🕉️ अरण्य काण्ड · सर्ग 31

रावण को अकम्पन द्वारा खर-दूषण वध की सूचना

अरण्यकाण्ड के इकतीसवें सर्ग में युद्ध से बचा हुआ राक्षस अकम्पन लंका जाकर रावण को खर-दूषण के वध का समाचार सुनाता है। वह राम के अद्भुत पराक्रम का वर्णन करता है और सीता हरण का सुझाव देता है, जिससे रावण की क्रोधाग्नि प्रज्वलित होती है।

0 सम्पूर्ण श्लोक
31 सर्ग संख्या
23 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

अरण्यकाण्ड के इकतीसवें सर्ग में युद्ध से बचा हुआ राक्षस अकम्पन लंका जाकर रावण को खर-दूषण के वध का समाचार सुनाता है। वह राम के अद्भुत पराक्रम का वर्णन करता है और सीता हरण का सुझाव देता है, जिससे रावण की क्रोधाग्नि प्रज्वलित होती है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

पूर्व सर्ग में खर-दूषण सहित चौदह हजार राक्षसों का वध हो चुका है। इस सर्ग के आरम्भ में अकम्पन नामक राक्षस, जो उस युद्ध से बच निकला था, लंका पहुँचता है और रावण के दरबार में जाकर उसे सारा वृत्तान्त सुनाता है। वह बताता है कि राम नामक एक मनुष्य ने अकेले ही खर-दूषण सहित विशाल राक्षस सेना का संहार कर दिया। अकम्पन राम की वीरता, धनुर्विद्या और अलौकिक शक्ति का विस्तार से वर्णन करता है। वह यह भी कहता है कि राम के समक्ष कोई भी राक्षस टिक नहीं सकता। रावण यह सुनकर क्रोधित होता है, लेकिन अकम्पन उसे शांत करते हुए एक उपाय सुझाता है – सीता का हरण। उसके अनुसार, सीता राम की पत्नी है और उसके वियोग में राम असमर्थ हो जाएगा। यह सुझाव रावण को रास आता है और वह सीता हरण की योजना बनाने लगता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ३१

(रावण को अकम्पन द्वारा खर-दूषण वध की सूचना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : खर-दूषण वध के पश्चात् अकम्पन नामक राक्षस युद्ध से बचकर लंका पहुँचता है और रावण को सारा वृत्तान्त सुनाता है। वह राम के अद्वितीय पराक्रम का वर्णन करता है और सुझाव देता है कि यदि सीता का हरण कर लिया जाए तो राम को पराजित किया जा सकता है। यह सर्ग रावण के क्रोध और सीता हरण की योजना का आधार तैयार करता है।

🏰 अकम्पन का लंका प्रवेश एवं रावण से संवाद (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः प्रविश्य नगरीं लङ्कां रावणपालिताम् ।
अकम्पनो महातेजा रावणं समुपागमत् ॥
प्रणम्य शिरसा देवं रावणं वाक्यमब्रवीत् ।
स्वस्ति प्राप्तोऽस्मि भद्रं ते देव रामेण धीमता ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तत्पश्चात्; प्रविश्य = प्रवेश करके; नगरीम् = नगरी में; लङ्काम् = लंका; रावणपालिताम् = रावण द्वारा पालित; अकम्पनः = अकम्पन; महातेजाः = महान तेजस्वी; रावणम् = रावण के; समुपागमत् = समीप आया; प्रणम्य = प्रणाम करके; शिरसा = सिर से; देवम् = देव को; रावणम् = रावण से; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोला; स्वस्ति = कुशल; प्राप्तः = प्राप्त; अस्मि = हूँ; भद्रम् = कल्याण; ते = आपका; देव = हे देव; रामेण = राम के द्वारा; धीमता = बुद्धिमान के द्वारा।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् महातेजस्वी अकम्पन रावण द्वारा पालित लंका नगरी में प्रवेश करके रावण के पास गया। सिर झुकाकर देव रावण को प्रणाम करके वह बोला: "हे देव! मैं कुशलपूर्वक आपके समक्ष उपस्थित हूँ। उस बुद्धिमान राम के कारण..." (आगे का वचन अगले श्लोक में)।
🔍 व्याख्या : अकम्पन सीधे रावण के दरबार में जाता है और विनम्रतापूर्वक समाचार सुनाने की तैयारी करता है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
हताः खरश्च दूषणश्च त्रिशिराश्च निपातितः ।
चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां तरस्विनाम् ॥
रामेणैकेन वीरेण धनुषा विद्यया बलात् ।
सीतायाः सन्निधौ सर्वे निहताः संशितव्रताः ॥
📖 भावार्थ : "खर और दूषण मारे गए, त्रिशिरा भी गिराया गया। चौदह हजार बलशाली राक्षसों का वध उस एक वीर राम ने अपने धनुष और बल से कर दिया। सीता के सामने ही वे सब कठोर व्रतधारी राक्षस मारे गए।"
🔍 व्याख्या : अकम्पन स्पष्ट करता है कि यह कार्य अकेले राम ने किया, और वह भी सीता के साक्षात् समक्ष। यह राम की शक्ति को दर्शाता है।

