सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रावण के वध और विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात राम सीता की खोज में हनुमान को भेजते हैं। हनुमान अशोक वाटिका में जाकर सीता को ढूंढते हैं और उन्हें राम के सन्देश से अवगत कराते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ७०
(सीता की खोज)
🔆 प्रस्तावना : रावण का वध हो चुका है, विभीषण का राज्याभिषेक हो गया है, किन्तु सीता का अभी पता नहीं। राम व्याकुल हैं। वे हनुमान को सीता की खोज में भेजते हैं।
🔍 राम का आदेश (श्लोक १-१०)
गच्छ शीघ्रं महाबाहो जानकी सन्निधिं प्रति ॥
मम वाक्याद् ब्रूहि देवीं रावणे निहते रणे ।
निर्भयां चैव तां कृत्वा क्षिप्रमानय मैथिलीम् ॥
🌿 अशोक वाटिका में सीता (श्लोक ११-२५)
विधूम इव पावार्चिं गतसत्त्वामिव स्थिताम् ॥
उपसृत्य महातेजाः प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत् ।
न्यवेदयत चात्मानं राघवस्य च सन्निधौ ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा
📘 गूढ़ार्थ : राम का सीता के प्रति अगाध प्रेम और कर्तव्यपालन इस सर्ग में दिखता है। हनुमान की सेवा-निष्ठा और सीता का धैर्य भी अद्वितीय है।
💡 शिक्षा : कठिन से कठिन परिस्थिति में धैर्य न छोड़ें। सच्चे सेवक की निष्ठा और प्रभु की कृपा से ही संकट का अंत होता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।