🕉️ युद्ध काण्ड · सर्ग 67

रावण वध पर देवताओं की स्तुति

रावण के वध के पश्चात देवता, ऋषि, गन्धर्व आदि आकाश से उपस्थित होकर राम की स्तुति करते हैं और उन्हें विष्णु का अवतार घोषित करते हैं।

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67 सर्ग संख्या
9 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

रावण के वध के पश्चात देवता, ऋषि, गन्धर्व आदि आकाश से उपस्थित होकर राम की स्तुति करते हैं और उन्हें विष्णु का अवतार घोषित करते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

रावण के मरते ही समस्त देवतागण, ऋषि-मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, चारण आदि आकाश में प्रकट होते हैं। वे राम की वीरता, धैर्य और धर्मपरायणता की प्रशंसा करते हैं। इन्द्र, ब्रह्मा, शिव आदि देवता राम को साक्षात विष्णु का अवतार बताते हैं और उनका आशीर्वाद देते हैं। राम सबका सत्कार करते हैं और विनम्र भाव से उनकी स्तुति सुनते हैं। यह सर्ग राम के दिव्य स्वरूप को उजागर करता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ६७

(रावण वध पर देवताओं की स्तुति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के वध के तुरंत बाद देवताओं में अपार हर्ष छा जाता है। वे आकाश में प्रकट होकर राम की स्तुति करते हैं और उनके वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार कराते हैं।

🌺 देवताओं का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
ऋषयश्च महाभागाः समाजग्मुर्मुदान्विताः ॥
ब्रह्मा च भगवान् देवः शक्रश्च बलसूदनः ।
भगवानपि रुद्रश्च आदित्याश्च वसू रुद्राः ॥
📖 भावार्थ : तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षि, महाभाग ऋषि सब हर्षित होकर वहाँ एकत्र हुए। भगवान ब्रह्मा, देवराज इन्द्र, भगवान रुद्र, आदित्य, वसु और रुद्र भी आए।
॥ श्लोक ६-१० ॥
📖 भावार्थ : सभी देवता राम के चारों ओर खड़े हो गए और उनकी स्तुति करने लगे। उन्होंने कहा कि आपने तीनों लोकों को राक्षसों के आतंक से मुक्त किया है।

🙏 देवताओं की स्तुति (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
त्वं हि विष्णुः परात्मा च जगत्कार्ता जगत्पतिः ।
त्वयैवेदं जगत्सर्वं सृज्यते पाल्यते ह्यसि ॥
रावणस्य वधार्थाय अवतीर्णः स्वतेजसा ।
धर्मसंस्थापनार्थाय राघव त्वं नमो ऽस्तु ते ॥
📖 भावार्थ : "आप ही विष्णु हैं, परमात्मा हैं, जगत के कर्ता और पति हैं। आपके द्वारा ही यह सारा जगत सृजित और पालित है। रावण के वध के लिए आप अपने तेज से अवतीर्ण हुए हैं। धर्म की स्थापना के लिए, हे राघव, आपको नमस्कार है।"
॥ श्लोक १९-२५ ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार सभी देवताओं ने राम की स्तुति की। राम ने विनयपूर्वक सबको प्रणाम किया और उनके आशीर्वाद ग्रहण किए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा

📘 गूढ़ार्थ : राम के दिव्य स्वरूप का उद्घाटन होता है। वे केवल एक मानव राजकुमार नहीं, बल्कि साक्षात विष्णु हैं जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया।

💡 शिक्षा : धर्म की विजय पर सारी सृष्टि प्रसन्न होती है। सच्चे धर्मपालक को देवताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

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आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।