सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रथ के नष्ट हो जाने पर रावण पैदल ही राम से युद्ध करता है और विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
(रावण का रथहीन होकर युद्ध करना)
🔆 प्रस्तावना : रथ नष्ट हो जाने पर रावण क्रोध से भर उठता है। वह पैदल ही राम से युद्ध करने को तत्पर हो जाता है। यह सर्ग रावण के अदम्य साहस और राम के अडिग धैर्य का संगम है।
⚔️ पदाति युद्ध का प्रारम्भ (श्लोक १-१८)
अभ्यधावत रामं तु कालान्तकयमोपमः ॥
तं रामो गदया वेगान्निष्पपात महाबलः ।
गदासंघट्टनं त्वासीत् प्रलये पर्वतोरिव ॥
अवाकिरत् सुसंक्रुद्धो मायाभिर्विविधैरपि ॥
रामस्तु राक्षसं दृष्ट्वा मायाबलसमन्वितम् ।
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य प्रहसन्निव राघवः ॥
🛡️ माया का निवारण (श्लोक १९-३५)
निचखान शिरः कायाद् बाहूंश्चैव समन्ततः ॥
स तु मायामयं रामो ज्ञात्वा रावणरक्षितम् ।
दिव्येनास्त्रेण तां मायां नाशयामास वीर्यवान् ॥
पूर्ववत् सुमहाघोरं देवदानवसन्निभम् ॥
दृष्ट्वा तु तद्युद्धं सर्वे प्रशशंसुर्मुदान्विताः ।
नैतादृशं क्वचिद् युद्धं दृष्टपूर्वं कदाचन ॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।