सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
यक्षों की पराजय के बाद रावण और कुबेर के बीच प्रत्यक्ष युद्ध छिड़ जाता है। कुबेर अपनी दिव्य शक्तियों से युद्ध करते हैं, परंतु रावण के आगे अंततः उन्हें हार का सामना करना पड़ता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १५
(रावण और धनद (कुबेर) के बीच युद्ध)
🔆 प्रस्तावना : रावण का अहंकार अब पराकाष्ठा पर था। उसने अपने ही बड़े भाई, धन के स्वामी कुबेर, को युद्ध के लिए ललकारा। यह सर्ग उस भीषण युद्ध का वर्णन करता है, जिसमें रावण विजयी होता है और कुबेर का पुष्पक विमान छीन लेता है।
कुबेरं प्रति दुर्धर्षं दूतं शीघ्रमचोदयत् ॥
गत्वा ब्रूहि धनाध्यक्षं युद्धं देहि मया सह ।
नो चेद्विमानमारुह्य मत्सकाशमुपागतः ॥
युद्धं दद्यां कथं भ्रात्रे याच्ञायां किं न मुञ्चति ॥
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा युद्धाय समवर्तत ।
गृहीत्वा दिव्यमस्त्रौघं पुष्पकं च महाप्रभम् ॥
रावणस्य कुबेरस्य ब्रह्मदत्तवरस्य च ॥
रावणो ब्रह्मपुत्रेण अस्त्रेण प्रमथद्बलम् ।
कुबेरस्य वधं कृत्वा जहार पुष्पकं रथम् ॥
रावण और कुबेर का युद्ध रावण के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है। उसने न केवल अपने भाई को हराया, बल्कि उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि वह स्वयं को अजेय समझने लगा। पुष्पक विमान का हरण यह दर्शाता है कि अब रावण के पास देवताओं का भी वैभव है। यह घटना आगे चलकर राम-रावण युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करती है, जहाँ यही अहंकार रावण के विनाश का कारण बनता है। साथ ही, कुबेर का धैर्य और अंततः पराजय के बाद भी धर्म पर अडिग रहना एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।