सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रावण अपने बल के मद में चूर होकर देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों पर अत्याचार करने लगता है। वह यज्ञों में विघ्न डालता और सीता की खोज में जाने तक के कृत्यों का संक्षिप्त वर्णन।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १३
(रावण के अत्याचार)
🔆 प्रस्तावना : रावण ने वरदान पाकर सारे लोकों में आतंक मचा दिया। इस सर्ग में उसके क्रूर कर्मों का वर्णन है, जिसके कारण देवता और ऋषि परेशान होकर भगवान विष्णु की शरण में गए।
इन्द्रस्यापहरत्स्थानं स्वयमिन्द्रत्वमिच्छति ॥
अग्निं च वरुणं चैव यमं कुबेरमेव च ।
युद्धे पराजितान्कृत्वा स्ववशे समवर्तयत् ॥
मांसशोणितपूर्णानि करोति स्म महावनम् ॥
ऋषीणां तपसां रोधं करोति स्म दुरासदः ।
निवसन्ति भयाद्विप्रा हिमवत्कन्दरेषु च ॥
ये न ददुस्तान्समरे निजघान महाबलः ॥
एकदा सीतया प्रोक्तो नारीरूपवती शुभा ।
इत्याकर्ण्य वनं यातो नापश्यत्तां तपस्विनीम् ॥
रावण के अत्याचारों का यह विस्तृत वर्णन बताता है कि असीमित शक्ति और अहंकार कैसे एक व्यक्ति को पूर्णतः पथभ्रष्ट कर सकते हैं। देवता, ऋषि और राजा सभी उससे त्रस्त थे। यही कारण है कि भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में अवतार लेकर धर्म की स्थापना की। यह सर्ग उस नैतिकता की याद दिलाता है कि अत्याचार का अंत सदैव विनाशकारी होता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।