🕉️ उत्तर काण्ड · सर्ग 45

रावण का श्वेतद्वीप जाना

अगस्त्य ऋषि राम को बताते हैं कि कैसे रावण ने श्वेतद्वीप की यात्रा की और वहाँ भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों के दर्शन किए।

0 सम्पूर्ण श्लोक
45 सर्ग संख्या
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मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

अगस्त्य ऋषि राम को बताते हैं कि कैसे रावण ने श्वेतद्वीप की यात्रा की और वहाँ भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों के दर्शन किए।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

रावण क्षीरसागर से लंका लौट तो गया, किन्तु उसके मन में विष्णु की महिमा के प्रति जिज्ञासा बनी रही। उसने नारद से पूछा कि विष्णु के परम भक्त कहाँ निवास करते हैं। नारद ने उसे श्वेतद्वीप का मार्ग बताया, जहाँ भगवान विष्णु के अनन्य भक्त रहते हैं। रावण वहाँ गया और उसने देखा कि वे भक्त सदा भगवान के ध्यान में लीन रहते हैं, उनका रंग गोरा है और वे अत्यन्त तेजस्वी हैं। उन भक्तों ने रावण का स्वागत किया और उसे भगवद्-भक्ति का महत्त्व समझाया। रावण कुछ समय वहाँ रुका और फिर लंका लौट आया। इस सर्ग में रावण को भक्ति का दर्शन होता है, किन्तु वह उसे आत्मसात् नहीं कर पाता।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४५

(रावण का श्वेतद्वीप जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : विष्णु के विराट रूप के दर्शन के बाद रावण के मन में उनके भक्तों के प्रति जिज्ञासा जागी। नारद के निर्देश पर वह श्वेतद्वीप गया।

🏝️ श्वेतद्वीप की यात्रा (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच – नारदेन समाख्यातं श्वेतद्वीपं दशाननः।
जगाम त्वरितो राजन् दिदृक्षुर्भक्तिसंयुतान्॥
तत्र द्वीपे वरारोहे श्वेतवर्णा महौजसः।
भक्ता विष्णोः पराक्रम्य ददृशे राक्षसाधिपः॥
ते च तं पूजयामासुः स्वागतेन दशाननम्।
बहुमानपुरस्कारैरुपचक्रुः समन्ततः॥
रावणः प्राह भक्तांस्तान् को भवद्भिः परायणः।
कस्य सेवा कृता नित्यं वदत मे सुविस्तरम्॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – “हे राजन्! नारद के बताए हुए श्वेतद्वीप को रावण ने तुरन्त जाने का निश्चय किया। वह वहाँ गया, जहाँ भगवान विष्णु के परम भक्त, श्वेत वर्ण वाले, महान तेजस्वी निवास करते हैं। वहाँ पहुँचकर राक्षसराज ने उन भक्तों को देखा। उन भक्तों ने भी स्वागत-सत्कार करके रावण का सम्मान किया। रावण ने उन भक्तों से पूछा – ‘आप लोग किसके परायण हैं? किसकी सेवा में नित्य लीन रहते हैं? मुझे विस्तार से बताइए।’” रावण ने उन भक्तों के तेज और शांति को देखा और जानना चाहा कि उनके जीवन का आधार क्या है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤍 श्वेतद्वीप का रहस्य

श्वेतद्वीप को भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों में विष्णु के परमधाम के रूप में वर्णित किया गया है। यहाँ के भक्त सदा भगवान के ध्यान में लीन रहते हैं और उनका रंग श्वेत (शुद्ध) होता है, जो उनकी निष्कलंक भक्ति का प्रतीक है।

💔 रावण और भक्ति

रावण ने भक्तों के दर्शन किए, उनका सत्कार किया, किन्तु वह स्वयं भक्त नहीं बन सका। यह उसकी त्रासदी है कि उसे सत्य का ज्ञान तो हुआ, किन्तु उसने उसे आत्मसात् नहीं किया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि केवल भक्तों के दर्शन और उनके उपदेश सुनने से भक्ति नहीं होती। उसके लिए हृदय को समर्पित करना आवश्यक है। रावण ने सब कुछ देखा, जाना, किन्तु अहंकार के कारण भक्ति का सार नहीं ग्रहण कर सका।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।