सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
किष्किन्धाकाण्ड के पचासवें सर्ग में वानर सेना दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए ऋक्ष गुफा में प्रवेश करती है। वहाँ उनकी भेंट तपस्विनी स्वयंप्रभा से होती है, जो उनका आतिथ्य सत्कार करती हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५०
(ऋक्ष गुफा में प्रवेश – स्वयंप्रभा से भेंट)
🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव की आज्ञा से चारों दिशाओं में वानर दल सीता की खोज में निकल चुके हैं। अंगद के नेतृत्व में दक्षिण दल विन्ध्याचल, सह्याद्रि आदि पर्वतों को पार करता हुआ अन्ततः एक रहस्यमयी गुफा के समीप पहुँचता है। यह गुफा ऋक्ष नाम से प्रसिद्ध है। इस सर्ग में वानरों द्वारा उस गुफा में प्रवेश और वहाँ तपस्या कर रही दिव्य नारी स्वयंप्रभा से उनकी प्रथम भेंट का वर्णन है।
🕳️ ऋक्ष गुफा का स्वरूप और वानरों का प्रवेश (श्लोक १-८)
विचिन्वन्तो वनं घोरं प्राप्ता ऋक्षगुहां तदा ॥
दृष्ट्वा तु तां गुहां घोरां महतीं भीमदर्शनाम् ।
लतागुल्मसमाकीर्णां दुःप्रवेशां तमोवृताम् ॥
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रविविक्षुर्महाबलाः ।
अंगदप्रमुखाः सर्वे हनूमज्जाम्बवानपि ॥
न प्राज्ञायन्त ते मार्गं भ्रान्ता वानरपुंगवाः ॥
केषांचिद्वदनं दृष्ट्वा केचिदन्योन्यमीक्षिरे ।
हस्तैर्हस्तान्प्रगृह्णन्तो गच्छन्ति स्मान्ध्यसंप्लवे ॥
ततस्ते ददृशुः कांचित्स्त्रियं तपसि संस्थिताम् ।
दिव्यरूपधरां साध्वीं तेजसा प्रज्वलन्तीम् ॥
सा तु तान्वानरान्दृष्ट्वा विस्मिता समपद्यत ।
कुत आगम्यते ब्रूत का वश्चिन्ता वदस्व मे ॥
🙏 स्वयंप्रभा से भेंट और प्रार्थना (श्लोक ९-१८)
ऊचुः परमसंहृष्टाः का त्वं ब्रूहि तपोधने ॥
वयं तु वानराः सर्वे सुग्रीवस्य सखीयुताः ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रविष्टा गह्वरं महत् ॥
सा चास्माकं गतिर्देवि त्वमेव शरणं परम् ।
कुरु प्रसादं कल्याणि निर्देशं देहि साम्प्रतम् ॥
एवमुक्ता तु सा देवी वानरैर्हर्षितैस्तदा ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं स्वागतं वो वरानने ॥
अहं स्वयंप्रभा नाम मेरुपृष्ठनिवासिनी ।
तपसा दग्धपाप्मा च गुहायामत्र संस्थिता ॥
भवद्भिरतिथिः पूज्या प्राप्ता भोज्यं ददामि वः ।
विश्रम्यतामिहैवाद्य श्वो यास्यत यथासुखम् ॥
पानीयममृतप्रख्यं ददौ तेभ्यो यथाविधि ॥
ते भुक्त्वा पाययित्वा च विश्रम्य च यथासुखम् ।
तां देवीं पुनरूचुः प्राञ्जलयः कृताञ्जलिम् ॥
श्वः प्रभाते व्रजिष्यामः कार्यशेषं हि नः कृतम् ।
त्वत्प्रसादाद्गुहादस्मान्निर्गमिष्यामहे वयम् ॥
इत्युक्त्वा ते निशामेव तस्थुः सुप्तसमाहिताः ।
प्रभाते सा गुहाद्वारं दर्शयामास रश्मिभिः ॥
🚪 गुफा से निर्गमन का संकल्प
स्वयंप्रभां प्रशंसन्तो जग्मुर्वै दक्षिणामुखाः ॥
तया दत्तां गतिं लब्ध्वा प्रहृष्टा वानरर्षभाः ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रयाताः शीघ्रविक्रमाः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧘 तपस्या और आतिथ्य
स्वयंप्रभा का चरित्र तपस्विनी और गृहस्थिणी दोनों रूपों में आदर्श है। उन्होंने वानरों का सत्कार कर भारतीय संस्कृति के अतिथि-धर्म का पालन किया। साथ ही, उनके तपोबल से ही वे गुफा में प्रकाश फैलाने में सक्षम हैं।
🌑 अंधकार से प्रकाश की ओर
गुफा का अंधकार संशय, भ्रम और निराशा का प्रतीक है। वानर इस अंधकार में भटकते हैं, किन्तु तपस्विनी के दर्शन से उन्हें नई आशा और मार्ग मिलता है। यह जीवन में दैवीय सहायता के महत्त्व को रेखांकित करता है।
🔱 सुग्रीव-राम की मैत्री का प्रभाव
वानर राम के कार्य के लिए निकले हैं, और इस दिव्य सहायता से स्पष्ट होता है कि धर्म के पक्ष में खड़े होने पर ईश्वरीय सहायता स्वतः प्राप्त होती है। स्वयंप्रभा उनकी सहायता करती हैं, जो राम की महिमा का ही परिणाम है।
📜 स्वयंप्रभा का आख्यान
स्वयंप्रभा का परिचय आगे के सर्गों में और विस्तार से मिलेगा। वह मेरु पर्वत पर निवास करने वाली एक सिद्ध योगिनी हैं, जो अपने तपोबल से इस गुफा में रहती हैं। उनके माध्यम से वानरों को न केवल भोजन, वरन् आगे की यात्रा का सन्मार्ग भी मिलता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए। सज्जनों की सहायता के लिए दैवीय शक्तियाँ स्वयं आगे आती हैं। साथ ही, अतिथि-सत्कार का महत्त्व और तपस्या का बल हमें स्वयंप्रभा के चरित्र से मिलता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।