🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 68

रावण की अंत्येष्टि की व्यवस्था

राम विभीषण को रावण के मृत शरीर का अंतिम संस्कार करने का आदेश देते हैं। विभीषण संकोच करते हैं, किन्तु राम शत्रु के प्रति भी सम्मान का भाव रखते हुए उचित कर्मकांड की व्यवस्था करते हैं।

0 सम्पूर्ण श्लोक
68 सर्ग संख्या
11 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

राम विभीषण को रावण के मृत शरीर का अंतिम संस्कार करने का आदेश देते हैं। विभीषण संकोच करते हैं, किन्तु राम शत्रु के प्रति भी सम्मान का भाव रखते हुए उचित कर्मकांड की व्यवस्था करते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

रावण के वध के बाद राम विभीषण से कहते हैं कि शत्रु होते हुए भी रावण एक महान योद्धा और विद्वान था, अतः उसका उचित अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए। विभीषण प्रारंभ में संकोच करते हैं कि वे अपने भाई का अंतिम संस्कार करेंगे, क्योंकि रावण ने उनका अपमान किया था। किन्तु राम के आग्रह पर वे सहमत होते हैं और विधिपूर्वक रावण की अंत्येष्टि की व्यवस्था करते हैं। यह सर्ग राम की उदारता और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ६८

(रावण की अंत्येष्टि की व्यवस्था)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण का वध हो चुका है। राम अपने धर्म और मर्यादा के अनुसार शत्रु के प्रति भी उचित सम्मान दिखाते हैं। वे विभीषण को रावण का अंतिम संस्कार करने का निर्देश देते हैं।

🗣️ राम का आदेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामो महातेजाः विभीषणमुवाच ह ।
कुरु प्रेतक्रियां भ्रातुः रावणस्य महात्मनः ॥
शत्रुरपि हि वृद्धस्य युद्धे प्राणान्परित्यजेत् ।
तस्य कार्यो विधिः सर्वो यथा नो धर्मसंहितः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने विभीषण से कहा: "अपने भाई महात्मा रावण की प्रेतक्रिया करो। यद्यपि वह शत्रु था, फिर भी युद्ध में प्राण त्यागने वाले वृद्ध (महान) व्यक्ति का सारा संस्कार धर्म के अनुसार करना चाहिए।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
📖 भावार्थ : राम ने आगे कहा कि रावण युद्ध में मारा गया है, वह शत्रु होते हुए भी एक वीर योद्धा और महान ज्ञानी था। उसे वही संस्कार मिलना चाहिए जो एक योद्धा को मिलता है।

🤲 विभीषण का संकोप और राम का उपदेश (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
विभीषणस्तु तच्छ्रुत्वा रामवाक्यमनुत्तमम् ।
उवाच परमप्रीतः संशयः परमो मम ॥
भ्राता मम महान् युद्धे त्वया विनिहतः प्रभो ।
तस्य प्रेतक्रियां कर्तुं कथं शक्नोमि राघव ॥
📖 भावार्थ : विभीषण ने राम का अनुत्तम वचन सुनकर परमप्रीत होते हुए भी कहा: "हे प्रभो! मेरे बड़े भाई का युद्ध में आपके द्वारा वध हुआ है। मैं उसकी प्रेतक्रिया कैसे कर सकता हूँ?"
॥ श्लोक १६-१८ ॥
📖 भावार्थ : राम ने समझाया कि मृत्यु के बाद शत्रुता समाप्त हो जाती है। अब तुम्हें एक भाई के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। राम के उपदेश से विभीषण सहमत हो जाते हैं।

🔥 रावण का अंतिम संस्कार (श्लोक १९-२५)

॥ श्लोक १९-२५ ॥
📖 भावार्थ : तब विभीषण ने राम के आदेश का पालन किया। उन्होंने रावण के पार्थिव शरीर को चिता पर रखा और विधिवत अग्नि संस्कार किया। सभी राक्षस और वानर शोक मनाते हुए उपस्थित रहे। राम ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा

📘 गूढ़ार्थ : राम ने शत्रु के प्रति भी करुणा और सम्मान दिखाकर मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्श को प्रस्तुत किया। यह सिखाता है कि मृत्यु के बाद वैर समाप्त हो जाता है और मानवीय संस्कार सभी के लिए समान हैं।

💡 शिक्षा : शत्रु को भी उचित सम्मान देना चाहिए। धर्म के अनुसार सभी प्राणियों के अंतिम संस्कार आवश्यक हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

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आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।