🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 47

विरूपाक्ष का वध

विरूपाक्ष और वानर सेना के बीच घोर युद्ध होता है। अंततः हनुमान विरूपाक्ष का वध कर देते हैं, जिससे राक्षस सेना में हाहाकार मच जाता है।

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47 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

विरूपाक्ष और वानर सेना के बीच घोर युद्ध होता है। अंततः हनुमान विरूपाक्ष का वध कर देते हैं, जिससे राक्षस सेना में हाहाकार मच जाता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

विरूपाक्ष अपनी विशाल सेना के साथ वानरों पर आक्रमण करता है। भीषण युद्ध होता है। विरूपाक्ष अनेक वानरों को मार डालता है। तब हनुमान क्रोधित होकर उसके सामने आते हैं। दोनों में घोर युद्ध होता है। हनुमान विरूपाक्ष के रथ को नष्ट कर देते हैं और अंत में अपने पर्वताकार शरीर से उसे कुचल डालते हैं। विरूपाक्ष के मरते ही राक्षस सेना भाग खड़ी होती है और वानरों में उत्साह छा जाता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

(विरूपाक्ष का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : विरूपाक्ष ने वानरों पर भीषण आक्रमण किया। तब हनुमान उसके सामने आए और घोर युद्ध के बाद उसका वध कर दिया। यह सर्ग हनुमान के अद्वितीय पराक्रम का वर्णन करता है।

⚔️ युद्ध का आरंभ (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः विरूपाक्षो वीरो राक्षसैः बहुभिर्वृतः ।
वानरान् समरे हन्तुं प्रायात् क्रोधसमन्वितः ॥
ते वानरा महाकाया राक्षसेन समागताः ।
युद्ध्यमाना महात्मानः समरे न विचेलिरे ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; विरूपाक्षः = विरूपाक्ष; वीरः = वीर; राक्षसैः = राक्षसों के साथ; बहुभिः = बहुत से; वृतः = घिरा हुआ; वानरान् = वानरों को; समरे = युद्ध में; हन्तुम् = मारने के लिए; प्रायात् = आया; क्रोधसमन्वितः = क्रोध से युक्त; ते = वे; वानराः = वानर; महाकायाः = महाकाय; राक्षसेन = राक्षस के साथ; समागताः = आए हुए; युद्ध्यमानाः = युद्ध करते हुए; महात्मानः = महात्मा; समरे = युद्ध में; न विचेलिरे = विचलित नहीं हुए।
📖 भावार्थ : तब वीर विरूपाक्ष बहुत से राक्षसों से घिरा हुआ, क्रोध से युक्त होकर, युद्ध में वानरों को मारने के लिए आया। उस राक्षस के साथ आए हुए महाकाय वानर महात्मा युद्ध करते हुए विचलित नहीं हुए।
॥ श्लोक ७-१० ॥
स राक्षसो महावीर्यो वानरान् निशितैः शरैः ।
विव्याध समरे क्रुद्धो बहुशः प्लवगर्षभान् ॥
📖 भावार्थ : उस महावीर्य राक्षस ने क्रुद्ध होकर युद्ध में बहुत से वानरों को तीक्ष्ण बाणों से बींध डाला।

🦍 हनुमान का प्रकोप (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
ततः हनूमान् संक्रुद्धो विरूपाक्षमुपाद्रवत् ।
गदां जग्राह महतीं वज्रसंहननोपमाम् ॥
तया गदया वीरो हनूमान् राक्षसेश्वरम् ।
जघान समरे क्रुद्धो मर्मभेदिभिराहवे ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने क्रुद्ध होकर विरूपाक्ष पर आक्रमण किया। उन्होंने वज्र के समान दृढ़ महती गदा उठाई। उस गदा से वीर हनुमान ने क्रुद्ध होकर युद्ध में उस राक्षसेश्वर को मर्मभेदी प्रहारों से मारा।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
स हतो महता वेगात् प्राणांस्तत्याज राक्षसः ।
हते तस्मिन् महावीर्ये राक्षसाः प्राद्रवन् भयात् ॥
📖 भावार्थ : वह राक्षस महान वेग से मारा गया और उसने प्राण त्याग दिए। उस महावीर्य के मारे जाने पर राक्षस भय से भाग गए।

🎉 वानरों का उत्साह (श्लोक २३-३६)

॥ श्लोक २३-२९ ॥
ततो वानराः सिंहनादान् प्रचक्रिरे ।
हनूमन्तं महात्मानं पूजयामासुरादरात् ॥
रामाय तत्समाचख्युः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ॥
📖 भावार्थ : तब वानरों ने सिंहनाद किए। उन्होंने महात्मा हनुमान का आदरपूर्वक पूजन किया। सुग्रीव आदि प्रमुखों ने राम को यह समाचार सुनाया।
॥ श्लोक ३०-३६ ॥
रामः श्रुत्वा प्रियं वाक्यं हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
साधु वानरशार्दूल कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥
इत्येष सप्तचत्वारिंशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
विरूपाक्षवधो यत्र हनूमत्पराक्रमः ॥
📖 भावार्थ : राम ने वह प्रिय समाचार सुनकर हनुमान से कहा: "साधु, हे वानरशार्दूल, तुमने यह अत्यंत दुष्कर कर्म किया है।" इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह सैंतालीसवाँ सर्ग है, जिसमें विरूपाक्ष का वध और हनुमान का पराक्रम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦍 हनुमान का पराक्रम

हनुमान ने एक बार फिर अपनी अद्वितीय शक्ति का प्रदर्शन किया और एक प्रमुख राक्षस योद्धा का वध किया।

💪 राम का आशीर्वाद

राम हनुमान की प्रशंसा करते हैं, जो उनके प्रति उनके स्नेह और सम्मान को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : सच्चा पराक्रम धर्म की रक्षा में ही निहित है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।