॥ श्लोक १ ॥
पुत्रेष्टिं नाम यज्ञं तु राजा वै दशरथः तदा ।
चकार फलनिर्वृत्तिं पुत्रार्थं पुत्रवत्सलः ॥ १-३-१ ॥
🔹 पदच्छेद : पुत्रेष्टिम् = पुत्रेष्टि नामक; नाम = नाम से; यज्ञम् = यज्ञ; तु = तो; राजा = राजा; वै = निश्चय ही; दशरथः = दशरथ ने; तदा = तब; चकार = किया; फलनिर्वृत्तिम् = फल की प्राप्ति के लिए; पुत्रार्थम् = पुत्र की इच्छा से; पुत्रवत्सलः = पुत्र के स्नेही।
📖 भावार्थ : पुत्र के प्रति अत्यन्त स्नेह रखने वाले राजा दशरथ ने पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया।
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ कोई साधारण राजा नहीं थे, वे अत्यन्त पुत्रवत्सल थे। उनकी यह तीव्र इच्छा ही यज्ञ का कारण बनी।
॥ श्लोक ६ ॥
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋत्विजः समुपागताः ।
दिव्यं पुरुषमादाय राज्ञे दुःखापहं शुभम् ॥ १-३-६ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; यज्ञे = यज्ञ के; समाप्ते = समाप्त होने पर; तु = ही; ऋत्विजः = ऋत्विज (याजक); समुपागताः = आए; दिव्यम् = दिव्य; पुरुषम् = पुरुष को; आदाय = लेकर; राज्ञे = राजा को; दुःखापहम् = दुःख दूर करने वाला; शुभम् = कल्याणकारी।
📖 भावार्थ : यज्ञ के समाप्त होने पर ऋत्विज एक दिव्य पुरुष को लेकर राजा के पास आए, जो अत्यन्त कल्याणकारी और दुःखों को दूर करने वाला था।
🔍 व्याख्या : यह दिव्य पुरुष स्वयं अग्निदेव के प्रतिनिधि के रूप में प्रकट हुए। उनके हाथ में पायस (खीर) से भरा स्वर्ण पात्र था, जो पुत्र प्राप्ति का वरदान था।
॥ श्लोक ७ ॥
राजन्निमं पुरस्कृत्य पायसं देवनिर्मितम् ।
प्रतीच्छ भद्रे भद्रं ते पत्नीनां विनियोजय ॥ १-३-७ ॥
📖 भावार्थ : "हे राजन्! देवताओं द्वारा निर्मित इस पायस (खीर) को ग्रहण कीजिए। यह आपके लिए कल्याणकारी है। इसे अपनी पत्नियों में वितरित कर दीजिए।"
॥ श्लोक १० ॥
कौशल्या जनयामास रामं सत्यपराक्रमम् ।
कैकेयी जनयामास भरतं शीलसंयुतम् ॥ १-३-१० ॥
📖 भावार्थ : कौशल्या ने सत्यपराक्रमी राम को जन्म दिया। कैकेयी ने शीलसंपन्न भरत को जन्म दिया।
॥ श्लोक ११ ॥
सुमित्रा जनयामास लक्ष्मणं शत्रुघ्नं तथा ।
चतुरो जनयामास पुत्रान् राजा स धार्मिकः ॥ १-३-११ ॥
📖 भावार्थ : सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। इस प्रकार धार्मिक राजा दशरथ ने चार पुत्र प्राप्त किए।