🕉️ बाल काण्ड · सर्ग 3

राम की कहानी

बाल काण्ड का तीसरा सर्ग राम के जन्म से लेकर उनके विवाह तक की संक्षिप्त कथा प्रस्तुत करता है। इसमें राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ, राम आदि चारों पुत्रों के जन्म, उनकी बाल लीलाओं, गुरु वशिष्ठ द्वारा शिक्षा, ऋषि विश्वामित्र के आगमन और उनके साथ राम-लक्ष्मण के प्रस्थान की पृष्ठभूमि का वर्णन है।

30 सम्पूर्ण श्लोक
3 सर्ग संख्या
28 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

बाल काण्ड का तीसरा सर्ग राम के जन्म से लेकर उनके विवाह तक की संक्षिप्त कथा प्रस्तुत करता है। इसमें राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ, राम आदि चारों पुत्रों के जन्म, उनकी बाल लीलाओं, गुरु वशिष्ठ द्वारा शिक्षा, ऋषि विश्वामित्र के आगमन और उनके साथ राम-लक्ष्मण के प्रस्थान की पृष्ठभूमि का वर्णन है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण के कथा-सूत्र का संक्षिप्त परिचय देता है। इसमें वर्णन है कि कैसे राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए ऋंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और उन्होंने राजा को खीर (पायस) प्रदान की, जिसे उन्होंने अपनी तीनों रानियों में बाँट दिया। इसके फलस्वरूप कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों पुत्रों का बाल्यकाल अयोध्या में व्यतीत हुआ। उन्होंने वेदों, धनुर्विद्या और राजनीति की शिक्षा गुरु वशिष्ठ से प्राप्त की। एक दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राजा दशरथ से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को माँगा। राजा दशरथ के विरोध के बावजूद, गुरु वशिष्ठ के परामर्श से राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया गया। इस प्रकार यह सर्ग राम के वन-गमन की आधारशिला रखता है, जो आगे चलकर महान घटनाओं का कारण बना।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ३

(राम की कहानी – जन्म से विश्वामित्र के आश्रम तक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ तृतीयः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : द्वितीय सर्ग में हमने अयोध्या के वैभव और राजा दशरथ के शासन का वर्णन सुना। अब तृतीय सर्ग में हम राम के जन्म की दिव्य कथा सुनेंगे। यह सर्ग रामकथा का हृदय है, जहाँ से नायक का आविर्भाव होता है। राजा दशरथ की पुत्रेष्टि यज्ञ से लेकर राम-लक्ष्मण के विश्वामित्र के साथ वन-गमन तक की यह यात्रा अत्यन्त रोमांचक और आध्यात्मिक है।

📜 पुत्रेष्टि यज्ञ और राम का जन्म (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १ ॥
पुत्रेष्टिं नाम यज्ञं तु राजा वै दशरथः तदा ।
चकार फलनिर्वृत्तिं पुत्रार्थं पुत्रवत्सलः ॥ १-३-१ ॥
🔹 पदच्छेद : पुत्रेष्टिम् = पुत्रेष्टि नामक; नाम = नाम से; यज्ञम् = यज्ञ; तु = तो; राजा = राजा; वै = निश्चय ही; दशरथः = दशरथ ने; तदा = तब; चकार = किया; फलनिर्वृत्तिम् = फल की प्राप्ति के लिए; पुत्रार्थम् = पुत्र की इच्छा से; पुत्रवत्सलः = पुत्र के स्नेही।
📖 भावार्थ : पुत्र के प्रति अत्यन्त स्नेह रखने वाले राजा दशरथ ने पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया।
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ कोई साधारण राजा नहीं थे, वे अत्यन्त पुत्रवत्सल थे। उनकी यह तीव्र इच्छा ही यज्ञ का कारण बनी।
॥ श्लोक ६ ॥
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋत्विजः समुपागताः ।
दिव्यं पुरुषमादाय राज्ञे दुःखापहं शुभम् ॥ १-३-६ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; यज्ञे = यज्ञ के; समाप्ते = समाप्त होने पर; तु = ही; ऋत्विजः = ऋत्विज (याजक); समुपागताः = आए; दिव्यम् = दिव्य; पुरुषम् = पुरुष को; आदाय = लेकर; राज्ञे = राजा को; दुःखापहम् = दुःख दूर करने वाला; शुभम् = कल्याणकारी।
📖 भावार्थ : यज्ञ के समाप्त होने पर ऋत्विज एक दिव्य पुरुष को लेकर राजा के पास आए, जो अत्यन्त कल्याणकारी और दुःखों को दूर करने वाला था।
🔍 व्याख्या : यह दिव्य पुरुष स्वयं अग्निदेव के प्रतिनिधि के रूप में प्रकट हुए। उनके हाथ में पायस (खीर) से भरा स्वर्ण पात्र था, जो पुत्र प्राप्ति का वरदान था।
॥ श्लोक ७ ॥
राजन्निमं पुरस्कृत्य पायसं देवनिर्मितम् ।
प्रतीच्छ भद्रे भद्रं ते पत्नीनां विनियोजय ॥ १-३-७ ॥
📖 भावार्थ : "हे राजन्! देवताओं द्वारा निर्मित इस पायस (खीर) को ग्रहण कीजिए। यह आपके लिए कल्याणकारी है। इसे अपनी पत्नियों में वितरित कर दीजिए।"
॥ श्लोक १० ॥
कौशल्या जनयामास रामं सत्यपराक्रमम् ।
कैकेयी जनयामास भरतं शीलसंयुतम् ॥ १-३-१० ॥
📖 भावार्थ : कौशल्या ने सत्यपराक्रमी राम को जन्म दिया। कैकेयी ने शीलसंपन्न भरत को जन्म दिया।
॥ श्लोक ११ ॥
सुमित्रा जनयामास लक्ष्मणं शत्रुघ्नं तथा ।
चतुरो जनयामास पुत्रान् राजा स धार्मिकः ॥ १-३-११ ॥
📖 भावार्थ : सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। इस प्रकार धार्मिक राजा दशरथ ने चार पुत्र प्राप्त किए।

