📜 सम्पूर्ण श्लोक · बाल काण्ड · सर्ग 3

राम की कहानी

वाल्मीकि रामायण के इस सर्ग के सभी 30 पावन श्लोक, मूल संस्कृत पाठ, अन्वय और सरल हिंदी अनुवाद सहित।

30 सम्पूर्ण श्लोक
3 सर्ग संख्या
28 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सम्पूर्ण पावन श्लोक सूची

श्लोक संख्या पर सीधे जाएँ:
श्लोक संख्या 21

राघवस्य विलापं च गृध्रराजनिबर्हणम् । कबन्धदर्शनं चैव पम्पायाश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राघव (राम) का विलाप, गृध्रराज (जटायु) का वध, कबन्ध का दर्शन तथा पम्पा सरोवर का भी दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक राम के वनवास के दुःखद घटनाक्रम को संक्षेप में बताता है - सीता की खोज में व्याकुल राम का विलाप, वीर जटायु का रावण से युद्ध करते हुए वध, तथा आगे की यात्रा में राम का कबन्ध नामक राक्षस से मिलना और पम्पा सरोवर के तट पर पहुँचना। ये घटनाएँ राम के जीवन में संक्रमणकालीन क्षण हैं, जो उन्हें हनुमान और सुग्रीव से मिलाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के उस महत्वपूर्ण चरण को चिन्हित करता है जहाँ करुणा और दुःख चरम पर है। जटायु का बलिदान अद्वितीय है, जिसने रावण को रोकने का प्रयास किया। कबन्ध की कथा राम और लक्ष्मण को सुग्रीव से मिलने की प्रेरणा देती है। पम्पा सरोवर का वर्णन प्राकृतिक सौंदर्य और राम के मानसिक दुःख के विरोधाभास को दर्शाता है।
श्लोक संख्या 22

शबरीदर्शनं चैव फलमूलाशनं तथा । प्रलापं चैव पम्पायां हनूमद्दर्शनं तथा ॥

हिंदी भावार्थ:

“शबरी का दर्शन, फल-मूल का भोजन, पम्पा सरोवर पर विलाप और हनुमान का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

राम और लक्ष्मण की भेंट शबरी से होती है, जो उन्हें भक्तिभाव से फल खिलाती है। तत्पश्चात राम पम्पा सरोवर पर फिर से सीता के वियोग में विलाप करते हैं। वहीं उनकी भेंट हनुमान से होती है, जो सुग्रीव के दूत के रूप में आते हैं।

टिप्पणी: शबरी का प्रसंग भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। उसने राम के आने की प्रतीक्षा में वर्षों बिताए। राम ने उसके द्वारा चखे हुए फल खाकर उसकी भक्ति को सर्वोच्च सम्मान दिया। पम्पा पर विलाप राम के विरह का चरम है। इसी बीच हनुमान का आगमन होता है, जो राम के दुःख को दूर करने वाले मित्र और सेवक के रूप में उभरते हैं।
श्लोक संख्या 23

ऋष्यमूकस्य गमनं सुग्रीवेण समागमम् । प्रत्ययोत्पादनं सख्यं वालिसुग्रीवविग्रहम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“ऋष्यमूक पर्वत पर जाना, सुग्रीव से मिलना, विश्वास उत्पन्न करना, मित्रता करना और वालि-सुग्रीव के बीच वैर का वर्णन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान के कहने पर राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर जाते हैं और वहाँ सुग्रीव से मिलते हैं। सुग्रीव को राम पर विश्वास दिलाया जाता है, और दोनों में अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता होती है। सुग्रीव अपने बड़े भाई वालि से हुए विग्रह (झगड़े) का वर्णन करते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और भावनात्मक गठजोड़ को दर्शाता है। राम और सुग्रीव की मित्रता धर्म और आपसी लाभ पर आधारित थी। सुग्रीव को वालि के भय से मुक्ति चाहिए थी, और राम को सीता की खोज के लिए एक शक्तिशाली सहयोगी की आवश्यकता थी। हनुमान ने इस मित्रता में सेतु का कार्य किया।
श्लोक संख्या 24

