🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 73

सीता की अग्नि परीक्षा

सीता के अग्नि में प्रवेश करते ही सभी चकित हो जाते हैं। अग्निदेव सीता को लेकर प्रकट होते हैं और उनकी पवित्रता प्रमाणित करते हैं।

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73 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

सीता के अग्नि में प्रवेश करते ही सभी चकित हो जाते हैं। अग्निदेव सीता को लेकर प्रकट होते हैं और उनकी पवित्रता प्रमाणित करते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

सीता के अग्नि-प्रवेश के बाद समस्त देवता, गन्धर्व, ऋषि-मुनि वहाँ एकत्र हो जाते हैं और सीता की स्तुति करते हैं। अग्निदेव स्वयं प्रकट होकर सीता को अक्षत और पवित्र बताते हैं। वे राम से कहते हैं कि सीता सर्वथा निष्कलंक हैं, उन्हें स्वीकार करें। राम अग्निदेव की बात सुनकर प्रसन्न होते हैं और सीता को पुनः स्वीकार करते हैं। यह सर्ग सीता की पवित्रता और राम के धर्म-संकट के समाधान का प्रतीक है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

(सीता की अग्नि परीक्षा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता के अग्नि-प्रवेश से समस्त लोकों में हलचल मच गई। देवता, ऋषि-गन्धर्व सब वहाँ उपस्थित हुए। अग्निदेव ने सीता को सकुशल अग्नि से बाहर लाकर उनकी पवित्रता की घोषणा की।

👼 देवताओं का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः ससिद्धाः सचारणाः ।
समेताः सहसा राजन् द्रष्टुं सीतां हुताशनात् ॥
ब्रह्मा च भगवान् देवः शंकरश्च महेश्वरः ।
इन्द्रश्च सहितो देवैः समाजग्मुस्त्वरान्विताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; देवाः = देवता; सगन्धर्वाः = गन्धर्वों सहित; ससिद्धाः = सिद्धों सहित; सचारणाः = चारणों सहित; समेताः = एकत्र हुए; सहसा = शीघ्र; राजन् = हे राजा; द्रष्टुम् = देखने के लिए; सीताम् = सीता को; हुताशनात् = अग्नि से; ब्रह्मा = ब्रह्मा; च = और; भगवान् = भगवान्; देवः = देव; शंकरः = शंकर; च = और; महेश्वरः = महेश्वर; इन्द्रः = इन्द्र; च = और; सहितः = सहित; देवैः = देवों के; समाजग्मुः = आए; त्वरान्विताः = शीघ्रता से।
📖 भावार्थ : हे राजन्! तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण सब शीघ्र ही सीता को अग्नि से बाहर आते देखने के लिए एकत्र हो गए। भगवान् ब्रह्मा, महेश्वर शंकर और इन्द्र अपने सभी देवताओं के साथ तुरंत वहाँ आए।
॥ श्लोक ७-१० ॥
ततस्ते प्रेक्ष्य सीतां तु रामं च सहलक्ष्मणम् ।
विस्मयं परमं जग्मुः साधुवादान् प्रचक्रिरे ॥
📖 भावार्थ : तब उन सबने सीता को और लक्ष्मण सहित राम को देखकर परम विस्मय प्राप्त किया और साधु-साधु कहकर प्रशंसा करने लगे।

🔥 अग्निदेव का प्राकट्य (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो हुतवहो देवः सीतया सह राघवम् ।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं श्लक्ष्णया स्फुटया गिरा ॥
इयं ते राम वैदेही धर्मेण पृथिवीसमा ।
न किल्बिषमिहास्यास्ति न च पापं कथञ्चन ॥
📖 भावार्थ : तब अग्निदेव सीता के साथ प्रकट हुए और हाथ जोड़कर राम से मधुर एवं स्पष्ट वाणी में बोले: "हे राम! यह वैदेही तुम्हारी धर्मपत्नी है, पृथ्वी के समान धैर्यशीला है। इसमें कोई दोष नहीं है, किसी प्रकार का पाप नहीं है।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
रावणेनापनीता च रक्षसा कामरूपिणा ।
नैनां स्प्रष्टुं हि तेजस्वी रावणः शक्तिमानपि ॥
📖 भावार्थ : "कामरूपी राक्षस रावण द्वारा हर ली जाने पर भी, वह तेजस्वी रावण भी इसे स्पर्श करने में समर्थ नहीं था।"

🤝 राम द्वारा सीता का स्वीकार (श्लोक २१-३१)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यमग्नेः सत्यपराक्रमः ।
उवाच परमप्रीतो देवतानां ततो मुदा ॥
अवश्यं मम वैदेही पवित्रेति विशेषतः ।
लोकापवादभीतेन त्यक्ता तु जनकात्मजा ॥
📖 भावार्थ : अग्निदेव के उन वचनों को सुनकर सत्यपराक्रमी राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और देवताओं से हर्षपूर्वक बोले: "मेरी वैदेही निश्चय ही पवित्र है। लोकापवाद के भय से ही मैंने जनकात्मजा को त्यागा था।"
॥ श्लोक २७-३१ ॥
ततः सीता महाभागा रामेण सहिता तदा ।
शुशुभे परमप्रीता विभूषितेव चन्द्रमाः ॥
📖 भावार्थ : तब महाभागा सीता राम के साथ मिलकर परम प्रसन्न हुईं, जैसे नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा शोभा पाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔥 अग्नि की साक्षी

अग्नि सबसे पवित्र साक्षी मानी गई है। अग्निदेव का स्वयं प्रकट होकर सीता की पवित्रता घोषित करना उनके सतीत्व का प्रमाण है।

👑 राम का राजधर्म

राम ने लोकापवाद के भय से सीता का त्याग किया था, किन्तु देवताओं के आश्वासन पर उन्हें स्वीकार कर लिया। यह राजधर्म और व्यक्तिगत धर्म के बीच संतुलन है।

🎯 शिक्षा : सत्य की हमेशा जीत होती है। यदि व्यक्ति निष्कलंक है, तो देवता भी उसकी रक्षा करते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।