सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रावण अपने विमान पुष्पक से चन्द्रलोक की यात्रा करता है। वहाँ वह चन्द्रदेव की सभा में जाता है और उनके दिव्य वैभव को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है, किंतु चन्द्रदेव के शीतल और सौम्य व्यवहार के आगे उसका कोई बल नहीं चलता।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २७
(रावण का चन्द्रलोक भ्रमण)
🌙 श्लोक १-५ : चन्द्रलोक की यात्रा
आरुह्य पुष्पकं दिव्यं चन्द्रलोकं ययौ तदा॥
ददर्श रम्यां शुभ्रां च चन्द्रलोकस्य संपदम्।
हिमसंघातसंकाशां मुक्ताजालविभूषिताम्॥
तत्रापश्यत्सभां दिव्यां चन्द्रस्यामृतवर्चसः।
रोहिण्या सहितं देवं प्रभया भुवनं युतम्॥
स गत्वा सहसा तत्र प्रविवेश सभां प्रभुः।
न चास्य कश्चिद्बाधेत प्रभावान्मन्दिरे सति॥
चन्द्रदेवस्तु तं दृष्ट्वा रावणं राक्षसेश्वरम्।
उत्थाय सहसा प्राह स्वागतं ते निशाचर॥
🪐 श्लोक ६-१० : चन्द्रलोक का दिव्य वैभव
दर्शयामास तत्सर्वं यद्यत्किंचिन्मनोरमम्॥
चन्द्रलोके महार्हाणि रत्नानि विविधानि च।
विमानानि च दिव्यानि नानाकार्याणि भागशः॥
अप्सरसां गणान् रम्यान् गन्धर्वाणां च गायताम्।
किन्नराणां च ये तत्र नृत्यन्ति मुदिताः सदा॥
विद्याधराश्च बहवः सिद्धाश्च परमर्षयः।
चन्द्रलोके वसन्त्येते ये चान्ये तापसाः प्रिये॥
एतत्सर्वं महाबाहो रावणाय निवेदितम्।
चन्द्रदेवेन धर्मज्ञ सभायां समुपस्थितम्॥
❄️ श्लोक ११-२० : चन्द्रदेव की शीतलता और रावण का सम्मान
प्रीतिमानभवद्राजन् चन्द्रलोकस्य वैभवम्॥
चन्द्रदेवं ततः प्राह रावणो राक्षसेश्वरः।
भवान् धन्यो महाभाग यस्येदृक् स्थानमुत्तमम्॥
न मे युद्धेन प्रयोजनं त्वया सार्धं निशाकर।
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि ददामि तव सुव्रत॥
चन्द्रदेवस्तु तच्छ्रुत्वा रावणस्य वचोऽमृतम्।
प्रहस्य मन्दं मधुरं वाक्यमेतदुवाच ह॥
न मे वरेण प्रयोजनं रावण त्वयि सुव्रते।
यदि तुष्टोऽसि राजेन्द्र सख्यं मे सह वर्तताम्॥
रावणः प्राह सन्तुष्टश्चन्द्रदेवं निशाकरम्।
एवमस्तु महाभाग सख्यं मे त्वां न संशयः॥
ततश्चन्द्रोऽपि राजेन्द्र रावणाय महात्मने।
ददौ दिव्यानि वस्त्राणि रत्नानि विविधानि च॥
रावणोऽपि महातेजाश्चन्द्रदेवं नमस्य च।
आरुरोह विमानं स्वं ययौ लङ्कां पुरीं प्रति॥
🕊️ श्लोक २१-३५ : मित्रता और विदाई
मैत्री समभवद्राजन् यथा चन्द्रस्य रोहिणी॥
चन्द्रदेवोऽपि राम तु रावणं समुवाच ह।
यदा त्वं संशयं प्राप्तो रणे वा काननेऽपि वा॥
स्मरणं मे कुरुष्व त्वं तदा यास्यसि संशयात्।
इत्युक्त्वा चन्द्रदेवोऽपि तत्रैवान्तरधीयत॥
रावणोऽपि महातेजा लङ्कां प्राप्य पुरीं शुभाम्।
मन्त्रिभिः सहितो राजन् चकार सुखमेव च॥
इत्येतत्कथितं राजन् चन्द्रलोकस्य दर्शनम्।
रावणस्य च संवादं चन्द्रदेवेन धीमता॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत चन्द्रलोके महीयते॥
न तस्य शत्रवो राजन् न च व्याधिभयं क्वचित्।
सुखी पुत्रसमायुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
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आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।