सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम और रावण के भीषण युद्ध में राम अपने बाणों से रावण के रथ को नष्ट कर देते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
(राम द्वारा रावण के रथ का विनाश)
🔆 प्रस्तावना : राम-रावण युद्ध अपने चरम पर है। रावण अपने रथ पर आरूढ़ होकर अनेक अस्त्र-शस्त्रों से राम पर प्रहार करता है। राम अद्भुत लाघव से उसके रथ के अंगों को एक-एक करके नष्ट कर देते हैं। यह सर्ग राम के अप्रतिम धनुर्धरता का साक्षी है।
🏹 रथ का विध्वंस (श्लोक १-१५)
अभ्ययात् त्वरितो रामं सर्वसैन्यसमावृतः ॥
तस्याश्वान् स्वर्णभूषांश्च रामः परपुरंजयः ।
निजघान शरैस्तीक्ष्णैः शक्राशनिसमप्रभैः ॥
हतेष्वश्वेषु सारथिं शरेण नतपर्वणा ।
प्रेषयामास रामस्तु यमस्य सदनं प्रति ॥
चिच्छेद सुमहातेजा रावणस्य दुरात्मनः ॥
हताश्वे हतसारथ्ये रथे तस्मिन् महारथः ।
अवप्लुत्य महातेजा रावणः क्रोधमूर्छितः ॥
पदातिः समपद्यत गदापाणिः प्रतापवान् ।
✨ रथहीन रावण और राम की विजय (श्लोक १६-३०)
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत् ॥
ऋषयश्च महात्मानो रामस्य विजयं विदुः ।
जय रामेति रामेति तुष्टुवुः सिद्धचारणाः ॥
रामरावणयो राजन् प्रवृत्तं रोमहर्षणम् ॥
रथिनं रथहीनं तु रामं दृष्ट्वा महाबलम् ।
साधु साध्विति भूतानि प्रशशंसुर्मुदान्विताः ॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।