🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 54

रावण का अहिरावण से मिलना

रावण अपने मित्र अहिरावण, जो पाताल का राजा है, से मिलता है और उससे सहायता माँगता है। अहिरावण रावण को सहायता का आश्वासन देता है।

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54 सर्ग संख्या
17 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

रावण अपने मित्र अहिरावण, जो पाताल का राजा है, से मिलता है और उससे सहायता माँगता है। अहिरावण रावण को सहायता का आश्वासन देता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

रावण के अनेक सेनापति और पुत्र मारे जा चुके थे। वह अत्यंत निराश और क्रोधित था। तब उसका मित्र अहिरावण, जो पाताललोक का राजा था, उससे मिलने आया। अहिरावण अत्यंत पराक्रमी और मायावी था। रावण ने उसे अपनी दयनीय स्थिति बताई और राम-लक्ष्मण को मारने में सहायता माँगी। अहिरावण ने रावण को सहायता का आश्वासन दिया और एक योजना बनाई। उसने राम-लक्ष्मण का हरण करने का निश्चय किया।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ५४

(रावण का अहिरावण से मिलना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के अनेक वीर योद्धा मारे जा चुके थे। तब उसका मित्र अहिरावण, पाताल का राजा, उससे मिलने आया। यह सर्ग उनकी मुलाकात और अहिरावण द्वारा सहायता के वचन का वर्णन करता है।

🤝 रावण की निराशा (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः रावणो दुःखार्तो निहतेषु सुतेषु च ।
सेनापतिषु मुख्येषु राक्षसेषु च सर्वशः ॥
चिन्तयामास मेधावी किं करोमि क्व गच्छामि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; दुःखार्तः = दुःख से आर्त; निहतेषु = मारे गए; सुतेषु = पुत्रों के; च = और; सेनापतिषु = सेनापतियों के; मुख्येषु = प्रमुख; राक्षसेषु = राक्षसों के; च = और; सर्वशः = सब प्रकार; चिन्तयामास = सोचने लगा; मेधावी = बुद्धिमान; किम् = क्या; करोमि = करूँ; क्व = कहाँ; गच्छामि = जाऊँ।
📖 भावार्थ : तब रावण पुत्रों, प्रमुख सेनापतियों और सभी राक्षसों के मारे जाने पर अत्यंत दुःखी हुआ। वह बुद्धिमान होते हुए भी सोचने लगा: "मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?"
॥ श्लोक ५-८ ॥
तस्य चिन्तयमानस्य अहिरावण आगतः ।
पातालाधिपतिर्वीरो रावणं प्रति संगतः ॥
स मित्रं सम्परिष्वज्य रावणं वाक्यमब्रवीत् ।
किमर्थं दुःखितो राजन् ब्रूहि मे त्वं सखा ह्यहम् ॥
📖 भावार्थ : उसके सोचते ही वीर अहिरावण, जो पाताल का अधिपति था, रावण के पास आया। उसने मित्र रावण को गले लगाकर कहा: "हे राजन्, तुम दुःखी क्यों हो? मुझे बताओ, मैं तुम्हारा मित्र हूँ।"

🗣️ सहायता का वचन (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
रावणस्तु तदा राजन् अहिरावणमब्रवीत् ।
मम पुत्रा हता युद्धे सेनापतय एव च ॥
रामो दाशरथिः शत्रुः सुग्रीवसहितो बली ।
तं हन्तुं नोपजानामि त्वं मित्रं साह्यमाचर ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्, तब रावण ने अहिरावण से कहा: "मेरे पुत्र और सेनापति युद्ध में मारे गए। राम, दशरथ-पुत्र, सुग्रीव सहित बलशाली शत्रु है। उसे मारने का उपाय मुझे नहीं सूझता। तुम मित्र हो, सहायता करो।"
॥ श्लोक १५-१८ ॥
अहिरावणस्तु तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाच महाबलः ।
मा भैः सखे न भेतव्यं मम साहाय्यमस्ति ते ॥
अहं हनिष्ये तौ वीरौ रामलक्ष्मणवानरौ ।
आनयिष्ये तवाग्रे तु बद्ध्वा तौ पुरुषर्षभौ ॥
📖 भावार्थ : उस महाबली अहिरावण ने यह सुनकर उत्तर दिया: "हे सखे, डरो मत। डरने की आवश्यकता नहीं, मेरी सहायता तुम्हारे लिए है। मैं उन वीर राम-लक्ष्मण और वानरों को मार डालूँगा। उन पुरुषर्षभों को बाँधकर तुम्हारे सामने लाऊँगा।"

🔮 योजना (श्लोक १९-३२)

॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः अहिरावणो राजन् मायां समाश्रित्य राक्षसीम् ।
प्रविश्य सेनयोर्मध्ये योगनिद्रां प्रयोजयत् ॥
रामलक्ष्मणौ सुप्तौ तु गृहीत्वा तौ महाबलः ।
पातालं प्रययौ वीरो हर्षेण महता वृतः ॥
📖 भावार्थ : तब हे राजन्, अहिरावण ने राक्षसी माया का सहारा लेकर दोनों सेनाओं के मध्य में प्रवेश कर योगनिद्रा का प्रयोग किया। सोए हुए राम-लक्ष्मण को उठाकर वह महाबली वीर महान हर्ष से भरकर पाताल को चला गया।
॥ श्लोक २६-३२ ॥
इत्येष चतुःपञ्चाशः सर्गो युद्धकाण्डतः ।
अहिरावणसंगमो रावणस्य च निश्चयः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह चौवनवाँ सर्ग है, जिसमें अहिरावण का संगम और रावण का निश्चय वर्णित है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 मित्रता का महत्व

रावण ने अपने मित्र अहिरावण से सहायता माँगी, जो विपत्ति में मित्र के महत्व को दर्शाता है।

🌀 अहिरावण की माया

अहिरावण ने माया का प्रयोग करके राम-लक्ष्मण का हरण किया, जो उसकी शक्ति को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : सच्चा मित्र विपत्ति में काम आता है, किन्तु मित्रता का उपयोग अधर्म के लिए नहीं करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।