सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
रावण को ज्ञात होता है कि विष्णु ने मनुष्य रूप में अवतार लिया है, तो वह उनसे युद्ध करने की इच्छा से उन्हें खोजने निकलता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४२
(रावण द्वारा विष्णु से युद्ध की खोज)
🔆 प्रस्तावना : रावण ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, किन्तु उसका अहंकार अभी शान्त नहीं हुआ। अब वह स्वयं भगवान विष्णु को युद्ध के लिए खोजने निकलता है।
👑 रावण का अहंकार (श्लोक १-५)
मेन एकं न विद्येत यो मां युध्येत संयुगे॥
स कदाचिद्विचिन्त्यैवं मन्त्रिभिः सह राक्षसः।
पप्रच्छ विष्णुरद्यापि कुत्रास्ते केन वा हतः॥
मन्त्रिणः प्राहुरव्यग्रा देवदेवो जनार्दनः।
क्षीरोदे शेषपर्यङ्के शेते नित्यमकल्मषः॥
तत्र गत्वा हि तेन त्वं युद्ध कृत्वा जयिष्यसि।
इत्युक्तः प्रययौ लङ्कां गन्तुं क्षीराब्धिमीश्वरः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🌀 अहंकार की पराकाष्ठा
रावण का विष्णु को युद्ध के लिए खोजना उसके अहंकार की चरम सीमा है। वह स्वयं को इतना शक्तिशाली मानता है कि उसे लगता है कि वह परमात्मा को भी हरा सकता है। यह उसके पतन की नींव है।
🙏 भक्ति और शक्ति
यह सर्ग बताता है कि केवल शक्ति ही सब कुछ नहीं है। रावण के पास अपार शक्ति थी, किन्तु भक्ति और विनम्रता के अभाव में वह परमात्मा के समक्ष कुछ नहीं कर सका।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि अहंकार मनुष्य को पतन के गर्त में ले जाता है। चाहे कितनी भी शक्ति क्यों न हो, ईश्वर के समक्ष विनम्र होना ही कल्याण का मार्ग है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।