सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
बालकाण्ड का सड़सठवाँ सर्ग राम द्वारा शिव-धनुष के भंग का वर्णन करता है। राजा जनक के निमंत्रण पर आए हुए राजाओं और राजकुमारों के समक्ष वह अत्यंत भारी धनुष लाया जाता है। सभी राजा उसे उठाने में असफल हो जाते हैं, तब राम उसे सहजता से उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं और इतना खींचते हैं कि धनुष टूट जाता है। इस घटना से सिद्ध होता है कि राम ही सीता के लिए योग्य वर हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६७
(राम द्वारा धनुष भंग – सीता स्वयंवर की निर्णायक घटना)
🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में राजा जनक ने विश्वामित्र को अपने यज्ञ और सीता के स्वयंवर के बारे में बताया था। अब सभी आमंत्रित राजा और राजकुमार सभा में एकत्रित हैं। जनक ने शर्त रखी है कि जो भी शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का वर बनेगा। यह सर्ग उस ऐतिहासिक क्षण का वर्णन करता है जब राम न केवल उस अटूट धनुष को उठाते हैं, बल्कि उसे मध्य से तोड़ डालते हैं।
🏹 धनुष का सभा में आगमन और उसका स्वरूप (श्लोक १-५)
उवाच वचनं श्रुत्वा राघवाणां यशस्करम् ॥
इदं धनुः परं ब्रह्मन् राघवाणां महात्मनाम् ।
येन यज्ञे पुरा राज्ञा देवदत्तं महात्मना ॥
न शक्यमेतदन्येन नरैरुत्तमतेजसा ।
आरोपयितुमप्याजौ किमु मा बन्धनं प्रति ॥
राजानश्च महाराज विस्मयं परमं गताः ॥
आनिन्युस्ते तदा धनुः शतशोऽथ सहस्रशः ।
न शेकुस्ते समाधातुं राजानः सह सैनिकैः ॥
⚔️ राजाओं के असफल प्रयास और राम का अग्रसर होना (श्लोक ६-१५)
नाशकद्धनुषां मध्ये कोऽपि धनुरुद्धरेत् ॥
ततो विश्वामित्रो वाक्यमुवाच परमर्षभः ।
राम राम महाबाहो धनुरेतत् समुद्धर ॥
इत्युक्तः स तु रामेण सहितः सौमित्रिणा तदा ।
उदतिष्ठन्महातेजा धनुर्मध्ये महाबलः ॥
उद्बबर्ह महातेजा बालचन्द्रनिभं धनुः ॥
चकार सज्यं काकुत्स्थः पश्यतां नृपतेस्तदा ।
बभञ्ज मध्यतश्चापि धनुर्मध्ये महाबलः ॥
तस्य शब्दो महानासीत् पर्वतस्येव दीर्यतः ।
निपेतुर्भूतले सर्वे राजानः सह सैनिकैः ॥
👑 राजा जनक की घोषणा और दूतों की प्रस्थान (श्लोक १६-२५)
उवाच वचनं श्रीमान् विश्वामित्रं कृताञ्जलिः ॥
भगवन् देवदेवेश रामस्याद्भुतकर्मणः ।
पूर्णार्थोऽहं महाभाग सीता मे सुप्रजा इति ॥
सीता मे सुता भगवन् लोकादपि विशेषतः ।
रामाय दातुमिच्छामि यदि त्वमनुजानिहि ॥
ततो विश्वामित्रो वाक्यमुवाच परमर्षभः ।
दीयतामानय राजानं दशरथं सुव्रतम् ॥
स त्वरन् प्रेषयामास दूतान् राजर्षिसत्तमः ।
दशरथं सुविख्यातमानयध्वं महीपतेः ॥
ददृशुर्धर्मनिरतं दशरथं सुवर्चसम् ॥
निवेद्य जनकादेशं राज्ञे धर्मभृतां वरः ।
प्रहृष्टवदनाः सर्वे पुनराजग्मुरञ्जसा ॥
श्रुत्वा तु जनकादेशं दशरथः प्रतापवान् ।
वसिष्ठं पुरतो रम्यं कृत्वा प्रायान्महीपतिः ॥
📖 उपसंहार: बल से बड़ा है सद्गुण
चरितं पुण्यसंयुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत रुद्रलोकं स गच्छति ॥
श्रुत्वा विश्वामित्रकथां पुण्यां रामो दशरथात्मजः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रीत्या चैवं वाक्यमब्रवीत् ॥
भगवन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षत्रबलं तथैव च ।
ब्रह्मबलं महद्ब्रह्मन् क्षत्रबलाद्विशिष्यते ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🏹 राम का बल और विनम्रता
राम ने वह कार्य कर दिखाया जो असंख्य राजा नहीं कर सके, फिर भी उनमें घमंड नहीं है। वे वहाँ विश्वामित्र की आज्ञा से गए और गुरु का सम्मान किया। यह सच्चे वीर का लक्षण है।
💍 सीता स्वयंवर का रहस्य
शिव-धनुष की शर्त के पीछे यह रहस्य था कि केवल वही पुरुष सीता के योग्य है, जो शिव की कृपा और परम शक्ति से सम्पन्न हो। राम ने उसे तोड़कर सिद्ध कर दिया कि वे स्वयं विष्णु हैं और शिव उनके आराध्य हैं।
🌍 सार्वभौमिक संदेश
यह घटना दर्शाती है कि कठिन से कठिन कार्य भी साहस, आत्मविश्वास और गुरु के आशीर्वाद से सम्भव है। राम ने बिना किसी संकोच के धनुष उठाया और अपनी असीम शक्ति का परिचय दिया।
🙏 जनक की भक्ति
जनक का राम के प्रति समर्पण और उनका आनन्द यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति ईश्वर की इच्छा को पहचान लेता है, तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्ची वीरता विनम्रता में निहित है। जो स्वयं को सबसे छोटा मानता है, वही सबसे बड़ा कार्य कर सकता है। राम ने गुरु की आज्ञा का पालन किया और संसार को दिखा दिया कि बल का सदुपयोग धर्म की स्थापना के लिए होता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।