🕉️ बाल काण्ड · सर्ग 77

अयोध्या आगमन

बाल काण्ड का सतहत्तरवाँ सर्ग राम-सीता एवं अन्य भाइयों के अयोध्या वापस लौटने का वर्णन करता है। राजा दशरथ अपने पुत्रों एवं नववधुओं के साथ मिथिला से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विभिन्न प्रदेशों की शोभा एवं अयोध्यावासियों के उल्लास का चित्रण है। यह सर्ग अयोध्या में भव्य स्वागत एवं नगर की सजावट का वर्णन करते हुए बालकाण्ड का समापन करता है।

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77 सर्ग संख्या
31 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा
पिछला सर्ग 76: परशुराम के गर्व का विनाश
सर्ग 77 · 0 श्लोक
अंतिम सर्ग

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

बाल काण्ड का सतहत्तरवाँ सर्ग राम-सीता एवं अन्य भाइयों के अयोध्या वापस लौटने का वर्णन करता है। राजा दशरथ अपने पुत्रों एवं नववधुओं के साथ मिथिला से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विभिन्न प्रदेशों की शोभा एवं अयोध्यावासियों के उल्लास का चित्रण है। यह सर्ग अयोध्या में भव्य स्वागत एवं नगर की सजावट का वर्णन करते हुए बालकाण्ड का समापन करता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

राजा दशरथ, अपने पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा नवविवाहिता वधुओं सीता, ऊर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति के साथ, राजा जनक की अनुमति लेकर मिथिला से प्रस्थान करते हैं। उनके साथ विशाल सेना एवं रथ-गज-अश्वों का समूह है। रास्ते में वे विविध नदियों एवं वनों को पार करते हैं। अयोध्यावासियों को उनके आगमन की सूचना मिलती है, और वे नगर को ध्वज-पताकाओं एवं फूलों से सजाते हैं। नगर के निवासी उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा करते हैं। जब राजा और राजकुमार नगर में प्रवेश करते हैं, तो जनता उनका जयकारा लगाती है। नगर में उत्सव का माहौल होता है। महल में पहुँचकर राजा दशरथ अपनी रानियों एवं पुरोहितों से मिलते हैं। वशिष्ठ आदि ऋषि आशीर्वाद देते हैं। राम और सीता का अयोध्या में स्वागत होता है। यह सर्ग एक सुखद समापन है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७७

(अयोध्या आगमन – नगर प्रवेश और उत्सव)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राम-सीता एवं अन्य भाइयों के विवाह का वर्णन हुआ। अब राजा दशरथ अपने पुत्रों और नववधुओं के साथ अयोध्या लौट रहे हैं। सम्पूर्ण नगरी उनके स्वागत को आतुर है। यह सर्ग अयोध्या के वैभव, नागरिकों के प्रेम और उस आनन्द का चित्रण करता है जो राम के आगमन से नगर में छा जाता है।

🚩 मिथिला से प्रस्थान (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो दशरथो राजा कृतकृत्यः प्रहृष्टवत् ।
जनकस्यानुयात्रायां प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥
रामं सीतां च सौमित्रिं भरतं च महाबलम् ।
शत्रुघ्नं च महातेजाः कृत्वा रथगतान् नृपः ॥
धनंजयस्य संकाशैर्हयैर्वातसमैर्जवे ।
महत्या सेनया सार्धं शनैर्याति स्म राघवः ॥
जनकोऽपि महातेजाः पुत्रीणां प्रियकाम्यया ।
ययौ किञ्चित्पुरस्कृत्य राज्ञो दशरथस्य ह ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; दशरथः = दशरथ; राजा = राजा; कृतकृत्यः = कृतार्थ; प्रहृष्टवत् = प्रसन्न होकर; जनकस्य = जनक की; अनुयात्रायाम् = विदाई में; प्रययौ = चल दिए; स्वपुरम् = अपने नगर; प्रति = की ओर; रामम् = राम को; सीताम् = सीता को; च = और; सौमित्रिम् = लक्ष्मण को; भरतम् = भरत को; च = और; महाबलम् = महाबली; शत्रुघ्नम् = शत्रुघ्न को; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; कृत्वा = करके; रथगतान् = रथ पर सवार; नृपः = राजा; धनंजयस्य = अर्जुन के; संकाशैः = समान; हयैः = घोड़ों से; वातसमैः = वायु के समान; जवे = वेग में; महत्या = विशाल; सेनया = सेना के साथ; सार्धम् = सहित; शनैः = धीरे-धीरे; याति स्म = जा रहे थे; राघवः = रघुकुलीय राजा; जनकः = जनक; अपि = भी; महातेजाः = महातेजस्वी; पुत्रीणाम् = पुत्रियों के; प्रियकाम्यया = प्रिय की इच्छा से; ययौ = गए; किञ्चित् = कुछ; पुरस्कृत्य = आगे करके; राज्ञः = राजा; दशरथस्य = दशरथ के; ह = निश्चय ही।
📖 भावार्थ : तब राजा दशरथ, कृतार्थ और अत्यन्त प्रसन्न होकर, राजा जनक से विदा लेकर अपनी नगरी की ओर चल दिए। महातेजस्वी राजा ने राम, सीता, लक्ष्मण, महाबली भरत और शत्रुघ्न को रथों पर बैठाया। अर्जुन के घोड़ों के समान तथा वायु के समान वेगशाली घोड़ों से युक्त विशाल सेना के साथ वे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। पुत्रियों के प्रिय की इच्छा से महातेजस्वी जनक भी राजा दशरथ के आगे-आगे कुछ दूर तक गए।
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ का हर्ष और जनक का स्नेह दोनों ही दिखाई देता है। जनक अपनी पुत्रियों के प्रति मोहवश कुछ दूर उन्हें छोड़ने जाते हैं।

