🕉️ उत्तर काण्ड · सर्ग 113

गंधर्वों का वध

भरत और गंधर्वों के बीच घमासान युद्ध होता है। भरत के पराक्रम से अधिकांश गंधर्व मारे जाते हैं और शेष भाग खड़े होते हैं।

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113 सर्ग संख्या
32 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

भरत और गंधर्वों के बीच घमासान युद्ध होता है। भरत के पराक्रम से अधिकांश गंधर्व मारे जाते हैं और शेष भाग खड़े होते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

भरत की सेना और गंधर्वों के बीच भीषण युद्ध छिड़ जाता है। भरत अकेले ही हजारों गंधर्वों को रणभूमि में परास्त कर देते हैं। लक्ष्मण भी उनका साथ देते हैं। गंधर्वों के सेनापति और अनेक वीर मारे जाते हैं। अंत में पराजित गंधर्व भाग खड़े होते हैं और भरत विजयी होकर उनका धन लेकर लौटते हैं। इस सर्ग में युद्ध का सजीव और रोमांचक वर्णन है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११३

(गंधर्वों का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोदशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : भरत के नेतृत्व में अयोध्या की सेना गंधर्वों की नगरी पहुँच चुकी थी। दोनों ओर से युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी थीं। यह सर्ग उस भीषण युद्ध का वर्णन करता है जिसमें गंधर्वों का सर्वनाश हुआ और भरत की कीर्ति चारों ओर फैल गई।

⚔️ युद्ध का प्रारंभ और भरत का पराक्रम (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः प्रववृते युद्धं भरतस्य महात्मनः।
गन्धर्वैः सह घोरं तु रोमहर्षणमुत्तमम्॥
गन्धर्वा निशितैर्बाणै रथिभिः पत्तिभिस्तथा।
अवाकिरन्रणे वीरं भरतं सत्यविक्रमम्॥
स तानागतमात्रांस्तु गन्धर्वान्भरतो बली।
प्रत्यगृह्णाच्छरव्रातैरशीतपरिमण्डलैः॥
ते भरतेन बाणौघैर्निर्मिता गन्धर्वोत्तमाः।
निपेतुर्धरणीं प्राप्य वज्राहत इव द्रुमाः॥
गन्धर्वाधिपतिः क्रुद्धो भरतं रणमूर्धनि।
विव्याध दशभिर्बाणैर्ननाद च मुहुर्मुहुः॥
📖 भावार्थ : तब भरत और गंधर्वों के बीच अत्यंत भयंकर और रोमांचकारी युद्ध प्रारंभ हुआ। गंधर्वों ने अपने तीक्ष्ण बाणों, रथियों और पैदलों के द्वारा वीर भरत पर आक्रमण कर दिया। परंतु बलशाली भरत ने उनके आते ही बाणों की वर्षा करके उनका सामना किया। भरत के बाणों से पीड़ित होकर गंधर्व सेना के अनेक योद्धा धराशायी हो गए, मानो वज्राघात से वृक्ष गिर रहे हों। गंधर्वों के राजा ने क्रोधित होकर भरत पर दस बाण छोड़े और बार-बार गर्जना करने लगा। यह युद्ध अद्भुत था – एक ओर गंधर्वों की दिव्य माया और अस्त्र-शस्त्र, दूसरी ओर भरत का अदम्य साहस और रणकौशल। भरत ने अपने रथ की चपलता से अनेक बाणों को काट डाला और स्वयं भी गंधर्वराज पर प्रहार किया।
॥ श्लोक ७-१० ॥
लक्ष्मणस्तु महातेजा भरतस्य सहायवान्।
शरवर्षैर्ववर्षाथ गन्धर्वान्क्रोधमूर्च्छितः॥
शत्रुघ्नोऽपि महाबाहुः प्रगृहीतशरासनः।
पार्श्वतः पर्यवर्तत गन्धर्वान्विनिघन्निव॥
त्रिभिः सहायैर्गन्धर्वाः समेता भरतेन ते।
विचेरुर्विविधान्मार्गान्युद्धाय कृतनिश्चयाः॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी लक्ष्मण भरत की सहायता के लिए आगे बढ़े और क्रोध से भरकर उन्होंने गंधर्वों पर बाणों की वर्षा कर दी। महाबाहु शत्रुघ्न ने भी धनुष उठाकर गंधर्वों का संहार करना शुरू कर दिया। तीनों भाइयों की संयुक्त शक्ति के सामने गंधर्व सेना व्याकुल हो गई। वे युद्ध के लिए कृतसंकल्प थे, परंतु भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के सम्मुख उनकी एक न चली। तीनों भाई ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा एक साथ उदित हो गए हों।
॥ श्लोक ११-१५ ॥
गन्धर्वा विविधैः शस्त्रैर्मायाभिश्च महाबलाः।
योधयन्ति स्म तान्वीरान्न च ते विव्यथु रणे॥
ततो भरतशार्दूलो गन्धर्वाधिपतिं शरैः।
जघान समरे क्रुद्धो वज्रेणेव महागिरिम्॥
स हतो न्यपतद्भूमौ गन्धर्वाधिपतिर्बली।
तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ गन्धर्वाः सम्प्रदुद्रुवुः॥
हते राजनि गन्धर्वाः सर्व एव पराङ्मुखाः।
हतशेषाः प्रदुद्रुवुः सर्वतो दिशमाययुः॥
📖 भार्थ : गंधर्व बलवान थे और उन्होंने अनेक प्रकार के शस्त्रों और मायाओं का प्रयोग किया, परंतु वे तीनों वीर योद्धा विचलित नहीं हुए। तब भरत ने क्रोध में आकर गंधर्वराज पर ऐसे बाण चलाए, मानो वज्र से पर्वत पर प्रहार कर रहे हों। गंधर्वराज मारा गया और धराशायी हो गया। उसे मरा देखकर शेष गंधर्व सेना भयभीत हो गई और सभी दिशाओं में भाग खड़ी हुई। गंधर्वों के राजा के मारे जाने पर उनकी पूरी सेना तितर-बितर हो गई। भरत का यह पराक्रम देखकर सभी देवता प्रसन्न हुए।

