वैदिक महामंत्र · वैदिक देवी-देवता

ॐ मणि पद्मे हूँ

पावन ॐ मणि पद्मे हूँ का संपूर्ण मूल संस्कृत पाठ, पद-दर-पद शास्त्रीय हिंदी भावार्थ, 108 जप की प्रामाणिक विधि, नियम और असीम आध्यात्मिक व आरोग्यता के लाभ।

इष्ट देव वैदिक देवी-देवता
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय
अनुशंसित माला रुद्राक्ष माला
मूल संस्कृत महामंत्र
ॐ मणि पद्मे हूँ
विज्ञापन · प्रायोजित सामग्री
Google AdSense / प्रायोजित विज्ञापन स्थान (Responsive Display Unit)
विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन
Bhaktilok.in - पवित्र सनातन एवं बौद्ध विद्या ज्ञानकोश

ॐ मणि पद्मे हूँ मंत्र

करुणा, बोधिचित्त और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का महामंत्र: एक विस्तृत आध्यात्मिक, दार्शनिक और भाषाई विश्लेषण

आध्यात्मिक परिचय एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन धर्म, महायान बौद्ध परंपरा और शाश्वत आध्यात्मिक चेतना के गगनमंडल में 'ॐ मणि पद्मे हूँ' केवल एक ध्वनि या शब्दों का संयोजन मात्र नहीं है, अपितु यह संपूर्ण ब्रह्मांड की करुणा, प्रेम, और प्रज्ञा का सबसे जीवंत और प्रभावशाली नाद है। यह मंत्र तिब्बती बौद्ध धर्म और हिमालयी आध्यात्मिक परंपराओं में अत्यंत प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है, किंतु इसका मूल भारतीय सनातन संस्कृति, वेदों, उपनिषदों और तांत्रिक दर्शन की गहराइयों में निहित है। यह मंत्र अवलोकितेश्वर (जिन्हें तिब्बत में 'चेनरेजिग' और जापान में 'कन्नन' के नाम से जाना जाता है) का हृदय माना जाता है। अवलोकितेश्वर वे महाबोधि सत्त्व हैं जिन्होंने समस्त जीवों के दुःख से मुक्त होने तक स्वयं की व्यक्तिगत मुक्ति (निर्वाण) को स्थगित रखने की महाप्रतिज्ञा ली थी।

जब कोई साधक इस पवित्र षडक्षर (छह अक्षरों वाले) मंत्र का उच्चारण करता है, तो वह केवल अपनी व्यक्तिगत चेतना को जाग्रत नहीं कर रहा होता, बल्कि वह समस्त ब्रह्मांड की उस आदिशक्ति से जुड़ रहा होता है जो दीन-दुखियों, अज्ञानियों और संसार के बंधनों में जकड़े जीवों के कल्याण के लिए निरंतर कार्यरत है। सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह मंत्र इस बात का प्रतीक है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक 'कमल' (पद्म) के समान शुद्ध और प्रकाशवान बुद्ध-स्वभाव (या आत्म-स्वरूप) छिपा हुआ है, जो कीचड़ रूपी संसार के बीच रहते हुए भी पूर्णतः अलिप्त और पावन रह सकता है।

Bhaktilok.in के इस विशेष ग्रंथ में हम 'ॐ मणि पद्मे हूँ' के हर एक पहलू का गहन विश्लेषण करेंगे—इसके शाब्दिक अर्थ से लेकर, इसके छह अक्षरों द्वारा छह लोकों की शुद्धि की प्रक्रिया, इसका ऐतिहासिक एवं पौराणिक संदर्भ, और नियमित जप से प्राप्त होने वाले मानसिक, शारीरिक व आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से प्रकाश डालेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं लेखन विधि

इस पवित्र मंत्र को देवनागरी, रोमन लिपि और तिब्बती लिपि में नीचे दर्शाया गया है। इसका उच्चारण करते समय एकाग्रता और आंतरिक शांति का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

देवनागरी लिपि

ॐ मणि पद्मे हूँ

विस्तृत रूप: ॐ मणि पद्मे हूँ

रोमन लिपि / अंतर्राष्ट्रीय उच्चारण

Om Maṇi Padme Hūṃ

अथवा: Om Mani Peme Hum (तिब्बती उच्चारण शैली के अनुसार)

