सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
बाल काण्ड का इकसठवाँ सर्ग विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण को शुनःशेप आख्यान सुनाने का वर्णन करता है। इसमें राजा अम्बरीष के यज्ञ में शुनःशेप के बलि होने की कथा, विश्वामित्र द्वारा उसे दिए गए मन्त्र तथा उसके उद्धार की घटना का वर्णन है। इस कथा के फलस्वरूप विश्वामित्र ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त होते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६१
(विश्वामित्र की तपस्या और शुनःशेप – ब्रह्मर्षित्व की प्राप्ति)
🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में विश्वामित्र ने अपने राजा से ऋषि बनने के संकल्प की कथा सुनाई थी। अब राम की जिज्ञासा पर वे शुनःशेप का प्रसिद्ध आख्यान सुनाते हैं, जिसके बाद वे ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त हुए। यह कथा तपस्या की शक्ति, देवताओं की कृपा और सच्चे मन्त्रों के प्रभाव को दर्शाती है।
🙏 राम की जिज्ञासा और कथा का प्रारम्भ (श्लोक १-४)
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो विश्वामित्रं महामुनिम् ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामः परं कौतूहलं हि नः ।
यथा भवान् ब्रह्मर्षित्वं प्राप्तवान् तपसा स्वयम् ॥
किमर्थं च परित्यज्य राज्यं च महदैश्वरम् ।
प्रव्रज्या भवता प्राप्ता तन्नो ब्रूहि महामुने ॥
एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
प्रोवाच वचनं रामं शुनःशेपस्य यत्कथाम् ॥
🕉️ राजा अम्बरीष का यज्ञ और इन्द्र का विघ्न (श्लोक ५-१२)
अयजद्यज्ञं राजर्षिर्बहुवर्षधनायुतम् ॥
तस्य यज्ञस्य चेन्द्रेण हृतः पशुरनन्तरम् ।
ह्रियमाणे पशौ तस्मिन्नृत्विजो राजसत्तमम् ॥
ऊचुस्ते राजशार्दूल नष्टे पशौ नराधिप ।
पुरुषो यज्ञियो राजन् यज्ञस्य परिकल्पताम् ॥
इत्युक्तः स तदा राजा मन्त्रिभिः सह पार्थिवः ।
अन्वियेष महातेजा यज्ञियं पुरुषं प्रभुः ॥
💰 शुनःशेप का क्रय और बलि वेदी पर बंधन (श्लोक १३-१८)
ददर्श च महातेजा ऋषेः पुत्रं महात्मनः ॥
अजीगर्तस्य पुत्रांस्त्रीन् शुनःशेपं च मध्यमम् ।
तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो हर्षसम्पूर्णलोचनः ॥
गृहाण धनमेतत्त्वं शतं गवां सहस्रशः ।
एकं पुत्रं प्रयच्छस्व यज्ञियं पुरुषं मम ॥
इत्युक्तः स तु राज्ञा तु अजीगर्तो महानृषिः ।
शुनःशेपं ददौ राज्ञे गृहीत्वा धनमुत्तमम् ॥
यूपे निबध्य तं वीरं रक्षोभ्यः समकल्पयत् ॥
स बद्धो यूपमाश्रित्य शुनःशेपो महातपाः ।
दध्यौ देवर्षिदेवानां प्रसादकरणं महत् ॥
🕊️ विश्वामित्र का उपदेश और शुनःशेप की स्तुति (श्लोक १९-२२)
उपास्य ध्यानयोगेन प्रसादयितुमीश्वरम् ॥
स तु दृष्ट्वा महात्मानं विश्वामित्रं तपोधनम् ।
अवन्दत महाभागं प्रणामपरमायनः ॥
तमुवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
वत्स शुनःशेप त्वं मां प्रपन्नो भव सुव्रत ॥
अहं ते रक्षणं वत्स करिष्यामि न संशयः ।
इमं स्तुतिं च देवानां ब्रूहि त्वं यत्नमास्थितः ॥
✨ देवताओं की प्रसन्नता और शुनःशेप की मुक्ति (श्लोक २३-२६)
तोषयामास तान् देवान् स्तुतिभिः परमर्षिभिः ॥
ततः प्रसन्ना वरदा देवाः शुनःशेपं तदा ।
ऊचुः प्रीतमनाः सर्वे वरं वरय पुत्रक ॥
स तु देववराद्राजन् मुक्तो बन्धनबन्धनात् ।
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं विश्वामित्रप्रसादतः ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा ब्रह्मर्षिता मया ।
प्राप्ता तपसा वीर्येण शुनःशेपस्य चानघ ॥
📖 उपसंहार: ब्रह्मतेज की विजय और शरणागत की रक्षा
🔱 शरणागत वत्सलता
विश्वामित्र ने शुनःशेप को शरण दी और उसकी रक्षा की। यह सर्ग सिखाता है कि सच्चे तपस्वी का कर्तव्य है कि वह संकटग्रस्त की रक्षा करे।
📿 मन्त्रों की शक्ति
शुनःशेप ने जिन मन्त्रों से देवताओं को प्रसन्न किया, वे आज भी ऋग्वेद में संकलित हैं। मन्त्रों का सही उच्चारण और भावना देवताओं को आकर्षित करती है।
🧘 तपस्या और ब्रह्मर्षित्व
विश्वामित्र की तपस्या को शुनःशेप की घटना से पूर्णता मिली। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि क्षत्रिय होते हुए भी ब्रह्मर्षि बना जा सकता है।
⚖️ धर्म का पालन
राजा अम्बरीष ने ऋत्विजों के आदेश का पालन किया, परन्तु शुनःशेप के उद्धार से यज्ञ सफल हुआ। धर्म की रक्षा के लिए नये मार्ग भी बनते हैं।
🎯 शिक्षा : यह सर्ग बताता है कि सच्ची तपस्या और दया से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। शरणागत की रक्षा करना परम धर्म है। विश्वामित्र ने शुनःशेप को मन्त्रोपदेश देकर न केवल उसके प्राण बचाए, बल्कि स्वयं ब्रह्मर्षित्व के शिखर पर पहुँचे।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।