वालिप्रमथनं चैव सुग्रीवप्रतिपादनम् । ताराविलापं समयं वर्षरात्रनिवासनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“वालि का वध, सुग्रीव को राज्य सौंपना, तारा का विलाप, ऋतु (वर्षा) की रातों में निवास करना।”

विशेष व्याख्या:

राम द्वारा वालि का वध किए जाने के बाद, सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बनाया जाता है। वालि की पत्नी तारा विलाप करती है। राम और लक्ष्मण वर्षा ऋतु की रातें उसी क्षेत्र में बिताते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक राम के वचनबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने सुग्रीव को वालि से मुक्ति दिलाई और उसे राजा बनाया। तारा का विलाप करुणा का अद्भुत उदाहरण है, जो युद्ध की विभीषिका को दर्शाता है। वर्षा ऋतु का वर्णन राम के धैर्य और प्रतीक्षा को दर्शाता है, क्योंकि वर्षा समाप्त होने पर ही सीता की खोज का अभियान शुरू हो सकता था।
श्लोक संख्या 25

कोपं राघवसिंहस्य बलानामुपसंग्रहम् । दिशः प्रस्थापनं चैव पृथिव्याश्च निवेदनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राघवसिंह (राम) के क्रोध को, (वानर) सेनाओं के एकत्रीकरण को, दिशाओं में भेजे जाने को तथा पृथ्वी का (सीता के बारे में) समाचार न देने का वर्णन।”

विशेष व्याख्या:

जब वर्षा ऋतु बीत गई और सुग्रीव ने सीता की खोज में कोई पहल नहीं की, तो राम को बहुत क्रोध आया। इस पर सुग्रीव ने सभी दिशाओं में वानर सेनाएँ भेजीं। लेकिन उन सेनाओं को सीता का कोई पता नहीं चला।

टिप्पणी: यह श्लोक राम के सिंह-समान क्रोध को दर्शाता है, जो उनके नेतृत्व कौशल और समय के महत्व को रेखांकित करता है। सुग्रीव की निष्क्रियता से कुपित होकर, राम ने उसे उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाया। इसके बाद व्यापक स्तर पर खोज अभियान शुरू हुआ। सभी दिशाओं में वानर भेजे गए, लेकिन प्रारंभिक प्रयास असफल रहे, जिससे राम की चिंता और बढ़ गई।
श्लोक संख्या 26

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम् । प्रायोपवेशनं चैव संपातेश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“अंगूठी का दान, ऋक्ष (भालू) की गुफा का दर्शन, प्रायोपवेशन (भूख पर आसन) और संपाति का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान को सीता को पहचानने के लिए राम ने अपनी अंगूठी दी। रास्ते में उन्हें एक भालू (ऋक्ष) की गुफा दिखी। जब खोजी दल को सीता का कोई पता नहीं चला और समय सीमा समाप्त हो गई, तो उन्होंने प्रायोपवेशन (भूख पर बैठने) का निर्णय लिया। तभी उनकी भेंट गृध्र संपाति से हुई।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान के दक्षिण दिशा अभियान की महत्वपूर्ण घटनाओं को समेटे हुए है। राम की अंगूठी सीता के लिए विश्वास का प्रतीक थी। प्रायोपवेशन दल के समर्पण और निराशा की चरम सीमा को दर्शाता है। संपाति का दर्शन एक दैवीय हस्तक्षेप है, जो उन्हें सीता के लंका में होने की सूचना देता है।
श्लोक संख्या 27