🎓 बाल्यकाल और शिक्षा (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३ ॥
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः ।
सर्वे ज्ञानोपसंपन्नाः सर्वे रूपगुणान्विताः ॥ १-३-१३ ॥
📖 भावार्थ : वे सभी (चारों पुत्र) वेदों के ज्ञाता, शूरवीर, लोकहित में रत, ज्ञान से संपन्न और रूप-गुणों से युक्त थे।
॥ श्लोक १५ ॥
वसिष्ठस्तु महातेजाः पुरोधा राजवल्लभः ।
उपादिशत् सुतान् राज्ञो धर्मकामार्थसाधकान् ॥ १-३-१५ ॥
📖 भावार्थ : राजा के परम प्रिय पुरोधा महातेजस्वी वशिष्ठ ने राजपुत्रों को धर्म, अर्थ और काम का साधक ज्ञान प्रदान किया।
🔍 व्याख्या : गुरु वशिष्ठ ने राजकुमारों को न केवल शास्त्रों की शिक्षा दी, वरन् धनुर्विद्या और राजधर्म का भी प्रशिक्षण दिया।

🕉️ ऋषि विश्वामित्र का आगमन (श्लोक १९-२४)

॥ श्लोक १९ ॥
तत ऋषिर्महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
राजानं दशरथं प्राप्तो वनवासादिहागतः ॥ १-३-१९ ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र वनवास से लौटकर यहाँ राजा दशरथ के पास आए।
॥ श्लोक २१ ॥
इमौ तु पुत्रौ सहितौ रामलक्ष्मणौ उत्तमौ ।
ददस्व मे नरश्रेष्ठ यज्ञरक्षणकारणात् ॥ १-३-२१ ॥
📖 भावार्थ : (विश्वामित्र ने कहा) "हे नरश्रेष्ठ! यज्ञ की रक्षा के लिए मुझे अपने इन उत्तम पुत्रों राम और लक्ष्मण को सौंप दीजिए।"
॥ श्लोक २३ ॥
राजा तु वचनं श्रुत्वा मुनेः परमधार्मिकः ।
हर्षव्याकुलितात्माऽभूत् पुत्रस्नेहसमन्वितः ॥ १-३-२३ ॥
📖 भावार्थ : परम धार्मिक राजा दशरथ मुनि का वचन सुनकर हर्ष और पुत्र-स्नेह से व्याकुल हो गए।

🚩 राम-लक्ष्मण का प्रस्थान (श्लोक २५-२८)

