सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
मातलि राम को समझाते हैं कि रावण के अमृत-कुण्ड के कारण साधारण अस्त्रों से उसका वध नहीं हो सकता, अतः ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करें।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
(मातलि द्वारा राम को ब्रह्मास्त्र चलाने का उपदेश)
🔆 प्रस्तावना : सिर काटने के निष्फल प्रयास के बाद मातलि राम को रावण के वध का एकमात्र उपाय बताते हैं – ब्रह्मास्त्र। यह सर्ग अंतिम अस्त्र की दीक्षा के समान है।
🕉️ ब्रह्मास्त्र का रहस्य (श्लोक १-१५)
रावणोऽयं दुराधर्षो ब्रह्मदत्तवरो बली ॥
अमृतं हृदये तस्य ब्रह्मणा संनिवेशितम् ।
तस्मान्न शक्यते हन्तुं शरैरन्यैः कथंचन ॥
ब्रह्मास्त्रेण च संहार्यो रावणो नात्र संशयः ।
प्रयोगं चास्य वक्ष्यामि संहारं च निबोध मे ॥
ॐकारपूर्वकं मन्त्रं जप्त्वा ध्यात्वा पितामहम् ।
शरं ब्रह्मास्त्रसंयुक्तं मुमोक्ष रघुनन्दन ॥
🧘 राम द्वारा ब्रह्मास्त्र धारण (श्लोक १६-२५)
जग्राह ब्रह्मणोऽस्त्रं तु मन्त्रपूतं शरोत्तमम् ॥
ध्यात्वा ब्रह्माणमीशानं जप्त्वा मन्त्रमनुत्तमम् ।
संदधे धनुषि श्रेष्ठे ब्रह्मास्त्रं परमाद्भुतम् ॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।