पर्वतारोहणं चैव सागरस्यापि लङ्घनम् । समुद्रवचनाच्चैव मैनाकस्य च दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“पर्वत पर चढ़ना, सागर का लंघन करना, समुद्र के वचन से मैनाक पर्वत का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान लंका जाने के लिए महेन्द्र पर्वत पर चढ़े और फिर उससे छलांग लगाकर समुद्र का लंघन किया। समुद्र ने उनकी परीक्षा ली और फिर मैनाक पर्वत को उनके विश्राम के लिए प्रकट होने का आदेश दिया।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान की अद्भुत शक्ति और दृढ़ संकल्प का परिचायक है। सौ योजन (लगभग 1200 किमी) चौड़े समुद्र को लाँघना असंभव-सा कार्य था, लेकिन राम-कार्य के प्रति समर्पण ने हनुमान को यह शक्ति प्रदान की। समुद्र ने उनकी परीक्षा लेने के लिए मैनाक को बीच में भेजा, लेकिन हनुमान ने उसे केवल स्पर्श किया और आगे बढ़ गए।
श्लोक संख्या 28

राक्षसीतर्जनं चैव च्छायाग्राहस्य दर्शनम् । सिंहिकायाश्च निधनं लङ्कामलयदर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राक्षसियों (लंकिनी) की धमकी, छायाग्राह (सिंहिका) का दर्शन, सिंहिका का वध तथा लंका और मलय पर्वत का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

लंका पहुँचने पर हनुमान का सामना लंका की रक्षिका राक्षसी लंकिनी से हुआ, जिसने उन्हें रोका। हनुमान ने उसे मारा। आगे बढ़ने पर उन्हें छायाग्राही राक्षसी सिंहिका दिखी, जिसका उन्होंने वध किया। अंत में उन्होंने लंका और मलय पर्वत का दर्शन किया।

टिप्पणी: यह श्लोक लंका में प्रवेश से पूर्व हनुमान की अंतिम बाधाओं और उनकी विजय का वर्णन करता है। लंकिनी का दमन लंका की सुरक्षा व्यवस्था के भेदन का प्रतीक है। सिंहिका का वध उनके ज्ञान और सतर्कता को दर्शाता है। अंत में लंका का दर्शन उनके मिशन के सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचने का सूचक है।
श्लोक संख्या 29

रात्रौ लङ्काप्रवेशं च एकस्यापि विचिन्तनम् । आपानभूमिगमनमवरोधस्य दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“रात्रि में लंका में प्रवेश, अकेले (सीता के विषय में) चिंतन, मदिरालय (आपानभूमि) में जाना और अन्तःपुर (अवरोध) का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान ने रात के समय लंका में प्रवेश किया और सीता की खोज के लिए अकेले ही योजना बनाई। उन्होंने रावण के मदिरालय (आपानभूमि) का भ्रमण किया और फिर अन्तःपुर (रानियों के निवास) को देखा।

टिप्पणी: हनुमान की बुद्धिमत्ता और रणनीति का परिचायक है यह श्लोक। उन्होंने रात्रि के अंधेरे का लाभ उठाकर नगर में प्रवेश किया। एकाकी चिंतन उनके गंभीर और विवेकशील स्वभाव को दर्शाता है। आपानभूमि और अन्तःपुर का भ्रमण उनकी खोज की व्यवस्थित पद्धति को बताता है।
श्लोक संख्या 30

दर्शनं रावणस्यापि पुष्पकस्य च दर्शनम् । अशोकवनिकायानं सीतायाश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“रावण का दर्शन, पुष्पक विमान का दर्शन, अशोक वाटिका में जाना तथा सीता का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान ने सर्वप्रथम रावण को उसके वैभव के साथ देखा और पुष्पक विमान को भी देखा। तत्पश्चात वे अशोक वाटिका में गए, जहाँ उन्होंने अंततः सीता को देखा।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान के मिशन की सफलता का सूचक है। रावण का दर्शन शत्रु के बल और वैभव का आकलन करने का अवसर था। पुष्पक विमान रावण की समृद्धि का प्रतीक था। अशोक वाटिका में सीता का दर्शन ही हनुमान के सम्पूर्ण अभियान का चरम बिंदु था। यह उनके धैर्य, साहस और भक्ति का फल था।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।