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प्रीतः कश्चिन्मुनिस्ताभ्यां संस्थितः कलशं ददौ। प्रसन्नो वल्कलं कश्चिद्ददौ ताभ्यां महायशाः॥
हिंदी भावार्थ:
“उनसे प्रसन्न होकर कोई मुनि वहाँ से उठकर उन्हें कलश देने लगा, तो किसी महायशा मुनि ने प्रसन्न होकर उन्हें वल्कल (वस्त्र) दिया।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक उस दृश्य का वर्णन करता है जब भगवान राम एवं लक्ष्मण, विश्वामित्र के साथ ऋषियों के आश्रम में पहुँचे और सभी मुनि उनके दिव्य व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रसन्न हुए। प्रसन्नता के आवेग में विभिन्न मुनि अपने-अपने आसन से उठे और राम-लक्ष्मण को आशीर्वाद स्वरूप उपहार देने लगे। कोई कलश (जल-पात्र) भेंट कर रहा है तो कोई वल्कल (वन-वस्त्र)। यह दृश्य भक्ति एवं गुरु-शिष्य परम्परा के आदान-प्रदान को दर्शाता है।
टिप्पणी: जब राम और लक्ष्मण ऋषियों के बीच पधारे तो वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो गया। मुनिगण उनके तेज एवं सौम्यता पर मुग्ध होकर अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए और प्रेमपूर्वक उपहार अर्पित करने लगे। यह केवल भौतिक वस्तुओं का दान नहीं था, अपितु अपने तपोबल से सिद्ध किए गए पवित्र पदार्थों का समर्पण था। कलश जल की शुद्धि का प्रतीक है और वल्कल सादगी एवं त्याग का। यह श्लोक सिखाता है कि सच्चे साधक के हृदय में जब आदर्श पुरुष के दर्शन होते हैं तो वह उनके चरणों में अपनी सर्वस्व निछावर कर देता है।
अन्यः कृष्णाजिनं प्रादान्मौञ्जीमन्यो महामुनिः। कश्चित्कमण्डलुं प्रादाद्यज्ञसूत्रं तथापरः॥
हिंदी भावार्थ:
“किसी अन्य ने कृष्णाजिन (काला मृगचर्म) दिया, किसी महामुनि ने मौञ्जी (मेखला) दी, किसी ने कमण्डलु दिया और किसी अन्य ने यज्ञसूत्र दिया।”
विशेष व्याख्या:
इस श्लोक में अन्य मुनियों द्वारा राम-लक्ष्मण को दिए गए विविध उपहारों का वर्णन है – कृष्णाजिन (मृगचर्म), मौञ्जी (मेखला), कमण्डलु (जलपात्र) तथा यज्ञसूत्र। ये सभी वस्तुएँ वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के साधकों के लिए आवश्यक तथा पवित्र मानी जाती हैं।
टिप्पणी: इस श्लोक में चार प्रकार की पवित्र वस्तुओं का उल्लेख है – कृष्णाजिन (काला मृगचर्म) आसन के रूप में प्रयुक्त होता है, जो तपस्या का प्रतीक है। मौञ्जी (मूँज से बनी मेखला) ब्रह्मचर्य एवं संयम का प्रतीक है। कमण्डलु साधु के जलपात्र के रूप में त्याग एवं स्वावलम्बन का प्रतीक है। यज्ञसूत्र (यज्ञोपवीत) ब्राह्मणता एवं यज्ञाधिकार का सूचक है। ये सभी उपहार राम एवं लक्ष्मण के भावी जीवन में तपस्वी एवं योद्धा के रूप में उनकी भूमिका के अनुरूप हैं। मुनियों का यह कार्य यह भी दर्शाता है कि वे राम-लक्ष्मण को केवल राजकुमार ही नहीं, बल्कि भावी धर्मरक्षक एवं तपस्वी के रूप में देख रहे थे।
औदुम्बरीं ब्रुसीमन्यो जपमालामथापरः। ब्रुसीमन्यस्तदा प्रादात्कौपीनमपरो मुनिः॥
हिंदी भावार्थ:
“किसी ने औदुम्बरी (गूलर की) ब्रुसी (कुशा), किसी ने जपमाला, किसी ने ब्रुसी और किसी मुनि ने कौपीन (लंगोट) दिया।”
विशेष व्याख्या:
इस श्लोक में आगे के उपहारों का वर्णन है – औदुम्बरी ब्रुसी (गूलर की लकड़ी से बनी कुशा या आसन), जपमाला, पुनः ब्रुसी और कौपीन (लंगोट)। ये सभी वस्तुएँ तपस्वी जीवन के लिए अत्यावश्यक हैं।
