सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रावण के अत्याचारों से पीड़ित होकर कुबेर उसे लंका छोड़ने का आदेश देते हैं। रावण क्रोधित होकर लंका पर अधिकार जमाने की योजना बनाता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११
(धनद (कुबेर) द्वारा रावण को लंका का त्याग)
🔆 प्रस्तावना : रावण ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किए और अहंकारी हो गया। उसने अपने भाई कुबेर से लंका छीनने का निश्चय किया। यह सर्ग उसी संघर्ष के आरंभ का वर्णन करता है।
प्रेषयामास दुर्धर्षं लङ्केश्वरमचोदयत् ॥
त्वं ममादेशतः स्थानं त्यज शैलेन्द्रनिर्मितम् ।
नो चेद्युद्धेन ते सार्धं भविता नात्र संशयः ॥
उवाच मृदुना सार्धं धर्मार्थसहितं वचः ॥
भ्राता ममासि दशग्रीव मा गमः क्रोधवश्यताम् ।
ब्रह्मदत्तेयमा लङ्का न त्याज्या पूर्वकर्मणा ॥
स्वयमेवागतः शीघ्रं लङ्कामभिययौ बली ॥
कुबेरस्तु निरीक्ष्यैनं त्यक्त्वा लङ्कां गतः शिवाम् ।
कैलासं प्रति धर्मात्मा रावणाय ददौ पुरीम् ॥
इस सर्ग में रावण और कुबेर के बीच भाईचारे का टूटना और रावण के अहंकार का उदय दिखाया गया है। कुबेर का धैर्य और धर्मपरायणता एक आदर्श शासक के गुण हैं, जबकि रावण का बलपूर्वक लंका पर अधिकार करना उसके अधर्मी स्वभाव को उजागर करता है। यह सर्ग यह शिक्षा देता है कि अहंकार और अन्याय अंततः विनाश का कारण बनते हैं, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।