॥ श्लोक २६ ॥
वसिष्ठस्तु तदा वाक्यमुवाच परमार्थवित् ।
रक्षितव्यौ च भवता राजपुत्रौ महाबलौ ॥ १-३-२६ ॥
📖 भावार्थ : परमार्थ के ज्ञाता वशिष्ठ ने तब (विश्वामित्र से) कहा – "आपको इन महाबली राजपुत्रों की रक्षा करनी चाहिए।"
॥ श्लोक २८ ॥
तौ गच्छन्तौ महात्मानौ मुनिणा सहितौ तदा ।
अयोध्यां प्रस्थितौ वीरौ यत्र रामः सहानुजः ॥ १-३-२८ ॥
🔹 पदच्छेद : तौ = वे दोनों; गच्छन्तौ = जाते हुए; महात्मानौ = महात्मा; मुनिणा = मुनि के साथ; सहितौ = संयुक्त; तदा = तब; अयोध्याम् = अयोध्या से; प्रस्थितौ = प्रस्थान किया; वीरौ = वीरों ने; यत्र = जहाँ; रामः = राम; सह = सहित; अनुजः = अनुज (लक्ष्मण)।
📖 भावार्थ : तब वे दोनों महात्मा वीर, मुनि के साथ अयोध्या से प्रस्थान कर गए। इस प्रकार राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ चले गए।
🔍 व्याख्या : यह अयोध्या से राम का पहला प्रस्थान था, जो आगे चलकर वनवास और महान कार्यों का सूत्रपात सिद्ध हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

✨ पुत्रेष्टि यज्ञ का महत्त्व

यह यज्ञ केवल पुत्र प्राप्ति का साधन नहीं, वरन् धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है। राम का जन्म अधर्म के नाश के लिए हुआ था।

🤝 गुरु-शिष्य परम्परा

राम ने गुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और फिर गुरु विश्वामित्र की आज्ञा का पालन किया। यह भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🌳 वन-गमन का प्रारम्भ

यह सर्ग राम के वन-गमन का प्रथम चरण है। यहाँ वन जाना कोई निर्वासन नहीं, वरन् ऋषि की रक्षा और धर्म की रक्षा का कार्य है।

🙏 राजा दशरथ का त्याग

पुत्रों के प्रति अगाध स्नेह के बावजूद राजा दशरथ ने धर्म और ऋषि के वचन को प्राथमिकता दी। यह त्याग उनके महान राजा होने का प्रमाण है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि संतान के जन्म से पहले उसके उद्देश्य का निर्धारण हो जाता है। राम का जन्म धर्म की रक्षा के लिए हुआ था, और उन्होंने बाल्यकाल से ही उस मार्ग पर चलना प्रारम्भ कर दिया। माता-पिता और गुरु की आज्ञा का पालन ही सच्चा धर्म है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

श्लोक संख्या 21

राघवस्य विलापं च गृध्रराजनिबर्हणम् । कबन्धदर्शनं चैव पम्पायाश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राघव (राम) का विलाप, गृध्रराज (जटायु) का वध, कबन्ध का दर्शन तथा पम्पा सरोवर का भी दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक राम के वनवास के दुःखद घटनाक्रम को संक्षेप में बताता है - सीता की खोज में व्याकुल राम का विलाप, वीर जटायु का रावण से युद्ध करते हुए वध, तथा आगे की यात्रा में राम का कबन्ध नामक राक्षस से मिलना और पम्पा सरोवर के तट पर पहुँचना। ये घटनाएँ राम के जीवन में संक्रमणकालीन क्षण हैं, जो उन्हें हनुमान और सुग्रीव से मिलाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के उस महत्वपूर्ण चरण को चिन्हित करता है जहाँ करुणा और दुःख चरम पर है। जटायु का बलिदान अद्वितीय है, जिसने रावण को रोकने का प्रयास किया। कबन्ध की कथा राम और लक्ष्मण को सुग्रीव से मिलने की प्रेरणा देती है। पम्पा सरोवर का वर्णन प्राकृतिक सौंदर्य और राम के मानसिक दुःख के विरोधाभास को दर्शाता है।
श्लोक संख्या 22

शबरीदर्शनं चैव फलमूलाशनं तथा । प्रलापं चैव पम्पायां हनूमद्दर्शनं तथा ॥

हिंदी भावार्थ:

“शबरी का दर्शन, फल-मूल का भोजन, पम्पा सरोवर पर विलाप और हनुमान का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

राम और लक्ष्मण की भेंट शबरी से होती है, जो उन्हें भक्तिभाव से फल खिलाती है। तत्पश्चात राम पम्पा सरोवर पर फिर से सीता के वियोग में विलाप करते हैं। वहीं उनकी भेंट हनुमान से होती है, जो सुग्रीव के दूत के रूप में आते हैं।

टिप्पणी: शबरी का प्रसंग भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। उसने राम के आने की प्रतीक्षा में वर्षों बिताए। राम ने उसके द्वारा चखे हुए फल खाकर उसकी भक्ति को सर्वोच्च सम्मान दिया। पम्पा पर विलाप राम के विरह का चरम है। इसी बीच हनुमान का आगमन होता है, जो राम के दुःख को दूर करने वाले मित्र और सेवक के रूप में उभरते हैं।
श्लोक संख्या 23

