🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 70

सीता की खोज

रावण के वध और विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात राम सीता की खोज में हनुमान को भेजते हैं। हनुमान अशोक वाटिका में जाकर सीता को ढूंढते हैं और उन्हें राम के सन्देश से अवगत कराते हैं।

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70 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

रावण के वध और विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात राम सीता की खोज में हनुमान को भेजते हैं। हनुमान अशोक वाटिका में जाकर सीता को ढूंढते हैं और उन्हें राम के सन्देश से अवगत कराते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

रावण की मृत्यु के बाद भी सीता का पता नहीं चल पाया था। राम चिंतित हैं और सीता के बारे में जानने को उत्सुक हैं। वे हनुमान को आदेश देते हैं कि वे जाकर सीता का पता लगाएं और उन्हें सब वृतांत बताएं। हनुमान तुरंत अशोक वाटिका जाते हैं, जहाँ सीता राक्षसियों के बीच निराश और दुःखी बैठी हैं। हनुमान सीता को राम के पराक्रम और रावण के वध की सूचना देते हैं तथा राम का सन्देश सुनाते हैं। सीता आश्वस्त होती हैं और हनुमान को धन्यवाद देती हैं। यह सर्ग सीता के मिलन की प्रस्तावना है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ७०

(सीता की खोज)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण का वध हो चुका है, विभीषण का राज्याभिषेक हो गया है, किन्तु सीता का अभी पता नहीं। राम व्याकुल हैं। वे हनुमान को सीता की खोज में भेजते हैं।

🔍 राम का आदेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामो महातेजाः हनूमन्तमुवाच ह ।
गच्छ शीघ्रं महाबाहो जानकी सन्निधिं प्रति ॥
मम वाक्याद् ब्रूहि देवीं रावणे निहते रणे ।
निर्भयां चैव तां कृत्वा क्षिप्रमानय मैथिलीम् ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने हनुमान से कहा: "हे महाबाहो! शीघ्र जाओ, जानकी के पास जाओ। मेरे वचन से देवी से कहो कि रावण युद्ध में मारा गया है। उन्हें निर्भय करके शीघ्र ही मैथिली को ले आओ।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने राम का आदेश सिर माथे पर लगाया और तुरन्त अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान किया।

🌿 अशोक वाटिका में सीता (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
📖 भावार्थ : हनुमान अशोक वाटिका में पहुँचे। वहाँ उन्होंने सीता को अशोक वृक्ष के नीचे, राक्षसियों से घिरी, अत्यन्त दुःखी और कृशकाय देखा। सीता राम का ध्यान कर रही थीं।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
स तां ददर्श धर्मज्ञो हनूमान् मारुतात्मजः ।
विधूम इव पावार्चिं गतसत्त्वामिव स्थिताम् ॥
उपसृत्य महातेजाः प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत् ।
न्यवेदयत चात्मानं राघवस्य च सन्निधौ ॥
📖 भावार्थ : धर्मज्ञ हनुमान ने उन्हें देखा – मानो धुएँ रहित अग्नि की ज्वाला, परन्तु शून्य सी चेतना के समान स्थित। पास जाकर महातेजस्वी हनुमान ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और अपना तथा राघव का परिचय दिया।
॥ श्लोक २६-३५ ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने सीता को राम के पराक्रम, रावण के वध और विभीषण के राज्याभिषेक की सूचना दी। उन्होंने राम का सन्देश सुनाया और कहा कि अब वे निर्भय होकर राम के पास चल सकती हैं। सीता ने यह सुनकर अपार हर्ष का अनुभव किया और हनुमान को धन्यवाद दिया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा

📘 गूढ़ार्थ : राम का सीता के प्रति अगाध प्रेम और कर्तव्यपालन इस सर्ग में दिखता है। हनुमान की सेवा-निष्ठा और सीता का धैर्य भी अद्वितीय है।

💡 शिक्षा : कठिन से कठिन परिस्थिति में धैर्य न छोड़ें। सच्चे सेवक की निष्ठा और प्रभु की कृपा से ही संकट का अंत होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।