सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
क्रोधी महर्षि दुर्वासा अयोध्या पहुँचते हैं और राम से तत्काल भेंट की माँग करते हैं। राम लक्ष्मण को द्वार पर तैनात करते हैं और भेंट का समय तय करते हैं, जो आगे लक्ष्मण के त्याग का कारण बनता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११७
(दुर्वासा ऋषि का राम से भेंट करने आगमन)
🧘 दुर्वासा का आगमन (श्लोक १-५)
रामाज्ञया महाबाहुर्विनयावनतोऽभवत्॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो दुर्वासा नाम धार्मिकः।
मुनिवर्यो महातेजा रामदर्शनलालसः॥
स दृष्ट्वा लक्ष्मणं द्वारि विनयावनतं स्थितम्।
उवाच रोषताम्राक्षः क्व रामः सत्यविक्रमः॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वीरः प्रणम्य शिरसा मुनिम्।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्राता मेऽन्तःपुरे प्रभुः॥
क्षणं प्रतीक्षतां भगवान् यावद्रामं निवेदये।
🔥 क्रोध और धमकी (श्लोक ६-१०)
नो चेद्रामं न पश्यामि शप्स्यामि सह बान्धवान्॥
सराष्ट्रं सप्रजं सैन्यं सवाहनधनं तथा।
भस्मसात्कुरुते कोपो मम नास्त्यत्र संशयः॥
लक्ष्मणस्तु वचः श्रुत्वा दुर्वासस उदीरितम्।
चिन्तयामास दुःखार्तः किं करोमि क्व गच्छामि॥
उभयोः कार्ययोर्मध्ये गुरु चेदमुपस्थितम्।
यदि रामं प्रवेश्यामि भेत्स्याम्याज्ञां महात्मनः॥
अथवा मुनिशापं तु न शक्ष्यामि सहिष्यते।
इति संचिन्त्य बहुधा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्॥
⚖️ लक्ष्मण का निर्णय (श्लोक ११-१५)
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो वीरः प्रविवेश निवेशनम्॥
स गत्वा राघवं द्रष्टुं यत्र रामः सह कालया।
विवेश भवनं श्रीमान् लक्ष्मणः परवीरहा॥
तं दृष्ट्वा राघवो वाक्यमुवाच परिसान्त्वयन्।
किमागमनकार्यं ते सौमित्रे वद शोभनम्॥
लक्ष्मणः प्राह दुर्वासा मुनिरागत्य मां द्वारि।
द्रष्टुं त्वामिच्छते राजन् शप्तुं वा सह बान्धवान्॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं सहसोत्थाय वीर्यवान्।
अगच्छत स्वयं द्रष्टुं दुर्वाससममित्रजित्॥
🙏 राम का स्वागत (श्लोक १६-२०)
दुर्वाससं महात्मानं तेजसा ज्वलितं स्थितम्॥
प्रणम्य शिरसा रामो विनयावनतोऽभवत्।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं स्वागतं ते महामुने॥
दुर्वासा प्राह धर्मात्मन् प्रीतोऽस्मि तव राघव।
यदहं त्वां समागम्य दृष्टवानस्मि सुव्रत॥
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलस्तत्रैवान्तरधीयत।
रामोऽपि भवनं गत्वा चिन्तयामास लक्ष्मणम्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
⚖️ धर्म का संकट
लक्ष्मण के सामने धर्म का संकट है: बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना, या पूरी अयोध्या को शाप से बचाना। यह स्थिति दर्शाती है कि कभी-कभी धर्म के दो मार्ग टकरा जाते हैं और व्यक्ति को कठिन निर्णय लेना पड़ता है। लक्ष्मण ने बड़े के कल्याण को चुना, लेकिन उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
🎭 दुर्वासा की भूमिका
दुर्वासा का आगमन एक नाटकीय मोड़ है। वे ऋषि शक्ति के प्रतीक हैं। उनका यह आना केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि राम की प्रतिबद्धता को परखने और लक्ष्मण के त्याग की घटना को जन्म देने के लिए था। यह दैवीय लीला का हिस्सा है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी-कभी जीवन में कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। हमें दूसरों के कल्याण के लिए अपने सुखों का त्याग करना पड़ सकता है। लक्ष्मण ने राम की आज्ञा तोड़कर भी उनका ही कल्याण सोचा। यह त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा है, भले ही उसका परिणाम दुखद हो।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।