॥ श्लोक १ ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा दशरथो महीपतिः ।
नगराध्यक्षमेकाग्रं नियुयोज महामतिम् ॥ १-७-१ ॥
🔹 पदच्छेद : तस्याम् = उस; पुर्याम् = पुरी में; महातेजाः = महातेजस्वी; दशरथः = दशरथ; महीपतिः = राजा; नगराध्यक्षम् = नगराध्यक्ष (नगर प्रशासक) को; एकाग्रम् = एकाग्रचित्त; नियुयोज = नियुक्त किया; महामतिम् = महामति (महान बुद्धि वाले) को।
📖 भावार्थ : उस पुरी में महातेजस्वी राजा दशरथ ने एक महामति, एकाग्रचित्त नगराध्यक्ष को नियुक्त किया।
🔍 व्याख्या : नगराध्यक्ष नगर का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता था। उसे 'एकाग्रम्' कहकर उसकी एकनिष्ठता और कर्तव्यपरायणता को रेखांकित किया गया है।
॥ श्लोक २-३ ॥
दुर्गपालं च बलिनं कोषाध्यक्षं च धार्मिकम् ।
सेनापतिं च शूरं च धर्माध्यक्षं च पण्डितम् ॥
एतानन्यांश्च विविधानधिकारिण उत्तमान् ।
यथाकर्म यथाशास्त्रं नियुयोज महीपतिः ॥
📖 भावार्थ : बलशाली दुर्गपाल (किले का रक्षक), धार्मिक कोषाध्यक्ष, शूरवीर सेनापति और पण्डित धर्माध्यक्ष – इन और अन्य विविध उत्तम अधिकारियों को राजा ने यथाकर्म और यथाशास्त्र नियुक्त किया।
🔍 व्याख्या : यहाँ पाँच प्रमुख अधिकारियों का उल्लेख है – नगराध्यक्ष (नगर प्रशासक), दुर्गपाल (सुरक्षा प्रमुख), कोषाध्यक्ष (वित्त मंत्री), सेनापति (रक्षा मंत्री), धर्माध्यक्ष (न्यायाधीश)। प्रत्येक की नियुक्ति उनके गुणों के अनुसार हुई।
॥ श्लोक ४-६ ॥
ते सर्वे स्वेषु कार्येषु नियुक्ता राज्ञा तदा ।
अव्यग्राः सततं राजन् प्रजाः सम्यगरक्षिषुः ॥
नगरे जनपदे चैव ये च राज्ञः समीपगाः ।
सर्वे स्वेषु च कार्येषु नियुक्ताः कर्मसु स्थिताः ॥
न तेषामभवच्चिन्ता राज्ञः कोशे कथंचन ।
यथाकालं च ते सर्वे प्राप्नुवन्त्युचितां गतिम् ॥
📖 भावार्थ : वे सभी राजा द्वारा अपने-अपने कार्यों में नियुक्त होकर, अव्यग्र (शान्त) चित्त से सदा प्रजा की सम्यक् रक्षा करते थे। नगर में, जनपद में और राजा के समीप जो भी अधिकारी थे, सब अपने-अपने कार्यों में नियुक्त और तत्पर रहते थे। उन्हें राजकोष की कोई चिन्ता नहीं थी, और वे सभी यथाकाल अपनी उचित गति (वेतन-सुविधाएँ) प्राप्त करते थे।