुनंदन ने उस अस्त्र को मंत्रों से अभिमंत्रित कर परमात्मा को समर्पित करते हुए छोड़ दिया।
॥ श्लोक ११-२० ॥
स तेनास्त्रेण निर्भिन्नः कुम्भकर्णो महाबलः ।
पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥
तस्य पतत एवाशु शिरांसि त्रीणि भूतले ।
पेतुः सान्द्रं रुधिरमुद्वमन्ति स्म दारुणम् ॥
📖 भावार्थ : उस अस्त्र से विद्ध होकर महाबली कुंभकर्ण अचानक भूमि पर गिर पड़ा, जैसे जड़ से कटा हुआ वृक्ष गिरता है। उसके गिरते ही उसके तीनों सिर भूमि पर गिरे, जो घोर रुधिर उगल रहे थे।

🌊 कुंभकर्ण का शरीर समुद्र में (श्लोक २१-५२)

॥ श्लोक २१-३५ ॥
तस्य देहः समुत्पत्य समुद्रे पतितो महान् ।
सागरः सहसा वेलां समुत्सार्य महास्वनः ॥
तदा प्रभृति चोदधिः कुम्भकर्णहतो यथा ।
न वेलामतिवर्तेत इति लोकोऽनुपश्यति ॥
📖 भावार्थ : उसका विशाल शरीर उछलकर समुद्र में गिरा। समुद्र ने अचानक अपनी लहरों को ऊँचा उठाया और महान शब्द किया। तब से लोग देखते हैं कि समुद्र (कुंभकर्ण के शरीर के भार से) अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करता।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏹 ब्रह्मास्त्र की महिमा

ब्रह्मास्त्र अप्रतिम अस्त्र है, जिसके सामने कोई टिक नहीं सकता। राम ने धर्मयुद्ध में इसका प्रयोग किया।

⚖️ कर्म का नियम

कुंभकर्ण ने अपने कर्मों से यह अंत पाया। उसकी मृत्यु से राक्षस सेना का मनोबल टूट गया।

🎯 शिक्षा : अधर्म का अंत निश्चित है। चाहे शक्तिशाली राक्षस ही क्यों न हो, धर्म की विजय होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।