🛤️ मार्ग का वर्णन (श्लोक ९-१५)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
ते गच्छन्तो ययु राजन् शनै राजपथं शुभम् ।
ददृशुर्विविधान् देशान् ग्रामान् नगरवीथिकाः ॥
शैलांश्च विविधाकारान् नदीः सरसि चैव ह ।
रम्याणि विविधारण्यान् पुष्पितान् फलितान् द्रुमान् ॥
सीता तु रामं संप्रेक्ष्य सर्वभूतमनोहरम् ।
नातिप्रहृष्टा नोद्विग्ना मुदा युक्ता बभूव ह ॥
रामोऽपि जनकपुत्रीं तां दृष्ट्वा प्रियतरां प्रियाम् ।
बभूव परमप्रीतो देव्या सह यथा हरिः ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्! वे धीरे-धीरे शुभ राजमार्ग से जाते हुए अनेक प्रकार के देशों, गाँवों और नगरों की गलियों को देखते गए। विविध आकृति वाले पर्वत, नदियाँ, सरोवर, रमणीक विविध वन और पुष्पित-फलित वृक्ष भी उन्होंने देखे। सीता, जो सब भूतों को मनोहर लगने वाले राम को देखकर, न अधिक हर्षित हो रही थीं और न उद्विग्न, अपितु मुद से युक्त हो रही थीं। राम भी जनकपुत्री सीता को, जो अत्यन्त प्रिय थीं, देखकर परम प्रीत हुए, जैसे देवी (लक्ष्मी) के साथ भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
🔍 व्याख्या : राम-सीता एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौन्दर्य का वर्णन है। उनका पारस्परिक आकर्षण स्वाभाविक है।

🏙️ अयोध्या में स्वागत की तैयारियाँ (श्लोक १६-२१)

॥ श्लोक १६-१८ ॥
अयोध्या नगरी श्रेष्ठा सर्वरत्नसमन्विता ।
चारुप्राकारतोरणा विमानैरिव शोभिता ॥
नानाद्विजगणैः कीर्णा नानादेवकुलैर्युता ।
नानापण्यसमाकीर्णा नानापुष्पफलद्रुमैः ॥
तस्यां प्रविश्य नगर्यां राजा दशरथः प्रभुः ।
ददर्श राजमार्गांश्च सुसज्जितान् सुशोभनान् ॥
📖 भावार्थ : अयोध्या नगरी श्रेष्ठ और सब रत्नों से युक्त थी। सुन्दर प्राकारों और तोरणों से युक्त वह विमानों के समान शोभित हो रही थी। नाना प्रकार के द्विज (पक्षी या ब्राह्मण?) और देवकुलों से युक्त, अनेक पण्य (बाजार) और पुष्प-फल वाले वृक्षों से भरी हुई थी। उस नगरी में प्रवेश कर राजा दशरथ ने राजमार्गों को सुन्दर सज्जा से सुशोभित देखा।
॥ श्लोक १९-२१ ॥
पताकाभिर्विचित्राभिश्चामरैश्च विराजितान् ।
चन्दनागुरुभिश्चैव माल्यैश्च विविधैः शुभैः ॥
तोरणै राजमार्गांश्च कारयित्वा समन्ततः ।
द्वाराणि च पुरस्यासन् सुसज्जितानि सर्वशः ॥
बभूव तुमुलः शब्दः पौराणां हर्षवर्धनः ।
जयेति शब्दः सुमहान् प्रादुरासीत्समन्ततः ॥
📖 भावार्थ : राजमार्ग विचित्र पताकाओं, चामरों, चन्दन, अगुरु, और विविध शुभ माल्यों से सुशोभित थे। चारों ओर तोरण बनवा दिए गए थे और पुर के द्वार सब प्रकार से सजाए गए थे। नगरवासियों का हर्षवर्धक कोलाहल था। चारों ओर से "जय" का महान शब्द सुनाई दे रहा था।

