सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
अरण्यकाण्ड का सड़सठवाँ सर्ग राम और लक्ष्मण की जटायु से भेंट का वर्णन करता है। मरणासन्न जटायु राम को सीता के हरण की सूचना देता है और रावण द्वारा दक्षिण दिशा में ले जाने की बात बताता है। राम जटायु की दशा देखकर शोकाकुल होते हैं और उसकी अंतिम क्रिया करते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६७
(राम की जटायु से भेंट – जटायु का बलिदान)
🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में व्याकुल राम और लक्ष्मण वन-वन भटक रहे हैं। तभी उन्हें घायल अवस्था में जटायु दिखते हैं। यह सर्ग उस मार्मिक भेंट और जटायु द्वारा सीता हरण का समाचार देने की कथा कहता है। राम का शोक और जटायु का बलिदान इस सर्ग के केन्द्र में हैं।
🦅 जटायु का दर्शन (श्लोक १-६)
शरैर्भिन्नं महाबाहुः पतितं रुधिरोक्षितम् ॥
तं दृष्ट्वा राघवो वीरः सीतामार्गमनुव्रतः ।
उपागम्य महातेजाः परिष्वज्य च दुःखितः ॥
रावणेन दुरात्मना युध्यता मम पश्यतः ॥
स गृध्रराजो रामेण पृष्टस्तत्त्वेन वै तदा ।
आचचक्षे महाबाहुः सर्वं रावणचेष्टितम् ॥
📜 जटायु का वृत्तांत (श्लोक ७-१६)
इत्युक्त्वा प्रहसन्राम युयुधे तेन संगतः ॥
स रावणो मया दृष्टः सीतया सह संगतः ।
आकाशमाश्रितो वीर त्वरमाणो महाबलः ॥
तस्याहं प्रहसन्वाक्यं श्रुत्वा राम त्वरान्वितः ।
उत्पत्य वेगवान्स्थानात्पक्षाभ्यां समयोधयम् ॥
रथाश्वौ च हतौ भूमौ पातितश्च महारथः ॥
स मां प्रहारैर्बहुभी रावणः समताडयत् ।
अहं च तं महाबाहो पक्षाभ्यां समताडयम् ॥
ततो मां रावणः क्रुद्धो बाणैः संताड्य दुःसहैः ।
पातयामास भूमौ मां छिन्नपक्षं नरर्षभ ॥
नीता राम महाबाहो तत्र गच्छ त्वरान्वितः ॥
इत्युक्त्वा विररामाथ जटायु रघुनन्दन ।
रामो जटायुना सार्धं शोकं प्राप सुदुःखितः ॥
😢 राम का विलाप और जटायु का स्वर्गारोहण (श्लोक १७-२६)
क्व गता त्वं विनिष्क्रान्ता हा नाथेति च राघवः ॥
अहो दैवमहो कालोऽहो धातुरचिन्तितम् ।
यदहं त्वां समासाद्य गतासुं शोचयाम्यहम् ॥
ततो रामो महातेजा जटायुं प्रेतमब्रवीत् ।
गच्छ राजन्सुखं स्वर्गं मया दृष्टो असि पक्षिराट् ॥
🔥 अंतिम संस्कार और दक्षिण प्रस्थान (श्लोक २७-३४)
चकार विधिवद्राजा लक्ष्मणेन सहानघः ॥
चितां चित्वा महाबाहुर्जटायोः पक्षिसत्तमः ।
ददाहैनं यथान्यायं सलिलं चापि दत्तवान् ॥
ततः कृतोदकः श्रीमान्लक्ष्मणेन सहानघः ।
प्रतस्थे दक्षिणां दिशं सीतामन्वेषितुं वने ॥
🕊️ सीख : जटायु का बलिदान बताता है कि सज्जनों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना भी धर्म है। राम ने जटायु को पितृतुल्य सम्मान देकर यह सिखाया कि मित्रता निभाने वाला सदैव पूजनीय होता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।