मंत्र उच्चारण और लेखन से जुड़ी शास्त्रीय परंपरा:

  • दृश्यमान प्रार्थना पहिए : लद्दाख, तिब्बत, और हिमालयी क्षेत्रों में इस मंत्र को लाखों बार कागजों पर लिखकर प्रार्थना चक्रों के भीतर रखा जाता है। ऐसा विश्वास है कि चक्र को घुमाने से उतनी ही बार मंत्र का जप हो जाता है।
  • चट्टानों और दीवारों पर उत्कीर्णन: इसे 'मणि पत्थरों' पर उकेरा जाता है ताकि राह चलते लोगों की दृष्टि इस पर पड़े और उनका मन अनायास ही करुणा और पवित्रता से भर जाए।
  • श्वास के साथ समन्वय: जप करते समय श्वास अंदर लेते और छोड़ते समय मानसिक रूप से 'ॐ' से 'हूँ' तक की यात्रा का अनुभव किया जाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

मंत्र के प्रत्येक अक्षर (षडक्षर) का अपना एक विशिष्ट दार्शनिक अर्थ है जो मानव शरीर के छह चक्रों और संसार के छह लोकों को शुद्ध करने की क्षमता रखता है। नीचे दी गई तालिका में इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ॐ (Om / Aum) प्रणव, ब्रह्मांडीय ध्वनि, आदिशक्ति यह समस्त ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। यह साधक के अहंकार, गर्व और ईर्ष्या के दोष को शुद्ध कर दिव्य शरीर, वाक् और मन के स्तर पर स्थापित करती है।
मणि मणि, रत्न, अमूल्य हीरा यह करुणा और बोधिचित्त (परम जागृति की इच्छा) के रत्न का प्रतीक है। यह सिखाता है कि वास्तविक मूल्य भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेम और परोपकार में है।
पद्मे कमल में स्थित, कमल पुष्प कमल की विशेषता है कि वह कीचड़ में उत्पन्न होता है किंतु उससे अलिप्त रहता है। यह प्रज्ञा का प्रतीक है जो हमें मोह-माया रूपी कीचड़ से ऊपर उठना सिखाती है।
हूँ (Hum / Hrih) अविभाज्य, चेतना का बीज मंत्र यह प्रज्ञा और करुणा के अटूट मिलन या अभेद एकता का प्रतीक है। यह चेतना की उस अवस्था को दर्शाता है जिसे कोई भी बाधा विभाजित नहीं कर सकती।
अक्षर 'ॐ' (विशेष) देव लोक की शुद्धि यह संसार के छह लोकों में से 'देव लोक' (अहंकार और गर्व का लोक) के बंधनों और कष्टों का निवारण करता है।
अक्षर 'मा' असुर लोक की शुद्धि यह ईर्ष्या, स्पर्धा और क्रोध से उत्पन्न होने वाले 'असुर लोक' की ऊर्जा को शांत कर समता भाव में बदलता है।
अक्षर 'णि' मानव लोक की शुद्धि यह मनुष्य योनि में व्याप्त इच्छाओं, लालसाओं, अज्ञान और मोह को शुद्ध करके धर्म और विवेक की प्रेरणा देता है।
अक्षर 'पद्' पशु लोक की शुद्धि यह पशुओं की भाँति केवल खाने-सोने और भयभीत रहने की प्रवृत्ति यानी 'तिर्यक्/पशु लोक' के अंधकार को दूर करता है।
अक्षर 'मे' प्रेत लोक की शुद्धि यह अत्यधिक लोभ, अतृप्ति और संकीर्णता से जुड़े 'प्रेत लोक' (Preta/Hungry Ghost Realm) की ऊर्जा को तृप्ति और उदारता में रूपांतरित करता है।
अक्षर 'हूँ' नारक लोक की शुद्धि यह अत्यधिक क्रूरता, द्वेष और पीड़ा से भरे 'नरक लोक' (Naraka/Hell Realm) की तीव्र ऊर्जा को शांति और शीतलता प्रदान करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस महामंत्र का इतिहास महायान बौद्ध धर्म के ग्रंथों, विशेष रूप से 'कारंडव्यूह सूत्र' में विस्तार से मिलता है। यह सूत्र अवलोकितेश्वर बोधिसत्व के महात्म्य, उनकी असीम करुणा और इस षडक्षर मंत्र की उत्पत्ति का प्राथमिक ग्रंथ है। कथा के अनुसार, जब बुद्ध शाक्यमुनि ने अपने शिष्यों को इस मंत्र के महत्त्व के बारे में बताया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि जो कोई भी इस मंत्र को सुनता है, पढ़ता है या इसका स्मरण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर बुद्धत्व के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।