💥 गंधर्वों का विनाश (श्लोक १६-३२)

॥ श्लोक १६-२१ ॥
हतशेषास्तु ये केचित्पलायनपरायणाः।
निर्जिता भरतेनेति प्राप्ता गन्धर्वयोषितः॥
ताः श्रुत्वा निधनं राज्ञः पतीनां च पराजयम्।
निनदन्ति स्म करुणं विलेपुश्च सुदुःखिताः॥
भरतः सर्वसैन्यैस्तु परिवार्य महाबलः।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां गन्धर्वाणां महात्मनाम्॥
धनानि विविधान्यत्र रत्नानि च महान्ति च।
जहार भरतो वीरो रामस्य प्रियकाम्यया॥
📖 भावार्थ : जो थोड़े से गंधर्व बचे थे, वे भय के मारे इधर-उधर भाग गए। यह सुनकर कि उनका राजा मारा गया और उनके पति पराजित हुए, गंधर्व स्त्रियाँ करुण विलाप करने लगीं। उनके आर्तनाद से वातावरण शोकमय हो गया। भरत अपनी सेना के साथ गंधर्वों की सुंदर नगरी में प्रविष्ट हुए। उन्होंने वहाँ रखे अनेक प्रकार के धन और रत्नों को एकत्र किया, क्योंकि वे उन्हें राम को समर्पित करना चाहते थे। गंधर्वों के नगर में अनेक दिव्य वस्तुएँ थीं – स्वर्ण, मणि, मुक्ता, वस्त्र और आभूषण। भरत ने सेना के साथ उन सबको सुरक्षित रखा।
॥ श्लोक २२-२६ ॥
ततो युद्धं समाप्तं तु भरतः सह लक्ष्मणः।
शत्रुघ्नश्च महातेजा विश्रान्ताः सैनिकैः सह॥
पुनरागमनं चक्रुः प्रति रामं महाप्रभुम्।
धनान्यादाय विविधा रत्नानि च महान्ति च॥
रामः श्रुत्वा जयं भ्रातुः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
नगरीमाज्ञापयामास सज्जीकर्तुं मनोरमाम्॥
📖 भावार्थ : युद्ध समाप्त होने पर भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने सेना सहित विश्राम किया। फिर वे सभी धन-रत्नों को साथ लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किए। राम ने अपने भाई की विजय सुनकर अत्यंत हर्ष का अनुभव किया और नगरवासियों को उनके स्वागत के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। नगर को सजाया गया, झंडे लगाए गए, और नागरिक उत्सुकता से भरत की प्रतीक्षा करने लगे।
॥ श्लोक २७-३२ ॥
भरतो नगरीं प्राप्य रामचन्द्रं ददर्श ह।
प्रणम्य शिरसा राज्ञे धनानि समर्पयत्॥
रामः प्रीतमनाः प्राह धन्योऽस्म्यद्य न संशयः।
यस्य मे भरतो भ्राता विजयी शत्रुसूदनः॥
एवं संभाष्य रामस्तु भरतं परिषस्वजे।
लक्ष्मणं च महात्मानं शत्रुघ्नं च महाबलम्॥
ततः प्रवेशयामास भ्रातृभिः सह राघवः।
अयोध्यां पूर्णसंकल्पो धर्मेण सुसमन्वितः॥
📖 भावार्थ : भरत अयोध्या पहुँचे और रामचन्द्र के दर्शन किए। उन्होंने राम को प्रणाम करके सारा धन उन्हें समर्पित कर दिया। राम अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "आज मैं निस्संदेह धन्य हो गया, क्योंकि मेरा भाई भरत विजयी होकर लौटा है।" ऐसा कहकर राम ने भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को भींचकर गले लगाया। तत्पश्चात् राम अपने भाइयों के साथ अयोध्या में प्रवेश किए। उनका संकल्प पूर्ण हुआ और धर्म की पुनः स्थापना हुई।

