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चारैश्च परमोदारैः समन्तादन्ववेक्षिता। धर्मेण पालयामास प्रजाः परमया मुदा॥
हिंदी भावार्थ:
“उदार चरों (जासूसों) से सब ओर से देखी जाने वाली प्रजा को धर्मपूर्वक परम प्रसन्नता से पालन किया।”
विशेष व्याख्या:
राजा दशरथ उदार चरों के माध्यम से प्रजा की निगरानी करते थे और धर्मपूर्वक अत्यंत प्रसन्नता से उनका पालन करते थे।
टिप्पणी: यह श्लोक दशरथ के कुशल प्रशासन को दर्शाता है। चर (गुप्तचर) राज्य की सुरक्षा एवं व्यवस्था के लिए नियुक्त किए जाते थे, जो प्रजा की गतिविधियों पर नजर रखते थे। राजा धर्म का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक शासन करता था, जिससे प्रजा में असंतोष नहीं था।
त्रिषु लोकेषु विख्यातस्तेजसा च बलेन च। उदारः सर्वभूतानां दशरथो महीपतिः॥
हिंदी भावार्थ:
“तीनों लोकों में तेज और बल से विख्यात, सब प्राणियों के प्रति उदार, दशरथ महीपति थे।”
विशेष व्याख्या:
राजा दशरथ तीनों लोकों में अपने तेज और बल के लिए प्रसिद्ध थे तथा वे सभी प्राणियों के प्रति उदार थे।
टिप्पणी: यह श्लोक दशरथ के व्यक्तित्व के दो पहलुओं को उजागर करता है – बाह्य रूप से वे तेजस्वी एवं बलशाली थे, और आंतरिक रूप से उदार एवं दयालु। उनकी ख्याति तीनों लोकों में फैली हुई थी।
न तस्य विद्यते तुल्यो राज्ञः कश्चिन्नराधिपः। राजानो यस्य राजेन्द्राः प्रह्वाः सर्वे महीक्षितः॥
हिंदी भावार्थ:
“उस राजा दशरथ के समान कोई दूसरा नरेश नहीं था, जिसके सामने सभी राजा, राजेन्द्र और महीक्षित (भूमिपाल) नतमस्तक रहते थे।”
विशेष व्याख्या:
राजा दशरथ के समान कोई दूसरा राजा नहीं था, क्योंकि सभी राजा, राजेन्द्र और भूमिपाल उनके सामने नतमस्तक थे।
टिप्पणी: यह श्लोक दशरथ की सार्वभौम सत्ता को दर्शाता है। वे इतने महान थे कि अन्य राजा, जो स्वयं राजेन्द्र कहलाते थे, उनके आगे सिर झुकाते थे।
एवं गुणगणैर्युक्तो धर्मेण प्रजपालनः। रेमे राजा सुखं तत्र नान्दीमिव पुरंदरः॥
हिंदी भावार्थ:
“इस प्रकार गुणसमूह से युक्त, धर्मपूर्वक प्रजापालन करने वाला राजा वहाँ सुखपूर्वक रमण करता था, जैसे पुरंदर (इन्द्र) स्वर्ग में।”
विशेष व्याख्या:
दशरथ सभी गुणों से युक्त थे, धर्मपूर्वक प्रजापालन करते थे, और वे अयोध्या में सुखपूर्वक रहते थे, जैसे इन्द्र स्वर्ग में।
टिप्पणी: यह श्लोक दशरथ के जीवन की तुलना इन्द्र से करता है। जैसे इन्द्र स्वर्ग में आनन्दपूर्वक रहते हैं, वैसे ही दशरथ अयोध्या में सुखी थे।
एतैरेव गुणैर्युक्तैः सचिवैः स महीपतिः। शशास पृथिवीं सर्वामिन्द्रो देवगणैरिव॥
हिंदी भावार्थ:
“उन्हीं गुणों से युक्त मंत्रियों के साथ उस महीपति ने सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन किया, जैसे इन्द्र देवगणों के साथ।”
विशेष व्याख्या:
दशरथ ने अपने योग्य मंत्रियों के साथ सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन किया, जैसे इन्द्र देवताओं के साथ स्वर्ग का शासन करते हैं।
टिप्पणी: यह श्लोक दशरथ के मंत्रिमंडल की योग्यता को दर्शाता है। मंत्री भी राजा के समान गुणों से युक्त थे, जिससे शासन सुचारु रूप से चलता था।