कारंडव्यूह सूत्र के अनुसार, एक बार अवलोकितेश्वर बोधिसत्व ने नरक लोकों की यात्रा की। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने देखा कि जीवों को उनके कर्मों के फलस्वरूप भीषण यंत्रणाएँ मिल रही थीं। जैसे ही अवलोकितेश्वर ने उन दुखी जीवों के मध्य चरण रखे और उनके मुख से 'ॐ मणि पद्मे हूँ' मंत्र की ध्वनि प्रवाहित हुई, वैसे ही नरक की भयंकर अग्नि ठंडी हो गई, अस्त्र-शस्त्र फूलों में बदल गए और सभी जीव अपने कष्टों से मुक्त होकर उच्च लोकों या शुद्ध क्षेत्रों (सुखावती) की ओर प्रस्थान करने लगे। यह इस बात का प्रमाण है कि मंत्र की ध्वनि में प्रकृति के नियमों को प्रेम और करुणा के पक्ष में मोड़ने की अलौकिक क्षमता है।

इसके अतिरिक्त, तिब्बती इतिहास में यह माना जाता है कि महागुरु पद्मसंभव (गुरु रिनपोछे) और तिब्बत के राजा त्रिसोंग डेउटसेन के काल में इस मंत्र को तिब्बत की भूमि पर स्थापित किया गया था। यह मंत्र तिब्बती संस्कृति का प्राण बन गया। प्रत्येक बालक से लेकर वृद्ध तक, इस मंत्र को अपने श्वास-प्रश्वास के साथ जोड़ता है। तिब्बती विद्वान दलाई लामा अक्सर अपने उपदेशों में यह उल्लेख करते हैं कि 'ॐ मणि पद्मे हूँ' का जप करते समय हमें अपने मन में सभी जीवित प्राणियों के प्रति वास्तविक प्रेम और करुणा का भाव रखना चाहिए, अन्यथा केवल यांत्रिक रूप से उच्चारण करने से पूर्ण आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति नहीं होती।

सनातन और बौद्ध तांत्रिक परंपराओं में भी ध्वनियों (नाद योग) को ब्रह्मांडीय सृजन का आधार माना गया है। जिस प्रकार वेदों में 'ॐ'कार को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है, उसी प्रकार महायान और वज्रयान परंपरा में 'ॐ मणि पद्मे हूँ' को करुणा और प्रज्ञा का संयुक्त बीज माना गया है। यह प्राचीन ऋषियों और योगियों की उस सुदीर्घ साधना का परिणाम है, जिसमें उन्होंने मानव चेतना के सबसे गहरे स्तरों को स्पर्श किया और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ सीधा संवाद स्थापित करने के मार्ग खोजे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

नियमित रूप से 'ॐ मणि पद्मे हूँ' का ध्यान और जप करने से मानव जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यहाँ इसके 8 प्रमुख आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभों का वर्णन किया गया है:

1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

मंत्र की लयबद्ध आवृत्ति और श्वास का समन्वय मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है, जिससे चिंता, अवसाद और मानसिक अशांति स्वतः दूर होने लगती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का विकास

इस शक्तिशाली षडक्षर नाद के निरंतर कंपन से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि के प्रकाशमान ऊर्जा आवरण (औरा) का निर्माण होता है जो नकारात्मक शक्तियों को रोकता है.

