सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रावण के वध के पश्चात देवता, ऋषि, गन्धर्व आदि आकाश से उपस्थित होकर राम की स्तुति करते हैं और उन्हें विष्णु का अवतार घोषित करते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ६७
(रावण वध पर देवताओं की स्तुति)
🔆 प्रस्तावना : रावण के वध के तुरंत बाद देवताओं में अपार हर्ष छा जाता है। वे आकाश में प्रकट होकर राम की स्तुति करते हैं और उनके वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार कराते हैं।
🌺 देवताओं का आगमन (श्लोक १-१०)
ऋषयश्च महाभागाः समाजग्मुर्मुदान्विताः ॥
ब्रह्मा च भगवान् देवः शक्रश्च बलसूदनः ।
भगवानपि रुद्रश्च आदित्याश्च वसू रुद्राः ॥
🙏 देवताओं की स्तुति (श्लोक ११-२५)
त्वयैवेदं जगत्सर्वं सृज्यते पाल्यते ह्यसि ॥
रावणस्य वधार्थाय अवतीर्णः स्वतेजसा ।
धर्मसंस्थापनार्थाय राघव त्वं नमो ऽस्तु ते ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं शिक्षा
📘 गूढ़ार्थ : राम के दिव्य स्वरूप का उद्घाटन होता है। वे केवल एक मानव राजकुमार नहीं, बल्कि साक्षात विष्णु हैं जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया।
💡 शिक्षा : धर्म की विजय पर सारी सृष्टि प्रसन्न होती है। सच्चे धर्मपालक को देवताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।