न तस्य चौरा विद्यन्ते न दुर्वृत्ता न दस्यवः। न ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च विरोधं कुर्वते क्वचित्॥
हिंदी भावार्थ:
“उसके राज्य में न चोर थे, न दुर्वृत्त लोग, न डाकू; और न कभी ब्राह्मण और क्षत्रिय परस्पर विरोध करते थे।”
विशेष व्याख्या:
दशरथ के राज्य में चोर, दुर्वृत्त, डाकू नहीं थे, और ब्राह्मण-क्षत्रियों में कभी विरोध नहीं होता था।
टिप्पणी: यह श्लोक रामराज्य के आदर्श को प्रस्तुत करता है, जहाँ अपराध नहीं होते और सामाजिक सौहार्द बना रहता है।
सीमापि विवदन्ते न न च व्याला विकुर्वते। न चापि म्रियते बालो न दम्पतिविरोधनम्॥
हिंदी भावार्थ:
“सीमा को लेकर लोग झगड़ा नहीं करते थे, न ही हिंसक पशु उपद्रव करते थे, न ही बालक मरते थे, और न ही पति-पत्नी में विरोध होता था।”
विशेष व्याख्या:
राज्य में सीमा विवाद नहीं थे, जंगली जानवर आक्रामक नहीं होते थे, बाल मृत्यु नहीं होती थी, और दांपत्य जीवन में कलह नहीं थी।
टिप्पणी: यह श्लोक प्रकृति और समाज के बीच सामंजस्य को दर्शाता है। राजा के धार्मिक शासन का प्रभाव सम्पूर्ण सृष्टि पर पड़ता है।
सर्वे रामगुणैर्युक्ताः प्रजा धर्मपरायणाः। वर्णाश्रमाणां सर्वेषां यथाशास्त्रं प्रवर्तिनाम्॥
हिंदी भावार्थ:
“सभी प्रजाजन राम के समान गुणों से युक्त, धर्मपरायण और सभी वर्णों तथा आश्रमों के लोग शास्त्रानुसार आचरण करने वाले थे।”
विशेष व्याख्या:
प्रजा राम के समान गुणवान, धर्मपरायण और सभी वर्णाश्रम शास्त्रानुसार आचरण करने वाले थे।
टिप्पणी: यह श्लोक प्रजा की उच्च कोटि को दर्शाता है। वे राम के समान गुणों से युक्त थे, अर्थात् राम के आदर्श उनमें भी थे।
दीर्घायुषो नराः सर्वे धार्मिकाः सत्यवादिनः। न तेषां विद्यते दुःखं सर्वे सुखमयाः प्रजाः॥
हिंदी भावार्थ:
“सभी मनुष्य दीर्घायु, धार्मिक और सत्यवादी थे। उन्हें किसी प्रकार का दुःख नहीं था, सभी प्रजाजन सुखमय थे।”
विशेष व्याख्या:
सभी नर दीर्घायु, धार्मिक और सत्यवादी थे। उन्हें कोई दुःख नहीं था, सारी प्रजा सुखी थी।
टिप्पणी: यह श्लोक प्रजा की समृद्धि और सुख का वर्णन करता है। दीर्घायु, धर्म, सत्य और दुःख का अभाव – ये रामराज्य के लक्षण हैं।
एवं गुणगणैर्युक्तो राजा दशरथः प्रियः। बभूव सर्वभूतानां प्रजानां च हिते रतः॥
हिंदी भावार्थ:
“इस प्रकार गुणसमूह से युक्त राजा दशरथ सब प्राणियों और प्रजा के हित में लगे रहने के कारण प्रिय हुए।”
विशेष व्याख्या:
इस प्रकार गुणों से युक्त राजा दशरथ सभी प्राणियों और प्रजा के हित में लगे रहने के कारण सबको प्रिय थे।
टिप्पणी: यह श्लोक सर्ग का समापन श्लोक है, जो दशरथ की लोकप्रियता और उनके हितकारी स्वभाव का सार प्रस्तुत करता है।
पुत्रकामो नरपतिः पुत्रीयामिष्टिमैजयत्। ऋत्विग्भिर्ब्रह्मविद्भिश्च यथावद्भिरलङ्कृतः॥
हिंदी भावार्थ:
“पुत्र की कामना वाले राजा ने पुत्रीया नामक इष्टि (यज्ञ) का अनुष्ठान कराया, जो यथाविधि ब्रह्मवेत्ता ऋत्विजों से सुसज्जित था।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा दशरथ द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए किए गए पुत्रीया यज्ञ का वर्णन करता है। इसमें यज्ञ की वैदिक परम्परा और ऋत्विजों के महत्व को दर्शाया गया है।