टिप्पणी: इस श्लोक में चार प्रकार की वस्तुओं का उल्लेख है – औदुम्बरी ब्रुसी (गूलर की लकड़ी से निर्मित आसन या झाड़ू), जपमाला (मंत्र जप के लिए), पुनः ब्रुसी (संभवतः पिछली ब्रुसी से भिन्न प्रकार की) और कौपीन (लंगोट)। ये सभी वस्तुएँ साधक के जीवन को अनुशासित एवं पवित्र बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। विशेष रूप से कौपीन (लंगोट) वानप्रस्थ एवं संन्यासियों का अत्यंत संक्षिप्त वस्त्र है, जो पूर्ण त्याग एवं ब्रह्मचर्य का प्रतीक है।
ताभ्यां ददौ तदा हृष्टः कुठारमपरो मुनिः। काषायमपरो वस्त्रं चीरमन्यो ददौ मुनिः॥
हिंदी भावार्थ:
“तब किसी हर्षित मुनि ने उन दोनों को कुठार (कुल्हाड़ी) दिया, किसी अन्य ने काषाय वस्त्र (भगवा वस्त्र) और किसी दूसरे मुनि ने चीर (वल्कल) दिया।”
विशेष व्याख्या:
इस श्लोक में कुछ और मुनियों द्वारा दिए गए उपहारों का वर्णन है – कुठार (कुल्हाड़ी), काषाय वस्त्र (भगवा वस्त्र) तथा चीर (वल्कल)। कुठार यज्ञ के लिए समिधा काटने या आश्रम की व्यवस्था हेतु उपयोगी था। काषाय वस्त्र त्याग और संन्यास का प्रतीक है, तो चीर (वल्कल) वनवासियों का साधारण वस्त्र।
टिप्पणी: इस श्लोक में दिए गए उपहार यज्ञ एवं वन-जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं। कुठार (कुल्हाड़ी) से समिधा (लकड़ियाँ) काटी जाती हैं, जो यज्ञ में आहुति के लिए आवश्यक हैं। काषाय वस्त्र (भगवा वस्त्र) संन्यास एवं त्याग का प्रतीक है, जो राम के वनगमन के समय उनके भाव से मेल खाता है। चीर (वल्कल) वही वस्त्र है जो राम एवं लक्ष्मण ने वनवास के आरम्भ में धारण किया था। यह श्लोक संकेत करता है कि मुनि राम-लक्ष्मण के भावी जीवन को जानते थे, अतः उन्हें वे सभी वस्तुएँ दे रहे थे जो वन में काम आएँगी।
जटाबन्धनमन्यस्तु काष्ठरज्जुं मुदान्वितः। यज्ञभाण्डमृषिः कश्चित्काष्ठभारं तथापरः॥
हिंदी भावार्थ:
“किसी आनन्दित मुनि ने जटाबन्धन की रस्सी दी, किसी ऋषि ने यज्ञ के भाण्ड दिए और किसी अन्य ने काष्ठ (समिधा) का भार दिया।”
विशेष व्याख्या:
इस अंतिम श्लोक में मुनियों द्वारा दी गई अन्य वस्तुओं का उल्लेख है – जटाबन्धन की रस्सी (जटाओं को बाँधने के लिए), यज्ञभाण्ड (यज्ञ के पात्र) तथा काष्ठभार (समिधा या लकड़ियों का बोझ)। ये सभी वस्तुएँ यज्ञ एवं तपस्या के लिए अत्यावश्यक हैं।
टिप्पणी: इस श्लोक में अंतिम उपहारों का वर्णन है। जटाबन्धन की रस्सी (जटा-रज्जु) से जटाओं को बाँधकर सुव्यवस्थित रखा जाता था – यह तपस्वी के केश-विन्यास का आवश्यक अंग था। यज्ञभाण्ड वे पात्र हैं जिनमें यज्ञ की सामग्री रखी जाती है। काष्ठभार यज्ञ की समिधा के लिए लकड़ियों का बंडल है। इन सबके द्वारा मुनि यह संकेत दे रहे थे कि राम-लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए सभी आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा दी गई है। अब वे विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए पूर्णतया सुसज्जित हैं।
शोधकर्ता व व्याख्याता
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
संपादकीय समीक्षा
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।