सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम एवं लक्ष्मण, सीता की खोज करते हुए, दण्डकारण्य में एक भयंकर राक्षस कबंध से भिड़ जाते हैं। कबंध उन्हें अपनी लंबी भुजाओं से जकड़ लेता है। राम और लक्ष्मण उसकी दोनों भुजाएँ काट डालते हैं, जिससे कबंध मुक्त होता है और अपने शाप से उद्धार पाकर उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मिलने का निर्देश देता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ७०
(कबंध की लंबी भुजाओं का काटा जाना – कबंध-वध)
🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में व्याकुल राम एवं लक्ष्मण जब घोर वन में भटक रहे थे, तब उनका सामना एक विकराल राक्षस से हुआ, जिसका नाम था कबंध। यह सर्ग उसी भयंकर युद्ध और अन्ततः कबंध के उद्धार की कथा प्रस्तुत करता है।
👹 कबंध का विकराल रूप और भुजाओं का बंधन (श्लोक १-८)
बाहू प्रगृह्य विपुलौ जग्राह बलिनां वरः ॥
तौ दृष्ट्वा राघवौ वीरौ कबन्धेन समावृतौ ।
विषण्णवदनौ दीनौ नष्टसंज्ञावभूततुः ॥
स तु बाहुभिरायम्य तौ वीरौ राक्षसाधमः ।
प्रगृह्य बलवान् राजन् पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥
कौ युवां केन वा दृष्टौ किमर्थमिह चागतौ ।
सत्यं कथयतां वीरौ यदि वां जीवितं प्रियम् ॥
⚔️ भुजाओं का काटा जाना और कबंध का गिरना (श्लोक ९-१६)
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो बाहू छिन्द्धि महाबलौ ॥
स तथा च्छिन्नबाहुस्तु निपपात महीतले ।
रामबाणप्रणुन्नाङ्गो विसंज्ञो राक्षसाधमः ॥
ततस्तु राघवौ वीरौ कबन्धं निहतं रणे ।
ददृशाते महात्मानौ हर्षयुक्तौ बभूवतुः ॥
🔥 कबंध का मोक्ष और सुग्रीव का निर्देश (श्लोक १७-२८)
उवाच परमप्रीतः शनकै रघुनन्दनम् ॥
अहं गन्धर्वराजो वै दानवेन्द्रेण धीमता ।
शप्तः किल पुरा राम राक्षसत्वे नियोजितः ॥
तस्य शापस्य चान्तं वै कर्तुमर्हसि राघव ।
शरीरस्यास्य दाहेन स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥
ततस्त्वां समनुप्राप्तं द्रक्ष्यामि सुग्रीवमृक्षराट् ।
ऋश्यमूके गिरौ राम स वै त्वां सह मित्रताम् ॥
चकार विधिवद्दाहं गन्धर्वस्य महात्मनः ॥
स दग्ध्वा राक्षसं देहं गन्धर्वो दिव्यरूपधृक् ।
उत्पपात नभो गत्वा राममेवाभ्यपूजयत् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🔗 किष्किन्धाकाण्ड की भूमिका
इस सर्ग में कबंध द्वारा दिया गया सुग्रीव का संकेत ही आगे चलकर राम-सुग्रीव मैत्री का कारण बनता है और इस प्रकार सीता की खोज को सफलता मिलती है।
🙏 शाप और उद्धार का चक्र
कबंध की कथा शाप और उद्धार के चक्र को दर्शाती है। राम के सान्निध्य से वह अपने पूर्व गौरव को प्राप्त होता है। यह राम की करुणा और पुण्यशीलता को उजागर करता है।
🎯 शिक्षा : प्रत्येक विपत्ति अन्ततः कल्याणकारी हो सकती है, यदि हम धैर्य और बुद्धि से काम लें। राम-लक्ष्मण ने कबंध के बंधन से घबराकर भी लक्ष्मण की सूझबूझ से उसका वध किया और फलस्वरूप सीता की खोज का सही मार्ग मिला। साथ ही, कबंध को भी शापमुक्ति मिली।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।