🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 53

मकराक्ष का वध

मकराक्ष और वानर सेना के बीच घोर युद्ध होता है। अंततः राम मकराक्ष का वध कर देते हैं।

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53 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

मकराक्ष और वानर सेना के बीच घोर युद्ध होता है। अंततः राम मकराक्ष का वध कर देते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

मकराक्ष विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में पहुँचता है। वह अत्यंत क्रोधित है और सीधे राम पर आक्रमण करता है। राम और मकराक्ष के बीच भीषण युद्ध होता है। मकराक्ष अनेक अस्त्र-शास्त्रों का प्रयोग करता है, किन्तु राम उन सबको विफल कर देते हैं। अंततः राम अपने बाणों से मकराक्ष के रथ को नष्ट कर देते हैं और उसके सिर को धड़ से अलग कर देते हैं। मकराक्ष के मरते ही राक्षस सेना पुनः भाग खड़ी होती है और वानरों में उत्साह छा जाता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ५३

(मकराक्ष का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : मकराक्ष ने राम पर आक्रमण किया, किन्तु राम ने उसे युद्ध में परास्त कर दिया। यह सर्ग राम के अद्वितीय पराक्रम और मकराक्ष के वध का वर्णन करता है।

⚔️ युद्ध का आरंभ (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः मकराक्षः क्रोधवशो रामं प्रति संयुगे ।
चिक्षेप बहुभिर्बाणैः सर्वगात्रेषु भीषणैः ॥
रामस्तु भृशसंक्रुद्धो लक्ष्मणेन समन्वितः ।
दिशो विदिश आकाशं बाणैरापूरयद् बली ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; मकराक्षः = मकराक्ष; क्रोधवशः = क्रोध के वश में; रामम् = राम पर; प्रति = प्रति; संयुगे = युद्ध में; चिक्षेप = छोड़ा; बहुभिः = बहुत से; बाणैः = बाणों से; सर्वगात्रेषु = सभी अंगों में; भीषणैः = भयंकर; रामः = राम; तु = तो; भृशसंक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के साथ; समन्वितः = युक्त; दिशः = दिशाओं; विदिशः = विदिशाओं; आकाशम् = आकाश को; बाणैः = बाणों से; आपूरयत् = भर दिया; बली = बलशाली।
📖 भावार्थ : तब क्रोध के वश में हुए मकराक्ष ने युद्ध में राम पर बहुत से भयंकर बाण चलाए। अत्यंत क्रोधित बलशाली राम ने लक्ष्मण के साथ मिलकर दिशाओं, विदिशाओं और आकाश को बाणों से भर दिया।
॥ श्लोक ७-१० ॥
स राक्षसो महावीर्यो रामं दृष्ट्वा महाबलम् ।
मायामास्थाय घोरां तु युद्ध्यमानो न दृश्यते ॥
📖 भावार्थ : वह महावीर्य राक्षस महाबली राम को देखकर घोर माया धारण कर युद्ध करने लगा, किन्तु वह दिखाई नहीं दे रहा था।

🌀 माया का नाश (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
रामस्तु धर्मात्मा दृष्ट्वा मायां राक्षसीम् ।
विभीषणमुवाचेदं केनोपायेन हन्यते ॥
विभीषणस्तु तच्छ्रुत्वा रामं प्रत्यभाषत ।
माया नश्यति रामस्य सत्येन नात्र संशयः ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने उस राक्षसी माया को देखकर विभीषण से पूछा: "किस उपाय से यह मारा जाता है?" विभीषण ने यह सुनकर राम से कहा: "हे राम, सत्य से यह माया नष्ट हो जाती है, इसमें संशय नहीं।"
॥ श्लोक १८-२२ ॥
ततः श्रीरामो धर्मात्मा सत्यव्रतपरायणः ।
ब्रह्मास्त्रं प्रसमाधाय मुमोचैनदरिंदमः ॥
तेनास्त्रेण हता माया मकराक्षो निपातितः ॥
📖 भावार्थ : तब सत्यव्रतपरायण धर्मात्मा श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया और उसे छोड़ा। उस अस्त्र से वह माया नष्ट हो गई और मकराक्ष निपातित हुआ।

🎉 विजय का उत्सव (श्लोक २३-३८)

॥ श्लोक २३-२९ ॥
तस्मिन् हते महावीर्ये मकराक्षे रणाजिरे ।
राक्षसाः प्राद्रवन् भीता वानराश्च विजहृषुः ॥
रामं पूजयामासुः सुग्रीवप्रमुखास्तदा ॥
📖 भावार्थ : उस महावीर्य मकराक्ष के रणांगण में मारे जाने पर राक्षस भय से भाग गए और वानर हर्षित हुए। सुग्रीव आदि प्रमुखों ने राम की पूजा की।
॥ श्लोक ३०-३८ ॥
इत्येष त्रिपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
मकराक्षवधो यत्र रामस्य च पराक्रमः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह तिरेपनवाँ सर्ग है, जिसमें मकराक्ष का वध और राम का पराक्रम वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕉️ सत्य की शक्ति

विभीषण ने बताया कि सत्य से माया नष्ट होती है, और राम ने सत्य का पालन करते हुए विजय प्राप्त की।

🏹 राम का पराक्रम

राम ने एक बार फिर अपने अद्वितीय युद्ध कौशल का परिचय दिया।

🎯 शिक्षा : सत्य और धर्म के आगे माया और अधर्म टिक नहीं सकते।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

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आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।