सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
बाल काण्ड का अड़सठवाँ सर्ग राजा दशरथ की मिथिला यात्रा का वर्णन करता है। राम-लक्ष्मण के विवाह का समाचार पाकर दशरथ अपनी विशाल सेना, गुरु वशिष्ठ तथा परिवार के साथ मिथिला के लिए प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग राजसी वैभव, यात्रा मार्ग के दृश्यों और राजा जनक द्वारा दशरथ के भव्य स्वागत का चित्रण करता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६८
(दशरथ की मिथिला यात्रा – दो राजवंशों का मिलन)
🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में हमने राम-लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र के मिथिला आगमन, सीता-राम के भेंट, शिव-धनुष के भंजन और राजा जनक द्वारा विवाह का निश्चय किए जाने की कथा सुनी। अब इस सर्ग में राजा दशरथ को विवाह का निमंत्रण मिलता है और वे अयोध्या से विशाल सेना एवं परिवार के साथ मिथिला की ओर प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग दो महान राजाओं – दशरथ और जनक – के मिलन और उससे उपजे हर्षोल्लास का अद्भुत वर्णन करता है।
📜 मिथिला से शुभ समाचार का आगमन (श्लोक १-६)
सूतो रथेनास्तगतं दिनकरमुपागमत् ॥
स गत्वा नगरीं रम्यामयोध्यां रघुपुङ्गवः ।
ददर्श राजधर्मेण धर्मात्मानं महीपतिम् ॥
दशरथं महात्मानं पूर्णचन्द्रं यथा दिवि ।
प्रजापालं महात्मानं ब्रह्माणमिव देवताः ॥
वसिष्ठं वाल्मिकिं चैव तथान्यानपि तापसान् ॥
ततः स राज्ञा सहितो वसिष्ठः सह तापसैः ।
जगाम राजभवनं यत्र राजा महायशाः ॥
तं दृष्ट्वा राजशार्दूलः प्रत्युत्थानेन पूजयन् ।
पप्रच्छ कुशलं चैव राज्ञो जनकधर्मिणः ॥
🙏 दशरथ द्वारा दूत का सम्मान और यात्रा की स्वीकृति (श्लोक ७-१२)
कुशली चापि धर्मात्मा शीघ्रं ब्रूहि तपोधन ॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा राज्ञा दशरथेन तु ।
प्रत्युवाच महात्मानं प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा ॥
राजा जनकः सानुगः कुशली च यज्ञकर्मसु ।
त्वद्दर्शनाक्षो देवेश प्रेषयामास मां नृपः ॥
हर्षेण महताविष्टो वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥
श्रुतं भगवता वाक्यं दूतस्यास्य तपोधन ।
यथा राजा जनकः स प्रेषयामास मां प्रति ॥
तदनुज्ञातुमिच्छामि त्वां गुरुं देवसत्तमम् ।
किमत्र पथ्यं मन्यस्व वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥
🚩 यात्रा की तैयारी और प्रस्थान (श्लोक १३-२०)
राज्ञा सार्धं सुहृद्भिश्च युक्तं गन्तुं न संशयः ॥
क्षिप्रं सज्जीक्रियतां सेना चतुरङ्गबलान्विता ।
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं रथास्तथा ॥
शीघ्रं यानानि युज्यन्तां गजाश्वरथसंकुलाः ।
पदातयश्च बलिनः सन्नद्धाः प्रस्थिता नृप ॥
सेना समुद्यता शीघ्रं यथोक्तं नृपतेस्तदा ॥
ततो राजा महातेजा वसिष्ठेन समन्वितः ।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च युक्तः प्रायान्मुदा युतः ॥
रामलक्ष्मणयोरर्थे राजा जनकमीश्वरम् ।
दिदृक्षुर्हृष्टया सेनया परिवार्य पुरात् ततः ॥
सेना सुबहुला राजन् पृष्ठतः समवर्तत ॥
नानाप्रहरणोपेता नानावर्णविभूषिता ।
शुशुभे सा तदा सेना समुद्र इव पर्वणि ॥
🌳 यात्रा मार्ग का मनोरम वर्णन (श्लोक २१-२६)
वनानि च फुल्लद्रुमान् गिरींश्च धातुचित्रितान् ॥
सानूनि च वनोद्देशान् विविधान् पादपान् शुभान् ।
पश्यन्तः प्रययुर्हृष्टा वीराः सेनासमन्विताः ॥
गच्छतस्तस्य राज्ञस्तु दशरथस्य महात्मनः ।
तिस्रो रात्रीः समासाद्य विदेहान् प्राप नारद ॥
हर्षेण युक्तः प्रमुमोद धीमान् यथेन्द्रं वृत्रेण विनिर्जित्य शक्रः ॥
ततः समेत्य प्रयतः स राजा राज्ञा सहर्षं सुहृदा मुदा युतः ।
यथार्हमभ्यर्च्य च तं महात्मना निवेशयामास पुरं महायशाः ॥
🏰 मिथिला में भव्य स्वागत और सत्कार (श्लोक २७-३२)
पूजयामास राजेन्द्रं वसिष्ठं च महामुनिम् ॥
ऋत्विजश्च महात्मानः शतानन्दं पुरोहितम् ।
ये चान्ये तापसास्तत्र सर्वान् पूजाभ्यपूजयत् ॥
ततः राजा दशरथो वसिष्ठेन समन्वितः ।
जनकेनाभ्यनुज्ञातः प्रविवेश निवेशनम् ॥
राज्ञा जनकमुख्येन पूजितः प्रत्यपूजयत् ॥
ततः प्रभाते विमले कृताह्निकपुरःसरः ।
जनकं द्रष्टुमिच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ ययौ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे बालकाण्डे अष्टषष्ठितमः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राजसी वैभव का चित्रण
इस सर्ग में वाल्मीकि ने राजा दशरथ की यात्रा के माध्यम से अयोध्या के राजसी वैभव, सेना के ठाठ और सांस्कृतिक समृद्धि का अद्भुत चित्रण किया है। यह वर्णन उस युग की राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था की झलक प्रदान करता है।
🤝 राजाओं का आदर्श मिलन
दशरथ और जनक का मिलन दो आदर्श राजाओं के बीच मैत्री, सम्मान और स्नेह का प्रतीक है। जनक द्वारा स्वयं नगर से बाहर जाकर दशरथ का स्वागत करना और यथोचित सत्कार करना भारतीय आतिथ्य परंपरा की सर्वोच्च मिसाल है।
👨👩👦👦 परिवार का महत्व
दशरथ का अपने दोनों छोटे पुत्रों – भरत और शत्रुघ्न – को साथ ले जाना यह दर्शाता है कि वे परिवार के सभी सदस्यों को इस शुभ अवसर का भागीदार बनाना चाहते हैं। यह पारिवारिक एकता और स्नेह को रेखांकित करता है।
🌸 प्रकृति का सौंदर्य
इस सर्ग में यात्रा मार्ग के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन अत्यंत मनोरम है। नदियाँ, कमल, फूलों से लदे वृक्ष, रंग-बिरंगे पर्वत – यह सब यात्रा की शोभा बढ़ाते हैं और पाठक के मन में एक सजीव चित्र उकेरते हैं।
🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि जीवन के शुभ अवसरों पर परिवार और मित्रों को साथ लेकर हर्ष और उल्लास से मिलना चाहिए। आतिथ्य और सम्मान का भाव ही सभ्य समाज की पहचान है। प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेना और उसकी सराहना करना भी जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।