सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
भरत और गंधर्वों के बीच घमासान युद्ध होता है। भरत के पराक्रम से अधिकांश गंधर्व मारे जाते हैं और शेष भाग खड़े होते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११३
(गंधर्वों का वध)
🔆 प्रस्तावना : भरत के नेतृत्व में अयोध्या की सेना गंधर्वों की नगरी पहुँच चुकी थी। दोनों ओर से युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी थीं। यह सर्ग उस भीषण युद्ध का वर्णन करता है जिसमें गंधर्वों का सर्वनाश हुआ और भरत की कीर्ति चारों ओर फैल गई।
⚔️ युद्ध का प्रारंभ और भरत का पराक्रम (श्लोक १-१५)
गन्धर्वैः सह घोरं तु रोमहर्षणमुत्तमम्॥
गन्धर्वा निशितैर्बाणै रथिभिः पत्तिभिस्तथा।
अवाकिरन्रणे वीरं भरतं सत्यविक्रमम्॥
स तानागतमात्रांस्तु गन्धर्वान्भरतो बली।
प्रत्यगृह्णाच्छरव्रातैरशीतपरिमण्डलैः॥
ते भरतेन बाणौघैर्निर्मिता गन्धर्वोत्तमाः।
निपेतुर्धरणीं प्राप्य वज्राहत इव द्रुमाः॥
गन्धर्वाधिपतिः क्रुद्धो भरतं रणमूर्धनि।
विव्याध दशभिर्बाणैर्ननाद च मुहुर्मुहुः॥
शरवर्षैर्ववर्षाथ गन्धर्वान्क्रोधमूर्च्छितः॥
शत्रुघ्नोऽपि महाबाहुः प्रगृहीतशरासनः।
पार्श्वतः पर्यवर्तत गन्धर्वान्विनिघन्निव॥
त्रिभिः सहायैर्गन्धर्वाः समेता भरतेन ते।
विचेरुर्विविधान्मार्गान्युद्धाय कृतनिश्चयाः॥
योधयन्ति स्म तान्वीरान्न च ते विव्यथु रणे॥
ततो भरतशार्दूलो गन्धर्वाधिपतिं शरैः।
जघान समरे क्रुद्धो वज्रेणेव महागिरिम्॥
स हतो न्यपतद्भूमौ गन्धर्वाधिपतिर्बली।
तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ गन्धर्वाः सम्प्रदुद्रुवुः॥
हते राजनि गन्धर्वाः सर्व एव पराङ्मुखाः।
हतशेषाः प्रदुद्रुवुः सर्वतो दिशमाययुः॥
💥 गंधर्वों का विनाश (श्लोक १६-३२)
निर्जिता भरतेनेति प्राप्ता गन्धर्वयोषितः॥
ताः श्रुत्वा निधनं राज्ञः पतीनां च पराजयम्।
निनदन्ति स्म करुणं विलेपुश्च सुदुःखिताः॥
भरतः सर्वसैन्यैस्तु परिवार्य महाबलः।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां गन्धर्वाणां महात्मनाम्॥
धनानि विविधान्यत्र रत्नानि च महान्ति च।
जहार भरतो वीरो रामस्य प्रियकाम्यया॥
शत्रुघ्नश्च महातेजा विश्रान्ताः सैनिकैः सह॥
पुनरागमनं चक्रुः प्रति रामं महाप्रभुम्।
धनान्यादाय विविधा रत्नानि च महान्ति च॥
रामः श्रुत्वा जयं भ्रातुः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
नगरीमाज्ञापयामास सज्जीकर्तुं मनोरमाम्॥
प्रणम्य शिरसा राज्ञे धनानि समर्पयत्॥
रामः प्रीतमनाः प्राह धन्योऽस्म्यद्य न संशयः।
यस्य मे भरतो भ्राता विजयी शत्रुसूदनः॥
एवं संभाष्य रामस्तु भरतं परिषस्वजे।
लक्ष्मणं च महात्मानं शत्रुघ्नं च महाबलम्॥
ततः प्रवेशयामास भ्रातृभिः सह राघवः।
अयोध्यां पूर्णसंकल्पो धर्मेण सुसमन्वितः॥
📜 समापन (श्लोक ३३-४८)
रेमे राज्ये सुखं प्राप्य धर्मेण पृथिवीमिमाम्॥
इत्याख्यानं समाप्तं तु गन्धर्वाणां वधं प्रति।
कृतं भरतवीर्येण रामप्रीतिकरं महत्॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि लक्ष्मणस्य सुतार्पणम्।
रामेण यत्कृतं राज्ञा धर्मेण सुसमन्वितम्॥
शृण्वतां सततं राज्ञो भरतस्य जयं शुभम्।
सर्वपापविनिर्मुक्ता यान्ति विष्णोः परं पदम्॥
रामभक्तिपराणां च हर्षवर्धन उत्तमः॥
इति वाल्मीकिरचिते रामायणे महात्मनः।
उत्तरकाण्डे गन्धर्ववधो नाम त्रयोदशोत्तरशततमः सर्गः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🦁 भरत का पराक्रम
भरत ने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल त्याग और भक्ति के ही प्रतीक नहीं, अपितु एक महान योद्धा भी हैं। उनके एकल युद्ध कौशल ने असंख्य गंधर्वों को परास्त किया।
🤝 भ्रातृत्व का आदर्श
लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भरत के साथ युद्ध में जाना और उनकी सहायता करना राम के भाइयों के अद्वितीय प्रेम और एकता को प्रदर्शित करता है।
⚔️ धर्मयुद्ध का संदेश
यह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए लड़ा गया। गंधर्वों का दमन आवश्यक था ताकि प्रजा को सुख मिल सके।
🏆 विजय का फल
भरत द्वारा लूटा गया धन राम को समर्पित किया गया, जो उनकी निस्स्वार्थ भक्ति और राम के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
🎯 शिक्षा : अधर्म के विनाश के लिए शक्ति का प्रयोग करना धर्म है। भाइयों के बीच एकता और सहयोग से बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना किया जा सकता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।