ऋष्यमूकस्य गमनं सुग्रीवेण समागमम् । प्रत्ययोत्पादनं सख्यं वालिसुग्रीवविग्रहम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“ऋष्यमूक पर्वत पर जाना, सुग्रीव से मिलना, विश्वास उत्पन्न करना, मित्रता करना और वालि-सुग्रीव के बीच वैर का वर्णन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान के कहने पर राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर जाते हैं और वहाँ सुग्रीव से मिलते हैं। सुग्रीव को राम पर विश्वास दिलाया जाता है, और दोनों में अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता होती है। सुग्रीव अपने बड़े भाई वालि से हुए विग्रह (झगड़े) का वर्णन करते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और भावनात्मक गठजोड़ को दर्शाता है। राम और सुग्रीव की मित्रता धर्म और आपसी लाभ पर आधारित थी। सुग्रीव को वालि के भय से मुक्ति चाहिए थी, और राम को सीता की खोज के लिए एक शक्तिशाली सहयोगी की आवश्यकता थी। हनुमान ने इस मित्रता में सेतु का कार्य किया।
श्लोक संख्या 24

वालिप्रमथनं चैव सुग्रीवप्रतिपादनम् । ताराविलापं समयं वर्षरात्रनिवासनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“वालि का वध, सुग्रीव को राज्य सौंपना, तारा का विलाप, ऋतु (वर्षा) की रातों में निवास करना।”

विशेष व्याख्या:

राम द्वारा वालि का वध किए जाने के बाद, सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बनाया जाता है। वालि की पत्नी तारा विलाप करती है। राम और लक्ष्मण वर्षा ऋतु की रातें उसी क्षेत्र में बिताते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक राम के वचनबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने सुग्रीव को वालि से मुक्ति दिलाई और उसे राजा बनाया। तारा का विलाप करुणा का अद्भुत उदाहरण है, जो युद्ध की विभीषिका को दर्शाता है। वर्षा ऋतु का वर्णन राम के धैर्य और प्रतीक्षा को दर्शाता है, क्योंकि वर्षा समाप्त होने पर ही सीता की खोज का अभियान शुरू हो सकता था।
श्लोक संख्या 25

कोपं राघवसिंहस्य बलानामुपसंग्रहम् । दिशः प्रस्थापनं चैव पृथिव्याश्च निवेदनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राघवसिंह (राम) के क्रोध को, (वानर) सेनाओं के एकत्रीकरण को, दिशाओं में भेजे जाने को तथा पृथ्वी का (सीता के बारे में) समाचार न देने का वर्णन।”

विशेष व्याख्या:

जब वर्षा ऋतु बीत गई और सुग्रीव ने सीता की खोज में कोई पहल नहीं की, तो राम को बहुत क्रोध आया। इस पर सुग्रीव ने सभी दिशाओं में वानर सेनाएँ भेजीं। लेकिन उन सेनाओं को सीता का कोई पता नहीं चला।

टिप्पणी: यह श्लोक राम के सिंह-समान क्रोध को दर्शाता है, जो उनके नेतृत्व कौशल और समय के महत्व को रेखांकित करता है। सुग्रीव की निष्क्रियता से कुपित होकर, राम ने उसे उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाया। इसके बाद व्यापक स्तर पर खोज अभियान शुरू हुआ। सभी दिशाओं में वानर भेजे गए, लेकिन प्रारंभिक प्रयास असफल रहे, जिससे राम की चिंता और बढ़ गई।
श्लोक संख्या 26

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम् । प्रायोपवेशनं चैव संपातेश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“अंगूठी का दान, ऋक्ष (भालू) की गुफा का दर्शन, प्रायोपवेशन (भूख पर आसन) और संपाति का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान को सीता को पहचानने के लिए राम ने अपनी अंगूठी दी। रास्ते में उन्हें एक भालू (ऋक्ष) की गुफा दिखी। जब खोजी दल को सीता का कोई पता नहीं चला और समय सीमा समाप्त हो गई, तो उन्होंने प्रायोपवेशन (भूख पर बैठने) का निर्णय लिया। तभी उनकी भेंट गृध्र संपाति से हुई।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान के दक्षिण दिशा अभियान की महत्वपूर्ण घटनाओं को समेटे हुए है। राम की अंगूठी सीता के लिए विश्वास का प्रतीक थी। प्रायोपवेशन दल के समर्पण और निराशा की चरम सीमा को दर्शाता है। संपाति का दर्शन एक दैवीय हस्तक्षेप है, जो उन्हें सीता के लंका में होने की सूचना देता है।
श्लोक संख्या 27