टिप्पणी: इस श्लोक में राजा दशरथ की पुत्रेष्टि की पृष्ठभूमि रखी गई है। यह यज्ञ आगे चलकर पुत्र प्राप्ति का कारण बनता है।
स यज्ञः सुमहानासीत्तस्य राज्ञो महात्मनः। पुत्रीयो नाम विप्रेन्द्रैस्तत्र पूर्वैः कृतः क्रतुः॥
हिंदी भावार्थ:
“वह यज्ञ उस महात्मा राजा का अत्यंत महान था। 'पुत्रीय' नामक वह यज्ञ पूर्व काल में महर्षियों द्वारा किया गया था।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक पुत्रीया यज्ञ की प्राचीनता और महत्ता को स्थापित करता है, जिसे पूर्वकाल में महर्षियों ने भी किया था।
टिप्पणी: यहाँ यज्ञ की महिमा का गुणगान किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि दशरथ का यज्ञ प्राचीन परंपरा का अनुसरण करते हुए किया गया था।
तस्मिन्यज्ञे समाप्ते तु राजा दशरथः स्वयम्। ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दिव्यां ददौ रत्नमयीं शुभाम्॥
हिंदी भावार्थ:
“उस यज्ञ के समाप्त होने पर राजा दशरथ ने स्वयं ऋत्विजों को दिव्य, रत्नमयी एवं शुभ दक्षिणा दी।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा की उदारता और यज्ञ की पूर्णता को दर्शाता है। दक्षिणा यज्ञ का अनिवार्य अंग है।
टिप्पणी: यज्ञ के बाद दक्षिणा देना वैदिक परंपरा है। यहाँ दक्षिणा को 'दिव्याम्' और 'रत्नमयीम्' कहकर उसकी महत्ता बढ़ाई गई है। राजा ने स्वयं (स्वयम्) दक्षिणा दी, जो उनके साक्षात् भाग लेने का प्रतीक है।
ते च सर्वे द्विजश्रेष्ठाः प्रतिगृह्य महाधनम्। ऊचुः प्राञ्जलयो राज्ञं पुत्रप्राप्तिर्भविष्यति॥
हिंदी भावार्थ:
“उन सभी द्विजश्रेष्ठों ने महाधन ग्रहण करके हाथ जोड़कर राजा से कहा – "आपको पुत्र की प्राप्ति होगी।"”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक ऋत्विजों द्वारा राजा को दिए गए आशीर्वाद का वर्णन करता है।
टिप्पणी: दक्षिणा ग्रहण करने के बाद ऋत्विजों का आशीर्वाद देना यज्ञ की पूर्णता का सूचक है। 'प्राञ्जलयः' (हाथ जोड़कर) विनय और आदर का भाव दर्शाता है। यहाँ पुत्रप्राप्ति का वचन भविष्यत्काल में दिया गया है, जो निश्चित फल का द्योतक है।
इत्युक्त्वा ते द्विजा राज्ञं जग्मुः सर्वे यथागतम्। राजापि प्रीतमनसा निवासाय मनो दधे॥
हिंदी भावार्थ:
“ऐसा कहकर वे सभी ब्राह्मण राजा से यथागत (जिधर से आए थे) चले गए। राजा भी प्रसन्न मन से निवास (महल) में प्रवेश के लिए तैयार हुए।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक यज्ञ समाप्ति के बाद ऋत्विजों के प्रस्थान और राजा की प्रसन्नता का वर्णन करता है।
टिप्पणी: यज्ञ के बाद ऋत्विजों का अपने-अपने स्थानों पर लौटना स्वाभाविक है। 'यथागतम्' का अर्थ है जिस रास्ते से वे आए थे, उसी रास्ते से वापस गए। राजा का 'प्रीतमनसा' होना उनकी आंतरिक संतुष्टि और आश्वस्ति को दर्शाता है कि उनकी कामना पूरी होगी।
एवं प्रशासतस्तस्य पृथिवीं सागराम्बराम्। कालः प्रावर्तत महान्बहुवर्षगणायुतः॥
हिंदी भावार्थ:
“इस प्रकार समुद्रपर्यन्त (सागर अम्बर) पृथ्वी का शासन करते हुए उन (राजा) के बहुत वर्षों का महान काल व्यतीत हो गया।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा दशरथ के दीर्घकालीन शासन का वर्णन करता है।
