🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 36

रावण का मायावी युद्ध

रावण अपनी माया का प्रयोग करता है और अनेक रूप धारण करके राम और वानर सेना पर आक्रमण करता है। उसकी माया से वानर सेना भयभीत हो जाती है।

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36 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

रावण अपनी माया का प्रयोग करता है और अनेक रूप धारण करके राम और वानर सेना पर आक्रमण करता है। उसकी माया से वानर सेना भयभीत हो जाती है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

रावण, राम से पराजित होने के भय से, अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करता है। वह विविध प्रकार के मायावी रूप धारण करता है - कभी राम बनकर, कभी लक्ष्मण, तो कभी राक्षसों की सेना का निर्माण करके। इन मायावी हमलों से वानर सेना त्रस्त हो जाती है और उनमें भगदड़ मच जाती है। रावण सिर काटकर भी पुनः जीवित हो जाता है, जिससे वानर और भी भयभीत होते हैं। राम और लक्ष्मण इस माया को तोड़ने के लिए उपाय खोजते हैं।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

(रावण का मायावी युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण को जब आभास हुआ कि वह राम के सामने टिक नहीं सकता, तो उसने अपनी माया का प्रयोग किया। उसने अनेक मायावी रूप धारण कर युद्ध को और भी विकट बना दिया। यह सर्ग रावण की माया और वानर सेना की दुर्दशा का वर्णन करता है।

🌀 माया का प्रयोग (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः रावण दुर्धर्षो रामबाणप्रपीडितः ।
मायां प्रयुक्तवान् घोरां राक्षसीं परमाद्भुताम् ॥
स रथं च ध्वजं चैव रामस्यान्तिकमागतः ।
अदृश्यत तदा राजन् रावणो रणमूर्धनि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; दुर्धर्षः = अजेय; रामबाणप्रपीडितः = राम के बाणों से पीड़ित; मायाम् = माया; प्रयुक्तवान् = प्रयोग किया; घोराम् = भयानक; राक्षसीम् = राक्षसी; परमाद्भुताम् = अत्यंत अद्भुत; सः = वह; रथम् = रथ; च = और; ध्वजम् = ध्वजा; चैव = भी; रामस्यान्तिकम् = राम के पास; आगतः = आया; अदृश्यत = अदृश्य हो गया; तदा = तब; राजन् = हे राजा; रावणः = रावण; रणमूर्धनि = रणभूमि में।
📖 भावार्थ : तब अजेय रावण, राम के बाणों से पीड़ित होकर, भयानक एवं अत्यंत अद्भुत राक्षसी माया का प्रयोग करने लगा। वह रथ और ध्वजा सहित राम के पास आकर रणभूमि में अदृश्य हो गया।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
स मायया महाराज ववर्ष शरवृष्टिभिः ।
रामं लक्ष्मणमुख्यांश्च वानरान् भीमदर्शनान् ॥
ते शरा राममुख्येन छिन्ना रामस्य सायकैः ।
पुनः पुनः सृजन्तं तं रावणं न प्रतीयते ॥
📖 भावार्थ : उसने माया से, हे महाराज, शरवृष्टियों द्वारा राम, लक्ष्मण और भीमदर्शी वानरों को भिगो दिया (आच्छादित कर दिया)। वे बाण राम के बाणों से काट दिए गए, किन्तु बार-बार बाण बरसाने वाले उस रावण का पता नहीं चलता था।

👻 मायावी रूप और वानरों की भगदड़ (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१९ ॥
स सृष्ट्वा राक्षसान् घोरान् रामरूपधरान् बहून् ।
युद्ध्यमानान् समुद्दिश्य वानरान् भीमविक्रमान् ॥
ते वानरा महाकाया राक्षसै रामरूपिभिः ।
हन्यमाना दिशो याता भयत्रस्ता विचेतसः ॥
📖 भावार्थ : उसने राम का रूप धारण किए हुए अनेक घोर राक्षसों की रचना की, जो भीमविक्रमी वानरों पर आक्रमण करने लगे। उन रामरूपी राक्षसों से मारे जाते हुए महाकाय वानर भयभीत होकर व्याकुल हो गए और दिशाओं को भागने लगे।
॥ श्लोक २०-२५ ॥
सुग्रीवस्तु तदा दृष्ट्वा वानराणां भयङ्करम् ।
उवाच रामं धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितस्तदा ॥
भ्रष्टा वानरसेना ते माययानेन रक्षसा ।
प्रतियोधय कल्याण येन नश्येत् स राक्षसः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने वानरों का वह भयानक दृश्य देखकर, भाइयों के साथ धर्मात्मा राम से कहा: "आपकी वानरसेना इस राक्षस की माया से व्याकुल हो गई है। हे कल्याणकारी, ऐसा उपाय कीजिए जिससे यह राक्षस नष्ट हो जाए।"

🔮 राम का आश्वासन (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३३ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा सुग्रीवं प्रत्यभाषत ।
मा भैर्वानरशार्दूल न नश्येत् स कथञ्चन ॥
अहं विनाशयिष्यामि रावणस्य च मायिकम् ।
प्रतीक्षध्वं मुहूर्तं तु यावदेनं निहन्म्यहम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा श्रीराम ने सुग्रीव को उत्तर दिया: "हे वानरशार्दूल, डरो मत। यह किसी भी प्रकार नष्ट नहीं हो सकता? (अर्थात् मैं इसे नष्ट कर दूंगा)। मैं रावण की माया का विनाश कर दूंगा। तुम लोग एक क्षण प्रतीक्षा करो, जब तक मैं इसका वध कर दूं।"
॥ श्लोक ३४-४० ॥
ततः श्रीरामो धर्मज्ञो मायामाश्रित्य राक्षसीम् ।
प्रयुक्तवान् महास्त्राणि रावणस्य वधाय वै ॥
तैरस्त्रैः राक्षसी माया नाशिता सा सहस्रधा ।
रावणस्तु विमूढात्मा दृश्यते स रणाजिरे ॥
इत्येष षट्त्रिंशः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
रावणस्य च माया च रामस्य विजयस्तथा ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मज्ञ श्रीराम ने राक्षसी माया का सहारा लेकर, रावण के वध के लिए महान अस्त्रों का प्रयोग किया। उन अस्त्रों से वह राक्षसी माया सहस्रधा नष्ट हो गई। और वह विमूढ़ात्मा रावण रणांगण में दिखाई देने लगा। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड का छत्तीसवाँ रोचक सर्ग है, जिसमें रावण की माया और राम की विजय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 माया का प्रभाव

रावण की माया उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिससे वह युद्ध को अनिश्चित बना देता है।

💪 राम का धैर्य

राम धैर्य नहीं खोते और माया को भेदने के लिए उचित अस्त्रों का प्रयोग करते हैं।

🎯 शिक्षा : माया और छल क्षणिक होते हैं, अंततः सत्य और धैर्य की विजय होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।