🕉️ बाल काण्ड · सर्ग 53

शबला और विश्वामित्र

बाल काण्ड का तिरेपनवाँ सर्ग विश्वामित्र और शबला (कामधेनु) की कथा का वर्णन करता है। राजा विश्वामित्र ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में शबला के प्रभाव को देखकर उसे पाने की इच्छा रखते हैं, परन्तु वसिष्ठ के इनकार करने पर बलपूर्वक ले जाने का प्रयास करते हैं। तब शबला अपनी शक्ति से विश्वामित्र की सेना का नाश कर देती है। यह सर्ग ब्रह्मतेज की महिमा और क्षत्रिय अहंकार के पतन को दर्शाता है।

0 सम्पूर्ण श्लोक
53 सर्ग संख्या
27 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

बाल काण्ड का तिरेपनवाँ सर्ग विश्वामित्र और शबला (कामधेनु) की कथा का वर्णन करता है। राजा विश्वामित्र ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में शबला के प्रभाव को देखकर उसे पाने की इच्छा रखते हैं, परन्तु वसिष्ठ के इनकार करने पर बलपूर्वक ले जाने का प्रयास करते हैं। तब शबला अपनी शक्ति से विश्वामित्र की सेना का नाश कर देती है। यह सर्ग ब्रह्मतेज की महिमा और क्षत्रिय अहंकार के पतन को दर्शाता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

इस सर्ग का आरम्भ विश्वामित्र द्वारा राम और लक्ष्मण को अपनी कहानी जारी रखते हुए होता है। वे बताते हैं कि किस प्रकार ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में उन्होंने शबला (कामधेनु) के चमत्कार देखे। उस गाय की शक्ति से वसिष्ठ ने उनका और उनकी सेना का अभूतपूर्व सत्कार किया। यह देख राजा कौशिक (विश्वामित्र) के मन में शबला को पाने की लालसा जागृत हुई। उन्होंने वसिष्ठ से शबला माँगी, पर वसिष्ठ ने उसे देना अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह यज्ञों एवं देवताओं के लिए आवश्यक थी। इससे क्रोधित होकर राजा ने शबला को बलपूर्वक हड़पने का प्रयास किया। तब शबला ने अपने तेज से अनेक योद्धा उत्पन्न कर दिए, जिन्होंने विश्वामित्र की सम्पूर्ण सेना को पराजित कर दिया। यहाँ तक कि विश्वामित्र के सौ पुत्र भी मारे गए। यह घटना विश्वामित्र के जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। उन्होंने निश्चय किया कि वे क्षत्रिय बल की अपेक्षा ब्रह्मबल की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए कठोर तपस्या द्वारा ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करेंगे।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ५३

(शबला और विश्वामित्र – ब्रह्मबल की विजय)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को अपने राजा होने और वसिष्ठ से प्रथम भेंट का वर्णन किया था। अब वे आगे की कथा सुनाते हैं – वह अद्भुत घटना जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। यह सर्ग शबला (कामधेनु) के माध्यम से ब्रह्मतेज की श्रेष्ठता और क्षत्रिय अहंकार के पतन की गाथा है।

