किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७॥
kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca tejo-rāśiṃ sarvato dīptimantam | paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantād dīptānalārka-dyutim aprameyam ||17||
भावार्थ: मैं आपको मुकुट धारण किए, गदा और चक्र धारण किए, तेज के ढेर के रूप में सब ओर दीप्तिमान देखता हूँ। आप चारों ओर से दुर्निरीक्ष्य हैं, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले और अप्रमेय हैं।
श्लोक का अर्थ एवं व्याख्या (Commentary)
अर्जुन भगवान् के आयुधों और तेज का वर्णन करते हैं।
प्रतिदिन गीता स्वाध्याय के चमत्कारी लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के नित्य पठन से मनुष्य के जीवन में कई चमत्कारी परिवर्तन आते हैं। व्यस्त दिनचर्या में से मात्र 1 मिनट निकालकर श्लोक पढ़ना भी मन को एक नई दिशा प्रदान करता है:
- मानसिक स्थिरता व एकाग्रता: नित्य गीता पाठ से मन की चंचलता समाप्त होती है और निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making) में सुधार होता है।
- तनाव और चिंता से मुक्ति: जब हम निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत समझते हैं, तो परिणामों का भय मिट जाता है और अवसाद (Depression) जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
- आत्मबल और आत्मविश्वास की जागृति: विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होकर कर्तव्य पथ पर डटे रहने का साहस मिलता है।
गीता स्वाध्याय के सरल नियम (Gita Sadhana Rules)
गीता का पठन करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करने से मानसिक शांति और पूर्ण लाभ प्राप्त होता है:
गीता स्वाध्याय सम्बन्धी आम प्रश्न (FAQs)
संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी
लेखन एवं संकलन
भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)
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तथ्य-जांच व धार्मिक समीक्षा
डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)
वैदिक संस्कृति व संस्कृत साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक अध्ययन)।
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