सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
इस सर्ग में हनुमान् सुग्रीव को सलाह देते हैं कि वे लक्ष्मण के क्रोध को शांत करें और राम से की गई सहायता की प्रतिज्ञा पूरी करें।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २९
(हनुमान् द्वारा सुग्रीव को सलाह)
🔆 प्रस्तावना : वर्षा ऋतु बीत जाने के बाद भी सुग्रीव राम के कार्य को भूलकर भोग-विलास में लीन हो गए। राम ने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। लक्ष्मण के क्रोधित स्वरूप को देख सुग्रीव भयभीत हो गए। तब हनुमान् ने सुग्रीव को उचित परामर्श दिया, जिससे वे लक्ष्मण को मनाने में सफल हुए।
🐒 सुग्रीव का भय और हनुमान् का आगमन (श्लोक १-८)
सुग्रीवः सहसा त्रस्तो हनुमन्तमुवाच ह ॥
हनुमन् पश्य लक्ष्मणं प्रविष्टं क्रोधमूर्छितम् ।
किं करोमीति मे ब्रूहि त्वं हि मे बुद्धिसत्तमः ॥
इति सुग्रीववचनाद्धनुमान् मारुतात्मजः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञः सुग्रीवं सत्यविक्रमम् ॥
भयं त्यज महाराज मैवं गन्तुं त्वमर्हसि ।
रामप्रियार्थं यत्नस्ते कर्तव्यो विगतज्वरः ॥
🧠 हनुमान् का उपदेश (श्लोक ९-२०)
तस्य कार्यमिदं राजन् सुकृतं कर्तुमर्हसि ॥
यदि त्वं राघवं प्राप्य सीतां प्राप्स्यसि मैथिलीम् ।
न ते किंचिदवाप्यं स्यात्त्रैलोक्येऽपि महीपते ॥
तस्मात्कुरु महाराज रामप्रियहितं वचः ।
लक्ष्मणं प्रति गच्छ त्वं विनयावनतः प्रभो ॥
एवं हनुमता प्रोक्तः सुग्रीवः प्रत्युवाच ह ।
हनुमन् युक्तमुक्तं ते करिष्ये वचनं तव ॥
🤝 सुग्रीव का लक्ष्मण से मिलना और क्षमा याचना (श्लोक २१-२७)
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
अहं ते भ्रातृभावेन क्षन्तुमर्हसि मे प्रभो ।
राज्यमत्तोऽस्मि संभ्रान्तो न मे किंचिदतिक्रमम् ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः क्रोधमत्यजत् ।
सुग्रीवं परिष्वज्य च इदं वचनमब्रवीत् ॥
मया ते वचनं दत्तं रामस्यार्थे न संशयः ।
क्षन्तव्यं ते मया राजन् यद्यत्किंचिदतिक्रमम् ॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।