सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम विभीषण को रावण के मृत शरीर का अंतिम संस्कार करने का आदेश देते हैं। विभीषण संकोच करते हैं, किन्तु राम शत्रु के प्रति भी सम्मान का भाव रखते हुए उचित कर्मकांड की व्यवस्था करते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ६८
(रावण की अंत्येष्टि की व्यवस्था)
🔆 प्रस्तावना : रावण का वध हो चुका है। राम अपने धर्म और मर्यादा के अनुसार शत्रु के प्रति भी उचित सम्मान दिखाते हैं। वे विभीषण को रावण का अंतिम संस्कार करने का निर्देश देते हैं।
🗣️ राम का आदेश (श्लोक १-१०)
कुरु प्रेतक्रियां भ्रातुः रावणस्य महात्मनः ॥
शत्रुरपि हि वृद्धस्य युद्धे प्राणान्परित्यजेत् ।
तस्य कार्यो विधिः सर्वो यथा नो धर्मसंहितः ॥
🤲 विभीषण का संकोप और राम का उपदेश (श्लोक ११-१८)
उवाच परमप्रीतः संशयः परमो मम ॥
भ्राता मम महान् युद्धे त्वया विनिहतः प्रभो ।
तस्य प्रेतक्रियां कर्तुं कथं शक्नोमि राघव ॥
🔥 रावण का अंतिम संस्कार (श्लोक १९-२५)
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा
📘 गूढ़ार्थ : राम ने शत्रु के प्रति भी करुणा और सम्मान दिखाकर मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्श को प्रस्तुत किया। यह सिखाता है कि मृत्यु के बाद वैर समाप्त हो जाता है और मानवीय संस्कार सभी के लिए समान हैं।
💡 शिक्षा : शत्रु को भी उचित सम्मान देना चाहिए। धर्म के अनुसार सभी प्राणियों के अंतिम संस्कार आवश्यक हैं।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।