सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम के धर्मराज्य की स्थापना के बाद सभी ऋषि-मुनि उनकी स्तुति करते हैं और आशीर्वाद देकर अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४६
(ऋषियों द्वारा राम की स्तुति और प्रस्थान)
🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के बाद सभी ऋषि-मुनि अयोध्या में ही रुके थे। अब वे राम से विदा लेकर अपने आश्रमों को लौटना चाहते थे। इस सर्ग में उनके द्वारा राम की स्तुति और प्रस्थान का वर्णन है।
🧘 ऋषियों द्वारा स्तुति (श्लोक १-१०)
रामं प्रति महात्मानं वाक्यमूचुः प्रशस्य च॥
राम राजन्महाबाहो धर्मज्ञ सत्यविक्रम।
त्वया धर्मः प्रतिष्ठाप्तः पालिता च वसुंधरा॥
अहो तव प्रभावेन राक्षसाः क्षयमागताः।
सुराः सिद्धाश्च मुनयः त्वयि राज्ञि सुखान्विताः॥
न वै शोको न च व्याधिः न दुर्भिक्षं न चापदः।
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन् प्रजाः सर्वाः सुखं श्रिताः॥
इत्युक्त्वा ते मुनिवराः प्रशशंसुः पुनः पुनः।
रामं परमधर्मज्ञं प्रीतिमन्तः सुविस्मिताः॥
भवतां दर्शनादेव पूतोऽहं मुनिपुंगवाः॥
यद्येषा मयि वः प्रीतिः सर्वदा धर्मवत्सलाः।
आशीर्वादान्प्रयच्छन्तु मम राज्यस्य चानघाः॥
इत्युक्तास्ते मुनिश्रेष्ठाः प्रीतिमन्तः कृताञ्जलिम्।
ऊचुः परमसन्तुष्टा रामं सत्यपराक्रमम्॥
ध्रुवं ते राज्यमव्यग्रं शाश्वतं धर्मपालितम्।
कीर्तिर्लोकेषु विख्याता यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
इत्याशीर्भिः समाकीर्य रामं ते मुनिपुंगवाः।
विसर्जयांचक्रुस्ते तं प्रस्थिताः स्वान्निवेशनम्॥
🙏 राम का विनम्र व्यवहार और विदाई (श्लोक ११-२०)
अनुयात्रं चकारैषां भरतेन सहानघः॥
गच्छन्तः पृष्ठतः सर्वे मुनयो राममब्रुवन्।
निवर्तस्व महाबाहो कृतकार्याः स्म राघव॥
रामः प्राह निवर्तिष्ये युष्माकं वचनादहम्।
स्नेहात्तु हृदयं मेऽद्य न गच्छति निवर्तितुम्॥
एवं ब्रुवति काकुत्स्थे मुनयः प्रीतमानसाः।
आशीर्भिः सम्प्रयुज्यैनं जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
ददर्श रामस्तान्यान्तान्यावद्दृष्टिः प्रवर्तते।
ततः प्रविविशे वेश्म सह भ्रातृभिरात्मवान्॥
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं गाः सुवर्णं महायशाः॥
एवं तस्य प्रजाः सर्वा धर्मेण पालिताः सुखम्।
नाधयो व्याधयश्चासन्न रामे शासति प्रजाः॥
ऋषयस्ते गताः सर्वे यथागतं यथासुखम्।
राम एव महातेजा बभूव प्रीतमानसः॥
इत्याख्यानं समाख्यातं मुनिस्तुतिपुरस्सरम्।
श्रृण्वन्ति ये नरा भक्त्या ते यान्ति परमां गतिम्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राजा और ऋषि का आदर्श संबंध
इस सर्ग में राजा राम और ऋषियों के बीच परस्पर सम्मान और स्नेह का सुंदर चित्रण है। राजा ऋषियों को देवतुल्य मानता है और ऋषि राजा को धर्म का संरक्षक। यही आदर्श राज्य की नींव है।
📖 रामराज्य की विशेषताएँ
राम के राज्य में न शोक, न रोग, न अकाल – यह रामराज्य की पहचान है। यह सर्ग बताता है कि धर्म की स्थापना से समाज में सुख-शांति छा जाती है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।