सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
एक बार रावण ने नारद जी से पूछा कि तुम सदा किसका गुणगान करते हो? नारद ने विष्णु की महिमा बताई और रावण को उनकी उपेक्षा न करने का सुझाव दिया, परन्तु रावण ने अहंकार में नहीं माना।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २०
(रावण की नारद ऋषि से भेंट)
🎤 नारद का आगमन और रावण का प्रश्न (श्लोक १-१२)
ददर्श देवर्षिं प्राप्तं नारदं तपसान्वितम्॥
तमुवाच दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
स्वागतं ते महाभाग कुत आगमनं मुने॥
नारदः प्राह राजेन्द्र भ्रमामि भुवनत्रयम्।
स्तुवन्नारायणं देवं सर्वलोकनमस्कृतम्॥
तच्छ्रुत्वा रावणः प्राह कोऽयं नारायणस्त्विति।
यस्य त्वं कीर्तयंस्तिष्ठन् भ्रमस्यखिललोकेषु॥
नारदः प्राह वै रामं विष्णुं देवं सनातनम्।
यस्य नाभ्यब्जसम्भूतो ब्रह्मा लोकपितामहः॥
यो ममाग्रे समाख्यातो युद्धे तिष्ठेत कः क्षणम्॥
नारदः प्राह मा राजन् गर्वं कार्षीः कथंचन।
विष्णोः सकाशात् सर्वेऽपि देवा ब्रह्मादयोऽपि च॥
स एव रामो भविता दशरथस्य गृहे नृप।
तवान्तकृत् संशयो न तत्र कार्यो महामते॥
ततः प्रहस्य रावणो नारदं प्रत्युवाच ह।
स मे हन्ता भवेद्रामो यदि मे दृश्यतां गतः॥
💢 रावण का अहंकार और नारद का अन्तर्धान (श्लोक १३-२५)
अवश्यमेव ते वध्यो रामो दशरथात्मजः॥
न चिराद्राम आयाति सीतया सह राघवः।
हनिष्यति त्वां सङ्ग्रामे सर्वलोकनमस्कृतः॥
एतच्छ्रुत्वा दशग्रीवः क्रोधसंरक्तलोचनः।
उत्थाय सिंहासनतो नारदं समुपाद्रवत्॥
नारदस्त्वन्तरिक्षस्थो हसन् वचनमब्रवीत्।
मूढ ते नाशकालोऽयं वर्तते रावणाधम॥
इत्युक्त्वा देवर्षिस्तत्रैवान्तरधीयत।
रावणोऽपि महाक्रुद्धो लङ्कामेव विवेश ह॥
क्रोधाच्च विस्मयाच्चैव निद्रां न लभते क्वचित्॥
कदा स राम आयाति कदा युद्धं भविष्यति।
इति चिन्तापरो नित्यं रावणो राक्षसाधिपः॥
एतत्ते कथितं राम नारदस्य च रावणे।
संवादं पापहरणं सर्वकल्मषनाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं संवादं विस्मयावहम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं नारदीयं च कीर्तनम्॥
📖 फलश्रुति एवं सर्गोपसंहार (श्लोक २६-३८)
प्रीतोऽभूत् परमप्रीतो विस्मयं परमं गतः॥
उवाच चैनं धर्मज्ञ धन्योऽस्म्यनुगृहीतः।
यन्मे नारदसंवादं श्रुतं पापप्रणाशनम्॥
अहो महर्षे दिव्यं ते वचनं सत्यवादिनः।
यथा रावणदर्पस्य हन्ता रामः सनातनः॥
ततः प्रीतेन मनसा रामो मुनिमपूजयत्।
ददौ रत्नानि वस्त्राणि गाश्च धेनूः सहस्रशः॥
ततः स मुनिशार्दूलो राममामन्त्र्य राघवम्।
जगाम स्वाश्रमं प्रीतो नारदस्य कथां स्मरन्॥
इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे विंशः सर्गः ॥
संवादः पापहरणः सर्वकल्मषनाशनः॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
न तस्य दुर्लभं किंचित् इह लोके परत्र च।
रामभक्तिं लभेत् सोऽपि राम एव सनातनः॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं सर्गो विंशः समापितः॥
शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और दर्प का अन्त अवश्य होता है। रावण ने नारद की चेतावनी को अनसुना किया और अन्ततः राम के हाथों मारा गया। भगवान के भक्त और उनके दूत सदा सत्य बोलते हैं।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।