⚔️ राम के पराक्रम का वर्णन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१२ ॥
रामो नाम महातेजा दाशरथिररिंदमः ।
सीतया सह धर्मात्मा लक्ष्मणेन च धन्विना ॥
वने विचरते वीरो राक्षसानां भयावहः ।
तेन खरश्च दूषणश्च त्रिशिराश्च निपातिताः ॥
📖 भावार्थ : "राम नाम के वह महातेजस्वी, दशरथपुत्र, शत्रुओं को दमन करने वाले, धर्मात्मा, सीता और धनुषधारी लक्ष्मण के साथ वन में विचरण करते हैं, जो राक्षसों के लिए भयावह हैं। उन्हीं के द्वारा खर, दूषण और त्रिशिरा मारे गए।"
🔍 व्याख्या : अकम्पन राम का परिचय देते हुए उनकी अदम्य वीरता का बखान करता है, जिससे रावण के मन में राम के प्रति जिज्ञासा और क्रोध दोनों उत्पन्न होते हैं।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
न मायाश्च न मन्त्राश्च नास्त्राणि विविधानि च ।
प्राकुर्वन् राक्षसास्तत्र यदा रामेण युध्यत ॥
शरैः स निशितै राजन् रामो भरतवर्धनः ।
अवधीद्राक्षसान् सर्वान् क्रोधाद्दीप्ताग्निसन्निभः ॥
📖 भावार्थ : "हे राजन्! जब राम से युद्ध हुआ, तब न तो राक्षसों की माया काम आई, न मन्त्र, न ही अस्त्र। राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन सब राक्षसों का वध कर दिया, मानो क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो।"

🎯 सीता हरण का सुझाव (श्लोक २१-२८)

॥ श्लोक २५-२६ ॥
तस्मात्त्वं कुरु राजेन्द्र सीताया हरणं प्रभो ।
रामः सीतामनुप्राप्य प्राणांस्त्यक्ष्यति संयुगे ॥
हृतायां तु तया सीतायां रामः शोकपरायणः ।
न शक्तो भविता युद्धे त्वां प्रति द्रुम्हणं प्रभो ॥
📖 भावार्थ : "हे राजेन्द्र! इसलिए आप सीता का हरण कीजिए। राम सीता के वियोग में प्राण त्याग देंगे या युद्ध में असमर्थ हो जाएँगे। सीता के हर लिए जाने पर राम शोकग्रस्त हो जाएँगे और आपसे युद्ध करने में सक्षम नहीं रहेंगे।"
🔍 व्याख्या : अकम्पन का यह कुटिल परामर्श ही आगे चलकर सीता हरण का कारण बनता है। यह रावण के लिए राम को पराजित करने का सबसे सरल उपाय प्रतीत होता है।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
तच्छ्रुत्वा रावणो वाक्यमकम्पनसमीरितम् ।
प्रहृष्टवदनो राजा बाष्पपूर्णेक्षणोऽभवत् ॥
ततः स चिन्तयामास हरणं जानकीप्रति ।
मारीचस्य सहायार्थं त्वरितः समुपागमत् ॥
📖 भावार्थ : अकम्पन के वचन सुनकर रावण के मुख पर हर्ष छा गया और उसकी आँखें उत्सुकता से भर गईं। तब वह सीता के हरण की योजना सोचने लगा और सहायता के लिए तुरन्त मारीच के पास गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👹 रावण का क्रोध एवं अहंकार

इस सर्ग में रावण का क्रोध तो दर्शाया गया है, किन्तु साथ ही उसकी चतुराई भी कि वह अकम्पन के सुझाव को तुरन्त ग्रहण कर लेता है। यह रावण के व्यावहारिक स्वरूप को उजागर करता है, जो बल से पराजय देखकर छल का सहारा लेता है।

🌪️ अकम्पन का दूरदर्शितापूर्ण परामर्श

अकम्पन राम की वास्तविक शक्ति को पहचानता है और यह भी जानता है कि सीता ही राम की सबसे बड़ी कमजोरी है। उसका यह परामर्श राम-रावण कथा को नई दिशा देता है।

⚡ राम के पराक्रम का बखान

अकम्पन द्वारा राम के पराक्रम का विस्तृत वर्णन शत्रु-पक्ष से भी राम की महानता को प्रमाणित करता है। वह स्वयं राक्षस होते हुए भी राम की अजेयता स्वीकार करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि बल के आगे झुकने के बाद भी कुटिल मनुष्य छल का सहारा ले सकता है। रावण ने अकम्पन की बात मानकर अधर्म का मार्ग चुना, जो अंततः उसके विनाश का कारण बना। हमें सदा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, चाहे शत्रु कितना भी प्रबल क्यों न हो।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।