टिप्पणी: यहाँ राजा के शासन की अवधि को 'बहुवर्षगणायुतः' कहा गया है, जो दर्शाता है कि उन्होंने बहुत वर्षों तक राज्य किया। 'सागराम्बराम्' का अर्थ है जिसकी सीमा सागर है अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी। यह राजा की सार्वभौम सत्ता को दर्शाता है।
स कदाचिन्महातेजा नरेन्द्रो रघुनन्दनः। चिन्तयामास पुत्रार्थे न च लेभे सुतं प्रियम्॥
हिंदी भावार्थ:
“वह महातेजस्वी नरेन्द्र रघुनंदन (दशरथ) कभी पुत्र के लिए चिंतित हुए, क्योंकि उन्हें प्रिय पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई थी।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा की पुत्रहीनता से उत्पन्न चिंता को व्यक्त करता है।
टिप्पणी: यहाँ 'महातेजाः' और 'रघुनन्दनः' विशेषण राजा की महानता और वंश की प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं, जिसके बावजूद उन्हें पुत्र सुख नहीं मिला। 'चिन्तयामास' परस्मैपद प्रयोग से चिंता की तीव्रता व्यक्त होती है।
स चिन्तयित्वा धर्मात्मा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम्। आहूय प्राह धर्मज्ञो वाक्यं वाक्यविशारदः॥
हिंदी भावार्थ:
“चिंतन करके उस धर्मात्मा, धर्मज्ञ एवं वाक्यविशारद राजा ने मंत्रियों में श्रेष्ठ सुमंत्र को बुलाकर वचन कहा।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा द्वारा मंत्री सुमंत्र को बुलाने और परामर्श करने का प्रसंग है।
टिप्पणी: राजा के लिए धर्मात्मा, धर्मज्ञ, वाक्यविशारद विशेषण उनकी योग्यता को दर्शाते हैं। वे स्वयं ज्ञानी होते हुए भी मंत्री की सलाह लेते हैं, जो एक कुशल शासक का लक्षण है।
सुमन्त्र शृणु मद्वाक्यं प्रियं त्वं हितकारकम्। पुत्रार्थं यतते राजा न च पुत्रमवाप्नुयात्॥
हिंदी भावार्थ:
“हे सुमन्त्र! तुम मेरे प्रिय एवं हितकारक वाक्य को सुनो। राजा पुत्र के लिए यत्न कर रहा है, फिर भी पुत्र को प्राप्त नहीं कर पा रहा है।”
विशेष व्याख्या:
राजा अपनी व्यथा सुमंत्र से साझा करते हैं।
टिप्पणी: यहाँ राजा ने सुमंत्र को 'प्रिय' और 'हितकारक' कहकर संबोधित किया है, जो उनके घनिष्ठ संबंध को दर्शाता है। 'यतते' और 'अवाप्नुयात्' क्रियाएँ प्रयास और अप्राप्ति की स्थिति को स्पष्ट करती हैं।
त्वमेव मन्त्रिणां श्रेष्ठ उपायं परिचिन्तय। येन पुत्रं लभेयाहमृत्विग्भिश्च समन्वितः॥
हिंदी भावार्थ:
“तुम ही मंत्रियों में श्रेष्ठ हो; ऐसा उपाय सोचो जिससे मैं ऋत्विजों से युक्त होकर पुत्र प्राप्त कर सकूँ।”
विशेष व्याख्या:
राजा सुमंत्र से पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछते हैं।
टिप्पणी: यहाँ 'परिचिन्तय' उपसर्गपूर्वक आग्रह दर्शाता है। राजा चाहते हैं कि सुमंत्र कोई ऐसा मार्ग सुझाएँ जिससे यज्ञ (ऋत्विजों सहित) के माध्यम से पुत्र की प्राप्ति हो। यह आगे चलकर ऋष्यशृंग के आगमन और पुत्रेष्टि यज्ञ का मार्ग प्रशस्त करता है।
शोधकर्ता व व्याख्याता
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
संपादकीय समीक्षा
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।