🎉 नगर प्रवेश और जनता का उल्लास (श्लोक २२-३०)

॥ श्लोक २२-२५ ॥
ततो दशरथो राजा पुत्रैः सार्धं महायशाः ।
प्रविवेश पुरीं रम्यां वन्द्यमानः सुमन्त्रिभिः ॥
तं प्रविष्टं नरेन्द्रं तु प्रजा हर्षसमन्विताः ।
द्रष्टुं समभ्ययुः सर्वा यथेन्द्रं त्रिदशा यथा ॥
रामं सीतां च सौमित्रिं भरतं च महाबलम् ।
शत्रुघ्नं च महातेजा दृष्ट्वा प्रीता महाजनाः ॥
प्रासादशिखरस्थाश्च स्त्रियः सम्प्रेक्ष्य राघवम् ।
प्रहर्षं परमं जग्मुर्मुदा संयुक्तचेतसः ॥
📖 भावार्थ : तब महायशस्वी राजा दशरथ पुत्रों के साथ उस रम्य पुरी में प्रविष्ट हुए, और मन्त्रिगण उनकी वन्दना कर रहे थे। प्रवेश करते हुए उस नरेन्द्र को देखने के लिए सम्पूर्ण प्रजा हर्ष से भरकर आई, जैसे देवता इन्द्र को देखने आते हैं। राम, सीता, सौमित्रि (लक्ष्मण), महाबली भरत और महातेजस्वी शत्रुघ्न को देखकर महाजन प्रसन्न हुए। प्रासाद के शिखर पर स्थित स्त्रियाँ राघव को देखकर परम हर्ष को प्राप्त हुईं और उनके चित्त मुद से युक्त हो गए।
॥ श्लोक २६-३० ॥
राजमार्गे सुसङ्कीर्णे जनौघैः समलङ्कृते ।
शनैः शनैः प्रयात्येव रामः सीतामुखेक्षकः ॥
ततः प्रविश्य भवनं पित्रा सह महाद्युतिः ।
मातॄणामपि सर्वासां चकार चरणानतिम् ॥
ताश्चैनं प्रेक्ष्य सुप्रीताः पुत्रवत्संप्रहर्षिताः ।
आशीर्भिर्योजयामासुः पुत्रस्य सदृशीस्तदा ॥
वसिष्ठश्च महातेजा विश्वामित्रादिभिः सह ।
आशीर्भिरभिनन्द्यैनं जगाम स्वगृहान् मुनिः ॥
इत्येष बालकाण्डस्य सर्गः सप्तसप्ततिः स्मृतः ।
रामस्य नगरे प्राप्तिर्यत्र प्रीतिः परा स्मृता ॥
📖 भावार्थ : राजमार्ग जनसमूह से अलंकृत और सङ्कीर्ण था। राम सीता के मुख की ओर देखते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। तदनन्तर महाद्युति राम पिता के साथ महल में प्रवेश करके सब माताओं के चरणों में झुके। वे सब उन्हें देखकर अति प्रसन्न हुईं और पुत्र के योग्य आशीर्वाद दिए। महातेजस्वी वसिष्ठ ने विश्वामित्र आदि के साथ उन्हें आशीर्वाद देकर अपने आश्रम को प्रस्थान किया। इस प्रकार यह बालकाण्ड का सतहत्तरवाँ सर्ग है, जिसमें राम का नगर में आगमन वर्णित है, जहाँ परम प्रीति व्याप्त थी।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏰 अयोध्या की समृद्धि

इस सर्ग में अयोध्या की भव्यता, सजावट और नागरिकों के उत्साह का वर्णन है। यह दर्शाता है कि राजा दशरथ कितने प्रिय शासक थे और राम जन-मानस में कितने लोकप्रिय थे।

💞 राम-सीता का प्रेम

रास्ते में राम-सीता के परस्पर प्रेम का सूक्ष्म चित्रण है। यह उनके दांपत्य सुख के प्रारम्भ का सूचक है।

🙏 माताओं का आशीर्वाद

राम का सभी माताओं (कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी) के चरण स्पर्श करना उनकी विनम्रता और परिवार के प्रति कर्तव्य को दर्शाता है।

📖 बालकाण्ड का समापन

यह सर्ग बालकाण्ड का उपसंहार है। विवाहोपरांत अयोध्या में सुखद वापसी से बाल्यावस्था और यौवनारम्भ की लीला समाप्त होती है, और अयोध्याकाण्ड के घटनाक्रमों की भूमिका तैयार होती है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चा सुख परिवार, समाज और प्रियजनों के मिलन में है। नगर का वैभव तभी सार्थक है जब वहाँ के निवासी प्रसन्न हों और नायक जनप्रिय हों। राम का आगमन अयोध्या के लिए उत्सव बन जाता है, यह उनके चरित्र के प्रभाव को दर्शाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।