3. कार्मिक शुद्धि

यह मंत्र अचेतन मन में दबे हुए नकारात्मक संस्कारों और बुरे कर्मों के बीजों को भस्म करता है, जिससे जीवन में नए और सकारात्मक कर्मों का मार्ग प्रशस्त होता है।

4. करुणा और प्रेम भाव में वृद्धि

चूँकि यह अवलोकितेश्वर का हृदय मंत्र है, इसके अभ्यास से साधक के हृदय में स्वार्थ की भावना समाप्त होती है और सभी जीवों के प्रति अहैतुकी करुणा उत्पन्न होती है।

5. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में सुधार

मंत्र जप के दौरान एक बिंदु पर मन को केंद्रित रखना पड़ता है, जिससे ध्यान की क्षमता बढ़ती है और विद्यार्थियों तथा कामकाजी लोगों की फोकस शक्ति तीव्र होती है।

6. प्रज्ञा और आत्म-बोध की प्राप्ति

'मणि' (करुणा) और 'पद्मे' (प्रज्ञा) का संतुलन साधक को जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझने और अज्ञान के अंधकार से बाहर निकलने में सहायता करता है।

7. दैवीय सुरक्षा और भय मुक्ति

कठिन परिस्थितियों, संकटों या अज्ञात भय के समय इस मंत्र का स्मरण करने से आंतरिक शक्ति जागृत होती है और साधक खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

8. आध्यात्मिक उन्नति और शांतिपूर्ण मरण

तिब्बती मान्यता के अनुसार, जीवन भर इस मंत्र की साधना करने वाला व्यक्ति मृत्यु के समय भयभीत नहीं होता और उसकी चेतना उच्च लोकों या शुद्ध क्षेत्रों में लीन होती है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note & EEAT)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह लेख हमारे वरिष्ठ संस्कृत भाषियों, वेदों एवं बौद्ध दर्शन के शोधकर्ताओं तथा आध्यात्मिक आचार्यों के मार्गदर्शन में संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस आलेख को तैयार करते समय महायान बौद्ध ग्रंथों जैसे 'कारंडव्यूह सूत्र', आचार्य संतदेवा के 'बोधिचर्यावतार', और आधुनिक तिब्बती आध्यात्मिक गुरुओं के वचनों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है।

हमारा उद्देश्य पाठकों तक भ्रामक या अतिशयोक्तिपूर्ण दावों के बिना, शुद्ध, तार्किक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से पुष्ट जानकारी पहुँचाना है। मंत्र साधना कोई जादुई चमत्कार नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, शुद्धि और आत्म-रूपांतरण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यदि आप इसे पूरी श्रद्धा, अनुशासन और सही दार्शनिक समझ के साथ अपने दैनिक जीवन में अपनाते हैं, तो यह आपके जीवन को एक नई सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न

बिलकुल नहीं। ब्रह्मांडीय ऊर्जा, करुणा और प्रेम किसी एक संप्रदाय की बपौती नहीं हैं। सनातन धर्म, अद्वैत वेदांत और सार्वभौमिक आध्यात्मिकता में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस मंत्र का जप कर सकता है। यह मंत्र किसी विशेष पूजा-पद्धति की मांग नहीं करता, बल्कि मन की पवित्रता और करुणा की भावना पर जोर देता है।

पारंपरिक रूप से इस मंत्र का जप रुद्राक्ष या बौद्ध माला (जिसमें 108 मनके होते हैं) पर कम से कम एक माला (108 बार) करना अत्यंत शुभ माना जाता है। हालांकि, संख्या से अधिक महत्त्वपूर्ण आपका भाव और एकाग्रता है। आप अपनी सुविधा के अनुसार 21, 51 या 108 बार इसका नियमित अभ्यास कर सकते हैं।

हाँ, मानसिक जप (अनुसार या मानस जप) इस मंत्र के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है। जब आप यात्रा कर रहे हों, कार्यालय में हों या ऐसे स्थान पर हों जहाँ जोर से बोलना संभव न हो, तब आप मन ही मन श्वास के साथ इस मंत्र का स्मरण कर सकते हैं। मानसिक जप से एकाग्रता और गहरी होती है।

हाँ, महायान बौद्ध धर्म और प्राचीन भारतीय सनातन दर्शन (विशेषकर तांत्रिक और योग परंपराओं) की जड़ें समान आध्यात्मिक भूमियों से जुड़ी हैं। 'ॐ'कार दोनों में समान रूप से सर्वोच्च प्रणव ध्वनि के रूप में स्वीकार किया गया है। मंत्रों के माध्यम से चक्रों की शुद्धि और चेतना का उत्थान भारतीय संस्कृति की साझी धरोहर है।

