सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
बाल काण्ड का सत्ताईसवाँ सर्ग विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को दिव्य अस्त्रों के दान का वर्णन करता है। ताटका वध से संतुष्ट होकर विश्वामित्र राम को सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं, जिनके प्रभाव से वे देवताओं, असुरों, गन्धर्वों और नागों को भी पराजित कर सकते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २७
(दिव्य अस्त्रों की शिक्षा – विश्वामित्र का श्रीराम को दिव्यास्त्र दान)
🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में श्रीराम ने ताटका नामक भयंकर राक्षसी का वध करके ऋषियों की रक्षा की थी। इस सर्ग में महर्षि विश्वामित्र उनकी वीरता और आज्ञापालन से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्रदान करते हैं। यह सर्ग अस्त्र-विद्या के सम्पूर्ण ज्ञान और श्रीराम के परमात्मा स्वरूप को प्रकट करने वाला है [citation:1][citation:2]।
📿 विश्वामित्र की संतुष्टि और अस्त्र दान की घोषणा (श्लोक १-६)
प्रहस्य राघवं वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् ॥
प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्त्राणि सर्वशः ॥
यैरमित्रान्प्रसह्याजौ वशीकृत्य जयिष्यसि ॥
तानि दिव्यानि भद्रं ते ददाम्यस्त्राणि सर्वशः ।
धर्मचक्रं ततो वीर कालचक्रं तथैव च ॥
विष्णुचक्रं तथात्युग्रमैन्द्रं चक्रं तथैव च ।
वज्रमस्त्रं नरश्रेष्ठ शैवं शूलवरं तथा ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ऐषीकमपि राघव ।
ददामि ते महाबाहो ब्राह्ममस्त्रमनुत्तमम् ॥
🔥 अस्त्रों की विस्तृत सूची (श्लोक ७-२१)
प्रदीप्ते नरशार्दूल प्रयच्छामि नृपात्मज ॥
धर्मपाशमहं राम कालपाशं तथैव च ।
वारुणं पाशमस्त्रं च ददाम्यहमनुत्तमम् ॥
ददामि चास्त्रं पैनाकमस्त्रं नारायणं तथा ॥
आग्नेयमस्त्रं दयितं शिखरं नाम नामतः ।
वायव्यं प्रथमं नाम ददामि तव चानघ ॥
शक्तिद्वयं च काकुत्स्थ ददामि तव राघव ॥
कङ्कालं मुसलं घोरं कापालमथ किङ्किणीम् ।
वधार्थं राक्षसां यानि ददाम्येतानि सर्वशः ॥
नन्दनं नाम विख्यातं विद्याधरमहास्त्रकम् ।
ददामि ते महाबाहो खड्गं सुवरमेव च ॥
प्रशमनं सौम्यमस्त्रं तथैव च प्रदापये ॥
वर्षणं शोषणं चैव संतापनविलापने ।
मादनं चैव काकुत्स्थ कामरूपं तथैव च ॥
मानवास्त्रं गान्धर्वं प्रस्वापनमथो तथा ।
प्रशमनं सौम्यमस्त्रं पैशाचं मोहनं तथा ॥
दुर्जयं मौसलं चैव सत्यमस्त्रं तथैव च ॥
मायामयं तथा चान्यत्सौरं तेजःप्रभं तथा ।
शिशिरं सोममस्त्रं च त्वाष्ट्रं चैव महाबलम् ॥
वैष्णवं भास्वरं चैव शीतेषुं च महाबलम् ।
एतानि सर्वाण्यस्त्राणि महाबलपराक्रमः ॥
आयान्तु सहसा राम मम जप्येन चोदिताः ।
गृहाणैतानि भद्रं ते राघवेन्द्र महाबल ॥
🙏 अस्त्रों का प्राकट्य और श्रीराम के प्रति समर्पण (श्लोक २२-२८)
जपयज्ञं समारेभे स्नात्वा नियममास्थितः ॥
ततो जप्येन विधिवद्विश्वामित्रो महातपाः ।
प्रादादस्त्राणि रामाय प्रीतिमान्सुसमाहितः ॥
जपयज्ञेन विधिवद्रामाय सुमहात्मने ॥
उपतस्थुर्महात्मानं राघवं समरुद्धम् ।
प्रणम्य शिरसा रामं कृताञ्जलिपुटाः स्थिताः ॥
इमे स्म किङ्करा राम प्रभूताः प्रभवस्व नः ॥
तथेति च प्रतिज्ञाय रामः प्रहसन्निव ।
मनसा चिन्तयामास गृहाणेति च तानि वै ॥
प्रतिगृह्य महातेजा विश्वामित्रमपूजयत् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧘 शस्त्र और अस्त्र का भेद
इस सर्ग के अन्तर्गत विश्वामित्र श्रीराम को दो प्रकार के आयुध प्रदान करते हैं - शस्त्र (हाथ में पकड़कर चलाए जाने वाले) और अस्त्र (मंत्रों द्वारा चलाए जाने वाले दिव्य प्रक्षेपास्त्र) [citation:1]।
✨ अस्त्रों का स्वतः प्राकट्य
अस्त्रों का स्वयं प्रकट होकर श्रीराम को सेवक भाव में समर्पित करना यह दर्शाता है कि श्रीराम स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं, जिनके समक्ष समस्त शक्तियाँ नतमस्तक होती हैं [citation:2][citation:3]।
🙏 विश्वामित्र का गुरु धर्म
विश्वामित्र न केवल श्रीराम को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं, अपितु उनके चरित्र से संतुष्ट होकर उन्हें सम्पूर्ण विद्या का दान करते हैं। यह गुरु-शिष्य के आदर्श सम्बन्ध को दर्शाता है [citation:1][citation:2]।
🌟 अस्त्रों की संख्या और विविधता
इस सर्ग में लगभग ५० से अधिक अस्त्रों के नाम गिनाए गए हैं, जो उस समय की अस्त्र-विद्या की समृद्ध परम्परा का द्योतक है। प्रत्येक अस्त्र किसी न किसी देवता से सम्बद्ध है और उसका विशिष्ट प्रभाव है [citation:2][citation:3][citation:6]।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची सिद्धियाँ और शक्तियाँ योग्यता एवं निष्ठा के समक्ष स्वयं उपस्थित होती हैं। श्रीराम ने गुरु की आज्ञा का पालन किया और ताटका जैसे भयंकर राक्षस का वध किया, जिससे गुरु प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त विद्या का दान कर दिया। यह दर्शाता है कि गुरु-सेवा और धर्मपालन ही सबसे बड़ी सिद्धि है [citation:1][citation:2][citation:3]।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।