आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा लिरिक्स (Aarti Nagdwara Sheshshai Avatara Lyrics in Hindi) -
आरती नागद्वारा
शेषशाई अवतारा
सद्भावे ओवाळितो
पावे दिगंबर द्वारा
आरती नागद्वारा ।।धृ ।।
आरती नागद्वारा....||
मेरुच्या शिखरी जडले
सिंहासन भारी
त्यावर बैसुनिया
सृष्टी रचली या सारी ।।१।।
आरती नागद्वारा....||
श्रीराम अवतारी
बंधू लक्ष्मण होशी
पाळली राम आज्ञा
पुर्ण कार्य तू करशी ।।२।।
आरती नागद्वारा....||
श्रीकृष्ण अवतारी
ज्येष्ठ बंधू बळीराम
प्रताप थोर होतो
जगी मिळविले नाव ।।३।।
आरती नागद्वारा....||
श्रावण महिन्यात
दिवस नागपंचमी रात्र
आनंद थोर होतो
देवा तुझ्या मंडपात ।।४।।
आरती नागद्वारा....||
शेष सिंधु सागरात
शेषसाई अनंत
तेथे तुम्ही नांदता हो
ज्याला म्हणतात लक्ष्मीकांत ।।५।।
आरती नागद्वारा....||
कालीया नांव तुझे
घेता उतरले ओझे
स्मरण केली या हो
देवा सार्थक होई माझे।।६।।
आरती नागद्वारा....||
देवा मी ज्ञान धरीले
दुःख माझे हरीले
हरीला सेवा केली
शंकर मजला पावले ।।७।।
आरती नागद्वारा....||
वैशाख महिन्यात
दिवस नागपंचमी रात्र
आनंद थोर होतो
देवा तुझ्या मंडपात ।।८।।
आरती नागद्वारा....||
आज देव शेषराये
भक्ती तुझी पुर्ण होय
नवखंड पृथ्वीशी
देवा भरुनी आला आहे ।।९।।
आरती नागद्वारा....||
पाचतत्व पंच ज्योती
ओवळीले नागनाथा
भक्तजन आरत्या गावी
जागा चारणापाशी द्यावी ।।१०।।
आरती नागद्वारा....||
आरती नागद्वारा
गणेश गायन करी
नित्य नेम महाभारी
सर्वदिन सेवा करी ।।११।।
आरती नागद्वारा....||
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🙏 भजन का विस्तृत अर्थ और भावार्थ (Lyrics Meaning)
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा लिरिक्स (Aarti Nagdwara Sheshshai Avatara Lyrics in Hindi) - Mahadev Arti - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व और आध्यात्मिक लाभ (Significance)
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि (Chanting Rules)
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

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