🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 63

राम द्वारा रावण के सिर काटना और पुनः जुड़ना

राम रावण के सिर को बाण से काट देते हैं, लेकिन अमृत-भरे सिर के कटने पर भी तुरंत नया सिर उत्पन्न हो जाता है।

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63 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

राम रावण के सिर को बाण से काट देते हैं, लेकिन अमृत-भरे सिर के कटने पर भी तुरंत नया सिर उत्पन्न हो जाता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

राम रावण के सिर पर घोर प्रहार करते हैं और उसे काट डालते हैं, किन्तु रावण के पास अमृत-कुण्ड होने के कारण उसका सिर पुनः जुड़ जाता है या नया सिर बन जाता है। राम बार-बार सिर काटते हैं, किन्तु हर बार नया सिर प्रकट हो जाता है। यह देख राम चिन्तित हो जाते हैं।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

(राम द्वारा रावण के सिर काटना और पुनः जुड़ना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने रावण का सिर काट दिया, किन्तु आश्चर्य! तुरंत दूसरा सिर प्रकट हो जाता है। यह क्रम बार-बार चलता है। यह सर्ग रावण के अमृत-कुण्ड के रहस्य और राम की जिज्ञासा का वर्णन करता है।

🌀 सिर काटने का अद्भुत क्रम (श्लोक १-२०)

॥ श्लोक १-१० ॥
ततः रामः शरेणाशु रावणस्य शिरः शुभम् ।
चिच्छेद परमक्रुद्धः सर्वलोकभयङ्करः ॥
तच्छिरः सहसा कृत्तं पपात धरणीतले ।
अथान्यच्छिर आभाति रावणस्य महात्मनः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम ने; शरेण = बाण से; आशु = शीघ्र; रावणस्य = रावण का; शिरः = सिर; शुभम् = सुंदर; चिच्छेद = काट डाला; परमक्रुद्धः = अत्यन्त क्रोधित होकर; सर्वलोकभयङ्करः = सब लोकों में भय उत्पन्न करने वाला; तत् = वह; शिरः = सिर; सहसा = अचानक; कृत्तम् = कटा हुआ; पपात = गिरा; धरणीतले = भूमि पर; अथ = फिर; अन्यत् = दूसरा; शिरः = सिर; आभाति = प्रकट होता है; रावणस्य = रावण का; महात्मनः = महान आत्मा वाला।
📖 भावार्थ : तब राम ने अत्यन्त क्रोधित होकर रावण के सुंदर सिर को बाण से काट डाला, जो सब लोकों में भय उत्पन्न करने वाला था। वह कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा। फिर तुरंत रावण के महान आत्मा वाला दूसरा सिर प्रकट हो गया।
॥ श्लोक ११-२० ॥
एवं शतं शिरांस्वस्य निजघान महाबलः ।
न चास्य क्षीयते वीर्यं न चायुः क्षीयते तथा ॥
अमृतं हि रहः प्राप्तं रावणेन महात्मना ।
ब्रह्मणो वरदानेन तेन जीवति राक्षसः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार महाबली राम ने उसके सौ सिरों को काट डाला, किन्तु उसका वीर्य (शक्ति) क्षीण नहीं हुआ और न ही आयु क्षीण हुई। महात्मा रावण ने ब्रह्मा जी के वरदान से गुप्त रूप से अमृत प्राप्त कर रखा था, जिसके कारण वह राक्षस जीवित रहता है।

🧠 मातलि का उपदेश (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-३० ॥
ततो मातलिरागम्य रामं वचनमब्रवीत् ।
नैवं शक्यो रणे हन्तुं रावणोऽमृतसंनिभः ॥
तस्य हृदि स्थितं वीर अमृतं ब्रह्मतेजसा ।
तस्मादस्य वधोपायं चिन्तयस्व महामते ॥
ब्रह्मास्त्रेणैव संहार्यो रावणो नात्र संशयः ।
📖 भावार्थ : तब मातलि ने आकर राम से कहा: "इस प्रकार युद्ध में रावण को मारना संभव नहीं है, क्योंकि उसमें अमृत का अंश है। हे वीर, उसके हृदय में ब्रह्मा के तेज से अमृत स्थित है। इसलिए हे महामते, आप इसके वध का उपाय सोचिए। ब्रह्मास्त्र से ही रावण का वध संभव है, इसमें संशय नहीं।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ

यह सर्ग यह संकेत देता है कि केवल शारीरिक बल से रावण को नहीं मारा जा सकता, उसके अमृत रूपी संजीवनी का रहस्य समझना आवश्यक है। अंत में मातलि के द्वारा ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का संकेत मिलता है, जो अगले सर्ग की भूमिका तैयार करता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

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आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।