सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
कुछ तपस्वी राम के दरबार में आते हैं और उनसे शिकायत करते हैं कि राक्षस उनके आश्रमों में विघ्न डाल रहे हैं और यज्ञों में बाधा पहुँचा रहे हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७२
(तपस्वियों का राम के पास आना)
🔆 प्रस्तावना : राम का राज्य सुख और समृद्धि से परिपूर्ण था। प्रजा धर्मपरायण और संतुष्ट थी। एक दिन कुछ तपस्वी, जो दूर-दराज के वनों में तपस्या करते थे, अयोध्या नगरी में आए और राम के दरबार में पहुँचे। उनके मुख पर चिंता और आक्रोश स्पष्ट झलक रहा था।
🧘 तपस्वियों का आगमन (श्लोक १-५)
रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राज्ञो धर्मभृतां वराः॥
ते दृष्ट्वा राघवं राजन्सिंहासनगतं शुभम्।
उपतस्थुर्महात्मानः प्राञ्जलिः प्रणता भृशम्॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्मुनिवृन्दान्कृताञ्जलिः।
स्वागतं वो महाभागाः कुशलं च तपोवने॥
आसनान्यर्घ्यपाद्यं च गवां दानं च पार्थिवम्।
गृह्यतां भगवन्तोऽत्र यथोचितमनुत्तमम्॥
ततः सुमन्त्रः शीघ्रं तु राजाज्ञां शिरसा वहन्।
आहारं विविधं स्वादु मुनिभ्यः समुपाहरत्॥
😟 तपस्वियों की शिकायत (श्लोक ६-१०)
रामं परमधर्मज्ञं वाक्यमूचुरिदं तदा॥
राजन्नस्मान्महाबाहो रक्ष राक्षसतो भयात्।
त्वयि राज्यं प्रशासति हन्यन्ते स्म तपस्विनः॥
वनेषु विविधेष्वद्य राक्षसाः कामरूपिणः।
आश्रमाणि प्रध्वंसयन्ति यज्ञविघ्नं प्रकुर्वते॥
न शक्नुमो वयं राजन्यज्ञान्कर्तुं तपश्चरितुम्।
भयार्तानां हि नो रक्ष क्षत्रियाणां बलं भवान्॥
येन ते राक्षसाः सर्वे निहताः स्युर्महाबलाः।
तं विधानं विधत्स्वाशु येन शर्म लभेमहि॥
😡 राम का क्रोध और संकल्प (श्लोक ११-१५)
उवाच परमक्रुद्धो मुनिवृन्दान्समागतान्॥
अहो बत महत्कष्टं यद्राक्षसाः दुरात्मानः।
मम राज्ये प्रशासति हन्युः साधून्बलाद्बली॥
नूनं रावणवधेनापि न शान्तास्ते निशाचराः।
अद्यैव तान्वधिष्यामि सत्येनायुधमालभे॥
भवन्तः शान्तिमापन्नाः स्वाश्रमेषु वसन्त्विति।
यावद्बलं ममैतद्धि स्थितं रक्षार्थमद्य वै॥
आश्वासयामास मुनीन्राघवः सत्यविक्रमः।
🙏 तपस्वियों की विदाई (श्लोक १६-२०)
प्रशशंसुर्महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन्लोकाः सर्वे सुखान्विताः।
न शोचन्ति न तप्यन्ति न च व्याधिभयं क्वचित्॥
इत्युक्त्वा ते तपस्विनो रामेण समनुज्ञाताः।
प्रययुः स्वानि धिष्ण्यानि प्रहृष्टा धर्मचारिणः॥
रामोऽपि परमप्रीतः प्रतिज्ञां तामनुस्मरन्।
चिन्तयामास राक्षसानां वधोपायं सुदारुणम्॥
स तु राजा महातेजाः सभायां मन्त्रिभिः सह।
मन्त्रयामास धर्मात्मा राक्षसानां वधं प्रति॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राजा का कर्तव्य
यह सर्ग राजा के प्राथमिक कर्तव्य – प्रजा की रक्षा – को रेखांकित करता है। राम तुरन्त ऋषियों की पीड़ा सुनकर क्रोधित होते हैं और उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। एक आदर्श राजा के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी प्रजा के कष्टों को सुने और उनका निवारण करे।
😈 राक्षसों की दुष्टता
रावण के मारे जाने के बाद भी राक्षसों का दुष्ट स्वभाव समाप्त नहीं हुआ। यह दर्शाता है कि बुराई केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होती, वरन् उसके अनुयायी भी उसी प्रवृत्ति के होते हैं।
⚔️ राम का सत्यसंकल्प
राम का धनुष की शपथ लेकर राक्षसों के वध का संकल्प करना उनके सत्यनिष्ठ और प्रतिज्ञाबद्ध स्वभाव को दर्शाता है। वे कभी भी अपनी प्रजा को दुःखी नहीं देख सकते थे।
📜 आगे की कथा का बीज
यह सर्ग आगे आने वाली कथा (शत्रुघ्न का लवणासुर वध) का आधार तैयार करता है। राक्षसों की शिकायत और राम का संकल्प ही शत्रुघ्न को मधुवन भेजने का कारण बनता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शासक का सबसे बड़ा धर्म प्रजा की रक्षा करना है। प्रजा के कष्टों को सुनना और उनका समाधान करना ही सच्चे राजा की पहचान है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।