🐄 शबला का प्रभाव और विश्वामित्र की लालसा (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रभावं तस्यास्तु दृष्ट्वाहं परमाद्भुतम् ।
विस्मयं परमं गत्वा वसिष्ठमिदमब्रवम् ॥
इयं गौर्ब्रह्मणा दत्ता यज्ञार्थं तव सुव्रत ।
मया याच्या त्वया ब्रह्मन् दातव्या मे न संशयः ॥
श्रुत्वा मम वचो राजा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वपूर्वमिदं प्रभो ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभावम् = प्रभाव; तस्याः = उसका (शबला का); दृष्ट्वा = देखकर; अहम् = मैं; परमाद्भुतम् = अत्यन्त आश्चर्यजनक; विस्मयम् = आश्चर्य; परमम् = बहुत अधिक; गत्वा = प्राप्त करके; वसिष्ठम् = वसिष्ठ से; इदम् = यह; अब्रवम् = बोला; इयम् = यह; गौः = गाय; ब्रह्मणा = ब्रह्मा जी द्वारा; दत्ता = दी गयी; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; तव = तुम्हें; सुव्रत = सुन्दर व्रत धारण करने वाले; मया = मेरे द्वारा; याच्या = माँगी जानी चाहिए; त्वया = तुम्हारे द्वारा; दातव्या = दी जानी चाहिए; मे = मुझे; न संशयः = इसमें संदेह नहीं।
📖 भावार्थ : विश्वामित्र कहते हैं – उस शबला का अद्भुत प्रभाव देखकर मैं अत्यन्त विस्मित हुआ और वसिष्ठ से बोला – हे सुव्रत! यह गाय ब्रह्मा जी ने तुम्हें यज्ञ के लिए दी है। यह मुझसे माँगी जानी चाहिए और तुम्हें मुझे देनी चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं। मेरा यह वचन सुनकर भगवान ऋषि वसिष्ठ ने मधुर एवं सान्त्वनापूर्ण वचन कहे।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र राजा होने के नाते याचना को अपने अधिकार की भाषा में प्रस्तुत करते हैं। वे शबला के मूल्य को समझते हैं किन्तु उसके आध्यात्मिक महत्व को नहीं पहचान पाते।

🚫 वसिष्ठ का इनकार और विश्वामित्र का क्रोध (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१३ ॥
न दास्यामीति राजेन्द्र गौरियं मे धनुर्धर ।
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं यज्ञार्थं च विशेषतः ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।
राजा क्रोधसमाविष्टस्तामाचष्ट बलीयसीम् ॥
बलाद्धरध्वं गां चेति भृत्यान्समादिदेश ह ।
ते राजभृत्याः संहृष्टा बलादाचक्रमुस्तदा ॥
📖 भावार्थ : वसिष्ठ ने कहा – हे राजेन्द्र! मैं यह गाय नहीं दूँगा। यह मेरे लिए देवकार्य और यज्ञ की सिद्धि हेतु अत्यन्त आवश्यक है। महात्मा वसिष्ठ के ये वचन सुनकर राजा क्रोध से भर गया और उसने उस बलवती गाय को बलपूर्वक ले जाने का आदेश दे दिया। उसने भृत्यों से कहा – इस गाय को बलपूर्वक हड़प लो। राजा के वे भृत्य हर्षित होकर उसे बलपूर्वक पकड़ने के लिए बढ़े।
🔍 व्याख्या : राजा का अहंकार चरम पर है। वे ब्रह्मबल को चुनौती देते हैं और बल प्रयोग का आदेश देते हैं।

🔥 शबला का क्रोध और प्रतिरोध (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
सा तु शापभयाद्गौश्च वसिष्ठस्य महात्मनः ।
नात्याक्षीदाश्रमं रम्यं वसिष्ठस्य महात्मनः ॥
ततः क्रोधसमाविष्टा सृजते स्म महाबलान् ।
पुलहान् पुलिन्दांश्चैव यवनान् शबरान् खसान् ॥
ते शबलाप्रभावेण क्षणेन महतीं चमूम् ।
विश्वामित्रस्य राजर्षेर्बभञ्जुः समरे तदा ॥
📖 भावार्थ : परन्तु महात्मा वसिष्ठ के शाप के भय से वह गाय उस रम्य आश्रम को नहीं छोड़ सकी। तब वह स्वयं क्रोध से भरकर अत्यन्त बलशाली योद्धाओं को उत्पन्न करने लगी – पुलह, पुलिन्द, यवन, शबर और खस आदि। शबला के प्रभाव से उन्होंने क्षण भर में ही राजर्षि विश्वामित्र की महान सेना को युद्ध में ध्वस्त कर दिया।
🔍 व्याख्या : शबला केवल एक गाय नहीं, अपितु वसिष्ठ की तपःशक्ति का साक्षात स्वरूप है। उसके द्वारा उत्पन्न योद्धा ब्रह्मतेज की प्रचण्डता को दर्शाते हैं।
॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः पराजितो राजा पुत्रांश्चैवापश्यद्वधम् ।
शतं पुत्राणां निहतं शबलायाः प्रभावतः ॥
स राजा विमनाः शोकाद्धिमवन्तं गिरिं ययौ ।
तपस्तेपे सुतप्त्व्रं ब्रह्मर्षित्वमभीप्सया ॥
📖 भावार्थ : तब पराजित राजा ने अपने पुत्रों का वध भी देखा। शबला के प्रभाव से उनके सौ पुत्र मारे गए। वे राजा शोक से व्याकुल होकर हिमालय पर्वत पर चले गए। वहाँ उन्होंने ब्रह्मर्षित्व की इच्छा से अत्यन्त कठोर तपस्या प्रारम्भ कर दी।
🔍 व्याख्या : यह घटना विश्वामित्र के लिए परिवर्तनकारी सिद्ध होती है। पुत्रों का वध उनके अहंकार को चकनाचूर कर देता है और वे तपस्या के मार्ग पर अग्रसर होते हैं।

