सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
दुर्वासा के प्रकोप से अयोध्या को बचाने के लिए राम की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण, राम को धर्मराज के रूप में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने प्रिय भाई लक्ष्मण का निर्वासन करना पड़ता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११८
(राम द्वारा लक्ष्मण का निर्वासन)
🤔 राम का मनन (श्लोक १-५)
किं कर्तव्यं मया राज्ञा धर्मसंकटमागते॥
यदि मे भ्रातृवात्सल्यात्क्षमिष्येऽहं व्यतिक्रमम्।
धर्महानिर्भवेद्राज्ञः प्रजा चापि विनङ्क्ष्यति॥
अथ दण्डं प्रयच्छामि लक्ष्मणाय महात्मने।
हृदयं मे विदीर्येत स्नेहाद्भ्रातुर्विशेषतः॥
इति संचिन्त्य बहुधा धर्मार्थसहितं वचः।
रामः प्रोवाच धर्मात्मा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम्॥
आनयाशु महाबाहुं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्।
⚖️ राम का निर्णय (श्लोक ६-१०)
राजा त्वामाह्वयति च शीघ्रमागच्छ सौम्य माम्॥
इत्युक्तः स तदा वीरः सुमन्त्रेण महात्मना।
जगाम भवनं रामः यत्र रामः प्रतिष्ठितः॥
प्रविश्य च सभां रामो दृष्ट्वा भ्रातरमच्युतम्।
उवाच परमोद्विग्नो लक्ष्मणं प्रियदर्शनम्॥
लक्ष्मण त्वं मया पूर्वं द्वारि संस्थापितः स्थितः।
त्वया मदाज्ञां भङ्क्त्वा च प्रवेशितो महामुनिः॥
राज्ञा धर्मः सदा रक्ष्यः प्रजानां हितकाम्यया।
तस्मात्त्वामहमद्यैव त्यक्ष्यामि प्रियदर्शन॥
🙏 लक्ष्मण की स्वीकृति (श्लोक ११-१५)
न विषादं न संतापं लेभे प्रीतियुतोऽभवत्॥
उवाच च प्रसन्नात्मा यथा मां त्वं त्यजिष्यसि।
तथैव त्वयि वत्स्यामि सर्वदा धर्मचारिणि॥
रामाज्ञा शिरसा धार्या मया नित्यं विशेषतः।
तस्माद्गच्छामि सरयूं त्यक्त्वा देहं सनातनम्॥
एतच्छ्रुत्वा सभासदः सर्वे बाष्पाकुलाक्षराः।
विलेपुः करुणं वाक्यं हा हा लक्ष्मण साध्विति॥
लक्ष्मणः प्रणम्य रामं परिक्रम्य च भक्तितः।
निर्जगाम पुराद्धीमान् सरयूतीरमागमत्॥
😢 सभा का विलाप (श्लोक १६-२५)
उवाच परमोद्विग्नो धर्मो मे जीवितात्प्रियः॥
यदि धर्मं परित्यज्य लक्ष्मणं रक्षयाम्यहम्।
प्रजा मे न भवेत्प्रीता लोकश्चापि विगर्हयेत्॥
एवं संचिन्त्य मनसा रामो धर्मपरायणः।
निवारयामास शुचः सभ्यान् बाष्पाकुलान् सतः॥
मा शोचत महाभागा लक्ष्मणं विदितात्मनाम्।
स हि धर्मपरो नित्यं प्राप्स्यते परमां गतिम्॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा विवेश स्वगृहं तदा।
लक्ष्मणोऽपि महातेजाः सरयूतीरमाश्रितः॥
योगमास्थाय धर्मात्मा जहौ देहं महामतिः।
ततः पुष्पैः सुरगणाः समन्तात्समवाकिरन्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राजधर्म की प्रधानता
यह सर्ग राजधर्म की प्रधानता को दर्शाता है। राम के लिए, चाहे वह कितने ही दुखी क्यों न हों, राजधर्म का पालन करना सर्वोपरि है। वे व्यक्तिगत संबंधों और स्नेह को धर्म के आगे त्याग देते हैं। यह एक आदर्श राजा का लक्षण है, जो निष्पक्ष और धर्मपरायण होता है।
🙇 लक्ष्मण का समर्पण
लक्ष्मण का समर्पण अद्वितीय है। वे बिना किसी शिकायत के, प्रसन्न मन से राम के निर्वासन आदेश को स्वीकार करते हैं। उनके लिए राम की आज्ञा ही परम धर्म है। यह भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है। वे योग के माध्यम से शरीर त्यागकर राम में ही लीन हो जाते हैं।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में कर्तव्य और धर्म का पालन सबसे ऊपर है, चाहे उसके लिए हमें कितने ही कठोर निर्णय क्यों न लेने पड़ें। राम ने राजधर्म का पालन किया और लक्ष्मण ने भक्ति धर्म का। यह सर्ग हमें सिखाता है कि धर्म के मार्ग पर चलने में त्याग और बलिदान अवश्यम्भावी हैं, परन्तु अंत में वही परम गति की ओर ले जाता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।