श्लोक संख्या पर सीधे जाएँ:
स शरं धनुषा गृह्य मृगान् हन्तुं चकार ह। तेन शब्देन वित्रस्ता गावश्च मृगपक्षिणः॥
हिंदी भावार्थ:
“उसने (राजा ने) धनुष से बाण लेकर मृगों को मारना आरंभ किया। उस शब्द से गायें, मृग और पक्षी भयभीत हो गए।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा के आखेट (शिकार) के वर्णन को दर्शाता है, जिसमें उनके बाण की टंकार से समस्त प्राणी भयभीत हो जाते हैं।
टिप्पणी: यह श्लोक राजा दशरथ की शिकार प्रियता को दर्शाता है। प्राचीन काल में क्षत्रियों के लिए शिकार खेलना मनोरंजन और कौशल का विषय था। यहाँ "वित्रस्ताः" शब्द से प्राणियों के भय का सजीव चित्रण हुआ है।
ततः सरय्वाः सलिलं पातुं यातो नराधिपः। अपश्यत् स महातेजा मुनिं दीर्घं तपोधनम्॥
हिंदी भावार्थ:
“तत्पश्चात् नराधिप (राजा) सरयू के जल को पीने के लिए गए। उस महातेजस्वी राजा ने एक दीर्घ तपोधन (दीर्घकाल तक तप करने वाले) मुनि को देखा।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा द्वारा सरयू तट पर एक महान तपस्वी के दर्शन का वर्णन करता है।
टिप्पणी: यह श्लोक राजा के नियमित कार्यों और ऋषियों के प्रति उनकी श्रद्धा को दर्शाता है। "तपोधनम्" का अर्थ है जिसका धन तप है, अर्थात् तपस्वी। "दीर्घम्" विशेषण मुनि की तपस्या की लंबी अवधि को इंगित करता है।
तं दृष्ट्वा राजशार्दूलो मुनिं परमधार्मिकम्। पूजयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः॥
हिंदी भावार्थ:
“उस परमधार्मिक मुनि को देखकर राजशार्दूल (सिंह के समान पराक्रमी राजा) ने, जो धर्मज्ञ और सर्वभूतहित में रत थे, उनकी पूजा की।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक राजा के मुनि के प्रति श्रद्धा और सम्मान को दर्शाता है।
टिप्पणी: राजा के लिए "राजशार्दूलः" (सिंहतुल्य राजा) और "धर्मज्ञः" विशेषणों का प्रयोग उनके पराक्रम और धर्मनिष्ठा को दर्शाता है। "सर्वभूतहिते रतः" यह सिद्ध करता है कि राजा सभी प्राणियों के कल्याण में लीन थे।
तस्य राज्ञो वरं प्रादान्मुनिः परमधार्मिकः। येन तुष्टो महातेजा दशरथस्य धीमतः॥
हिंदी भावार्थ:
“उस परमधार्मिक मुनि ने राजा को वरदान दिया, जिससे वे महातेजस्वी एवं धीमान् दशरथ अत्यंत प्रसन्न हो गए।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक मुनि द्वारा राजा को वरदान दिए जाने का वर्णन करता है।
टिप्पणी: इस श्लोक में वरदान की प्रकृति का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, परंतु संदर्भ से यह स्पष्ट है कि यह वरदान पुत्र प्राप्ति से संबंधित था। "प्रादात्" (दिया) भूतकाल में वरदान की घटना को स्थापित करता है।
एवं गुणगणैर्युक्तो राजा दशरथोऽभवत्। यस्य पुत्रो महातेजा रामो राजीवलोचनः॥
हिंदी भावार्थ:
“इस प्रकार गुणों के समूह से युक्त राजा दशरथ थे, जिनके पुत्र महातेजस्वी, कमलनयन श्रीराम हुए।”
विशेष व्याख्या:
यह श्लोक सर्ग का समापन करता है और राजा दशरथ के गुणों एवं उनके पुत्र राम के आगमन की सूचना देता है।
टिप्पणी: यह श्लोक सर्ग ७ का अंतिम श्लोक है। यह राजा दशरथ के चरित्र का सार प्रस्तुत करता है और साथ ही आगामी सर्गों में राम के जन्म की ओर संकेत करता है। "राजीवलोचनः" (कमलनयन) राम के सौंदर्य और दिव्यता का वर्णन करता है।
शोधकर्ता व व्याख्याता
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
संपादकीय समीक्षा
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।