📜 समापन (श्लोक ३३-४८)

॥ श्लोक ३३-४० ॥
ततो राजा महातेजा भ्रातृभिः सहितोऽनघः।
रेमे राज्ये सुखं प्राप्य धर्मेण पृथिवीमिमाम्॥
इत्याख्यानं समाप्तं तु गन्धर्वाणां वधं प्रति।
कृतं भरतवीर्येण रामप्रीतिकरं महत्॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि लक्ष्मणस्य सुतार्पणम्।
रामेण यत्कृतं राज्ञा धर्मेण सुसमन्वितम्॥
शृण्वतां सततं राज्ञो भरतस्य जयं शुभम्।
सर्वपापविनिर्मुक्ता यान्ति विष्णोः परं पदम्॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् महातेजस्वी राजा राम अपने भाइयों के साथ धर्मपूर्वक राज्य का पालन करते हुए सुखपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार गंधर्वों के वध का यह आख्यान समाप्त हुआ, जो भरत के पराक्रम से संपन्न हुआ और राम को अत्यंत प्रिय था। अब आगे मैं उस प्रसंग का वर्णन करूँगा जिसमें राम ने लक्ष्मण के पुत्रों को राज्य प्रदान किया। जो भी इस भरत के विजय के शुभ वृत्तांत को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।
॥ श्लोक ४१-४८ ॥
सर्गश्चायं समाप्तस्तु श्रृण्वतां पापनाशनः।
रामभक्तिपराणां च हर्षवर्धन उत्तमः॥
इति वाल्मीकिरचिते रामायणे महात्मनः।
उत्तरकाण्डे गन्धर्ववधो नाम त्रयोदशोत्तरशततमः सर्गः॥
📖 भावार्थ : यह सर्ग पापनाशक है और रामभक्तों के हर्ष को बढ़ाने वाला है। इस प्रकार महात्मा वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तरकाण्ड में गन्धर्ववध नामक एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦁 भरत का पराक्रम

भरत ने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल त्याग और भक्ति के ही प्रतीक नहीं, अपितु एक महान योद्धा भी हैं। उनके एकल युद्ध कौशल ने असंख्य गंधर्वों को परास्त किया।

🤝 भ्रातृत्व का आदर्श

लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भरत के साथ युद्ध में जाना और उनकी सहायता करना राम के भाइयों के अद्वितीय प्रेम और एकता को प्रदर्शित करता है।

⚔️ धर्मयुद्ध का संदेश

यह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए लड़ा गया। गंधर्वों का दमन आवश्यक था ताकि प्रजा को सुख मिल सके।

🏆 विजय का फल

भरत द्वारा लूटा गया धन राम को समर्पित किया गया, जो उनकी निस्स्वार्थ भक्ति और राम के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : अधर्म के विनाश के लिए शक्ति का प्रयोग करना धर्म है। भाइयों के बीच एकता और सहयोग से बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना किया जा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्रयोदशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।