सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
मातलि के उपदेशानुसार राम ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं और उसे रावण के हृदय पर छोड़ते हैं, जिससे रावण का वध होता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
(राम द्वारा ब्रह्मास्त्र का संधान)
🔆 प्रस्तावना : मातलि के उपदेश से राम ब्रह्मास्त्र धारण करते हैं और उसे रावण पर छोड़ते हैं। यह वह क्षण है जब रावण का अंत निश्चित हो जाता है।
💥 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १-२०)
मुमोच च हृदि क्रुद्धो रावणस्य दुरात्मनः ॥
तदस्त्रं वैष्णवं रौद्रं ब्राह्मं चैव महाप्रभम् ।
भित्त्वा हृदयं रक्षोऽन्ते पपात सह जीवितैः ॥
वज्राहत इव शैलो द्विधा भूतो महाद्युतिः ॥
हते तस्मिन् महाराज देवाः सर्षिपुरोगमाः ।
जयशब्दं महाकार्षुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत् ॥
🎉 रावण के वध के बाद (श्लोक २१-३०)
विभीषणं समागम्य राज्ये लङ्कायामदापयत् ॥
सीतया सह संगम्य प्राप्तवान् परमां मुदम् ।
एवं युद्धं महाघोरं समाप्तं राघवस्य हि ॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।