पर्वतारोहणं चैव सागरस्यापि लङ्घनम् । समुद्रवचनाच्चैव मैनाकस्य च दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“पर्वत पर चढ़ना, सागर का लंघन करना, समुद्र के वचन से मैनाक पर्वत का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान लंका जाने के लिए महेन्द्र पर्वत पर चढ़े और फिर उससे छलांग लगाकर समुद्र का लंघन किया। समुद्र ने उनकी परीक्षा ली और फिर मैनाक पर्वत को उनके विश्राम के लिए प्रकट होने का आदेश दिया।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान की अद्भुत शक्ति और दृढ़ संकल्प का परिचायक है। सौ योजन (लगभग 1200 किमी) चौड़े समुद्र को लाँघना असंभव-सा कार्य था, लेकिन राम-कार्य के प्रति समर्पण ने हनुमान को यह शक्ति प्रदान की। समुद्र ने उनकी परीक्षा लेने के लिए मैनाक को बीच में भेजा, लेकिन हनुमान ने उसे केवल स्पर्श किया और आगे बढ़ गए।
श्लोक संख्या 28

राक्षसीतर्जनं चैव च्छायाग्राहस्य दर्शनम् । सिंहिकायाश्च निधनं लङ्कामलयदर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राक्षसियों (लंकिनी) की धमकी, छायाग्राह (सिंहिका) का दर्शन, सिंहिका का वध तथा लंका और मलय पर्वत का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

लंका पहुँचने पर हनुमान का सामना लंका की रक्षिका राक्षसी लंकिनी से हुआ, जिसने उन्हें रोका। हनुमान ने उसे मारा। आगे बढ़ने पर उन्हें छायाग्राही राक्षसी सिंहिका दिखी, जिसका उन्होंने वध किया। अंत में उन्होंने लंका और मलय पर्वत का दर्शन किया।

टिप्पणी: यह श्लोक लंका में प्रवेश से पूर्व हनुमान की अंतिम बाधाओं और उनकी विजय का वर्णन करता है। लंकिनी का दमन लंका की सुरक्षा व्यवस्था के भेदन का प्रतीक है। सिंहिका का वध उनके ज्ञान और सतर्कता को दर्शाता है। अंत में लंका का दर्शन उनके मिशन के सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचने का सूचक है।
श्लोक संख्या 29

रात्रौ लङ्काप्रवेशं च एकस्यापि विचिन्तनम् । आपानभूमिगमनमवरोधस्य दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“रात्रि में लंका में प्रवेश, अकेले (सीता के विषय में) चिंतन, मदिरालय (आपानभूमि) में जाना और अन्तःपुर (अवरोध) का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान ने रात के समय लंका में प्रवेश किया और सीता की खोज के लिए अकेले ही योजना बनाई। उन्होंने रावण के मदिरालय (आपानभूमि) का भ्रमण किया और फिर अन्तःपुर (रानियों के निवास) को देखा।

टिप्पणी: हनुमान की बुद्धिमत्ता और रणनीति का परिचायक है यह श्लोक। उन्होंने रात्रि के अंधेरे का लाभ उठाकर नगर में प्रवेश किया। एकाकी चिंतन उनके गंभीर और विवेकशील स्वभाव को दर्शाता है। आपानभूमि और अन्तःपुर का भ्रमण उनकी खोज की व्यवस्थित पद्धति को बताता है।
श्लोक संख्या 30

दर्शनं रावणस्यापि पुष्पकस्य च दर्शनम् । अशोकवनिकायानं सीतायाश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“रावण का दर्शन, पुष्पक विमान का दर्शन, अशोक वाटिका में जाना तथा सीता का दर्शन।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान ने सर्वप्रथम रावण को उसके वैभव के साथ देखा और पुष्पक विमान को भी देखा। तत्पश्चात वे अशोक वाटिका में गए, जहाँ उन्होंने अंततः सीता को देखा।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान के मिशन की सफलता का सूचक है। रावण का दर्शन शत्रु के बल और वैभव का आकलन करने का अवसर था। पुष्पक विमान रावण की समृद्धि का प्रतीक था। अशोक वाटिका में सीता का दर्शन ही हनुमान के सम्पूर्ण अभियान का चरम बिंदु था। यह उनके धैर्य, साहस और भक्ति का फल था।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।