जप करते समय मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या क्रोध का भाव नहीं होना चाहिए। मंत्र का मूल अर्थ ही 'करुणा' है, इसलिए जप करते समय यह कल्पना करनी चाहिए कि आपके भीतर से निकली हुई करुणा की ऊर्जा संसार के सभी दुखी प्राणियों तक पहुँच रही है और उन्हें शांति प्रदान कर रही है।

© Bhaktilok.in - सर्वाधिकार सुरक्षित। सनातन एवं वैश्विक आध्यात्मिक ज्ञान का विश्वसनीय स्रोत।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

विज्ञापन · प्रायोजित सामग्री
Google AdSense / इन-आर्टिकल उत्तरदायी विज्ञापन स्थान (In-Article Unit)
वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

Om Mani Padme Hum: Meaning, Benefits and Chanting का महत्व और दिव्य पृष्ठभूमि

Om Mani Padme Hum: Meaning, Benefits and Chanting सनातन धर्म में अत्यंत प्रभावशाली और जाग्रत मंत्र माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र का नियमित जप करने से साधक को भगवान Avalokiteshvara का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। जब मनुष्य जीवन में कठिनाइयों, मानसिक अशांति या स्वास्थ्य समस्याओं से घिर जाता है, तब Avalokiteshvara की आराधना और इस महामंत्र का जप एक अचूक कवच की तरह कार्य करता है। यह मंत्र न केवल हमारे बाह्य जीवन को संतुलित करता है, बल्कि हमारे सूक्ष्म शरीर और चक्रों को भी ऊर्जावान बनाता है। जब साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ इस दिव्य ध्वनि का उच्चारण करता है, तो उसके भीतर की सुप्त चेतना जागृत होने लगती है और ईश्वरीय सत्ता से उसका संबंध प्रगाढ़ होता है।

मंत्र का जप करने की सही शास्त्रोक्त विधि

मंत्र साधना की पूर्ण सफलता के लिए शास्त्रों में एक निश्चित विधि और नियम बताए गए हैं। इस मंत्र का जप करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:

  • उत्तम समय : इस मंत्र के जाप के लिए सर्वोत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय माना जाता है। इस समय प्रकृति में सत्व गुण की प्रधानता होती है जिससे मन आसानी से एकाग्र हो जाता है।
  • दिशा और आसन: साधक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठना चाहिए।
  • जाप माला : इस दिव्य मंत्र का जप करने के लिए रुद्राक्ष माला का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • जप संख्या : प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जप करना अत्यंत फलदायी होता है।

मंत्र के दिव्य लाभ

नियमित रूप से इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: मंत्र की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को शांत करती हैं जिससे अनिद्रा, भय और चिंता का नाश होता है। यह मानसिक साहस को बढ़ाता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: घर के वातावरण में सकारात्मक कंपन उत्पन्न होते हैं जिससे वास्तु दोष और बुरी नजर का प्रभाव समाप्त होता है।
  3. शारीरिक आरोग्यता: ध्वनि कंपन से शरीर के भीतर के चक्र सक्रिय होते हैं, जो रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाते हैं। विशेषकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति। में लाभ होता है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति: साधक का मन अंतर्मुखी होता है, ध्यान में गहराई आती है और मानसिक एकाग्रता का विकास होता है।

जाप के दौरान सावधानियां

मंत्र जप एक अत्यंत संवेदनशील साधना है। जप के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष भावना न रखें। आचरण सात्विक रखें, मांसाहार और मद्यपान से पूर्णतः दूर रहें। मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शांत कंठ से करें, अधिक जोर से चिल्लाकर या अत्यंत मंद गति से न बोलें। साधना काल में ब्रह्मचर्य और सादगी का पालन करने से मंत्र की शक्ति शीघ्र जाग्रत होती है। मुख्य सावधानी के रूप में: स्वच्छता का ध्यान रखें, पूर्ण श्रद्धा और मौन भाव से जप करें। का सदैव पालन करना चाहिए।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां
प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
सकारात्मक ऊर्जा का संचार, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति।
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
स्वच्छता का ध्यान रखें, पूर्ण श्रद्धा और मौन भाव से जप करें।
मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान
इस पावन मंत्र का जप ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय में रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
विज्ञापन · प्रायोजित
Google AdSense / प्रायोजित विज्ञापन (300x250)