📖 उपसंहार: ब्रह्मतेज की विजय

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
एतत्ते कथितं वत्स शबलायाः प्रभावतः ।
यथा जातं पुरा राज्ञः कौशिकस्य महात्मनः ॥
क्षत्रबलं महाराज ब्रह्मबलं च राघव ।
ब्रह्मबलमहं मन्ये सत्यं ते प्रतिजानतः ॥
श्रुत्वा विश्वामित्रवाक्यं रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
भगवन्ब्रह्मबलस्यैव महिमा ह्यतुलो भुवि ॥
📖 भावार्थ : विश्वामित्र ने कहा – हे वत्स! इस प्रकार तुमसे शबला के प्रभाव से पूर्वकाल में महात्मा कौशिक (मेरे) साथ जो हुआ, वह सब कहा। हे राघव! क्षत्रबल और ब्रह्मबल में मैं ब्रह्मबल को ही श्रेष्ठ मानता हूँ, यह सत्य है। विश्वामित्र के वचन सुनकर राम ने हाथ जोड़कर कहा – हे भगवन्! ब्रह्मबल का महिमा ही इस पृथ्वी पर अतुलनीय है।
🔍 व्याख्या : राम इस कथा से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ब्रह्मबल (आध्यात्मिक शक्ति) ही सर्वोपरि है। यही इस सर्ग की मूल शिक्षा है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐄 शबला : तपस्या का प्रतीक

शबला (कामधेनु) केवल एक दिव्य गाय नहीं है, बल्कि वसिष्ठ की तपस्या, यज्ञ और वैदिक संस्कृति की समृद्धि का प्रतीक है। वह ब्रह्मतेज की प्रतिनिधि है, जो भौतिक बल से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

⚔️ क्षत्रिय अहंकार का पतन

विश्वामित्र का बलपूर्वक शबला को हड़पने का प्रयास क्षत्रिय अहंकार का चरम है। उसका परिणाम विनाशकारी होता है – सेना का संहार और पुत्रों का वध। यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक मूल्यों का बलपूर्वक उल्लंघन करना विनाश का कारण बनता है।

🧘 विश्वामित्र का रूपांतरण

इस भीषण पराजय ने विश्वामित्र के जीवन को मोड़ दिया। वे अब भौतिक बल की निरर्थकता समझ गए और उन्होंने ब्रह्मबल प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या का मार्ग चुना। यह उनके चरित्र विकास की नींव है।

🙏 राम की विनम्रता

कथा सुनने के बाद राम का ब्रह्मबल की श्रेष्ठता स्वीकार करना उनकी विनम्रता और ज्ञानपिपासा को प्रदर्शित करता है। वे केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि एक आदर्श शिष्य भी हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि भौतिक बल (क्षत्रिय तेज) की तुलना में आध्यात्मिक बल (ब्रह्मतेज) कहीं अधिक शक्तिशाली और स्थायी होता है। अहंकार और बल का दुरुपयोग विनाश का कारण बनता है, जबकि तपस्या और आत्म-अनुशासन से अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। विश्वामित्र का यह परिवर्तन इस बात का प्रतीक है कि सच्ची महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और तप से प्राप्त होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।