🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 42

हनुमान् और अंगद द्वारा यज्ञ भंग

लक्ष्मण के साथ हनुमान, अंगद और वानर सेना निकुंभिला पहुँचते हैं और इंद्रजीत के यज्ञ को भंग कर देते हैं। इंद्रजीत को युद्ध के लिए विवश होना पड़ता है।

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42 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

लक्ष्मण के साथ हनुमान, अंगद और वानर सेना निकुंभिला पहुँचते हैं और इंद्रजीत के यज्ञ को भंग कर देते हैं। इंद्रजीत को युद्ध के लिए विवश होना पड़ता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

लक्ष्मण, हनुमान, अंगद, सुग्रीव, जाम्बवान और अन्य वानर निकुंभिला पहुँचते हैं, जहाँ इंद्रजीत यज्ञ कर रहा है। वे यज्ञ सामग्री को नष्ट कर देते हैं और राक्षसों से युद्ध करते हैं। इंद्रजीत को यज्ञ अधूरा छोड़कर युद्ध के लिए तैयार होना पड़ता है। वह क्रोधित होकर लक्ष्मण पर आक्रमण करता है। इस प्रकार इंद्रजीत की अमोघ शक्ति प्राप्त करने की योजना विफल हो जाती है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

(हनुमान् और अंगद द्वारा यज्ञ भंग)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : लक्ष्मण के नेतृत्व में वानर सेना निकुंभिला पहुँची और इंद्रजीत के यज्ञ को भंग कर दिया। इस प्रकार इंद्रजीत की अमोघ शक्ति प्राप्त करने की योजना विफल हो गई। यह सर्ग उस विजय का वर्णन करता है।

🏹 यज्ञ भंग (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ते प्रविश्य निकुम्भिलां ददृशुः राक्षसेश्वरम् ।
इन्द्रजितं महाबाहुं यज्ञं कुर्वाणमास्थितम् ॥
हनूमान् अंगदश्चैव चेरतुः परमाहवे ।
विध्वंसयन्तौ यज्ञस्य सामग्री राक्षसान् रणे ॥
🔹 पदच्छेद : ते = वे; प्रविश्य = प्रवेश करके; निकुम्भिलाम् = निकुंभिला में; ददृशुः = देखा; राक्षसेश्वरम् = राक्षसों के स्वामी को; इन्द्रजितम् = इंद्रजीत को; महाबाहुम् = महाबाहु; यज्ञम् = यज्ञ; कुर्वाणम् = करते हुए; आस्थितम् = स्थित; हनूमान् = हनुमान; अंगदः = अंगद; च = और; एव = ही; चेरतुः = विचरण करने लगे; परमाहवे = परम युद्ध में; विध्वंसयन्तौ = नष्ट करते हुए; यज्ञस्य = यज्ञ की; सामग्री = सामग्री; राक्षसान् = राक्षसों को; रणे = युद्ध में।
📖 भावार्थ : उन्होंने निकुंभिला में प्रवेश कर राक्षसेश्वर महाबाहु इंद्रजीत को यज्ञ करते देखा। हनुमान और अंगद उस परम युद्ध में विचरण करने लगे, यज्ञ की सामग्री और राक्षसों को नष्ट करते हुए।
॥ श्लोक ७-१० ॥
ततः प्रहृष्टा वानरा यज्ञविघ्नं प्रचक्रिरे ।
राक्षसाश्च महावीर्याः पेतुर्निहता भूतले ॥
📖 भावार्थ : तब हर्षित वानरों ने यज्ञ में विघ्न डाला और महावीर्य राक्षस मारे जाकर धरती पर गिरने लगे।

😡 इंद्रजीत का क्रोध (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
तद् दृष्ट्वा रावणिः क्रुद्धो यज्ञं त्यक्त्वा महामनाः ।
धनुरादाय सज्यं च लक्ष्मणं प्रत्यवारयत् ॥
उवाच च महातेजा लक्ष्मणं रणमूर्धनि ।
अद्य त्वां निहनिष्यामि मद्बाणैर्भीमविक्रम ॥
📖 भावार्थ : यह देखकर क्रुद्ध महामना रावणि ने यज्ञ त्याग दिया और धनुष उठाकर लक्ष्मण का सामना किया। रणभूमि में महातेजा ने कहा: "हे भीमविक्रम, आज मैं तुम्हें अपने बाणों से मार डालूँगा।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
लक्ष्मणस्तु तदा राजन् प्रत्युवाच महाबलः ।
मा त्वं वाचा बहूक्त्या च युद्ध्यस्व यदि शक्यते ॥
📖 भावार्थ : तब महाबली लक्ष्मण ने राजन्, उत्तर दिया: "तू बहुत बातें न कर, यदि युद्ध कर सकता है तो युद्ध कर।"

⚔️ युद्ध प्रारंभ (श्लोक २३-३४)

॥ श्लोक २३-२९ ॥
ततस्तु रावणिः क्रुद्धो लक्ष्मणं प्रति संयुगे ।
चिक्षेप बहुभिर्बाणैर्दीप्तैराशीविषोपमैः ॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजाश्चिच्छेद तान् शरैः शितैः ॥
📖 भावार्थ : तब क्रुद्ध रावणि ने लक्ष्मण पर बहुत से दीप्तिमान, सर्पों के समान बाण चलाए। महातेजा लक्ष्मण ने उन बाणों को अपने तीक्ष्ण बाणों से काट दिया।
॥ श्लोक ३०-३४ ॥
हनूमान् अंगदश्चैव सुग्रीवो जाम्बवांस्तथा ।
वारयामासुरन्योन्यं राक्षसांश्च समन्ततः ॥
इत्येष द्विचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
यज्ञविघ्नो हनूमत्या इन्द्रजिद्युद्धमेव च ॥
📖 भावार्थ : हनुमान, अंगद, सुग्रीव और जाम्बवान ने परस्पर और चारों ओर से राक्षसों को रोक दिया। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह बयालीसवाँ सर्ग है, जिसमें हनुमान आदि द्वारा यज्ञविघ्न और इंद्रजीत का युद्ध वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ यज्ञ भंग का महत्व

यज्ञ भंग करके वानरों ने इंद्रजीत को अजेय होने से रोक दिया, जो रणनीति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

🤝 सामूहिक प्रयास

हनुमान, अंगद आदि सभी वानरों ने मिलकर यह कार्य किया, जो सामूहिक शक्ति का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : समय रहते शत्रु की योजना को विफल करना ही विजय की कुंजी है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।